नाटक एगो अइसन विधा ह, जवना के ब्रह्म आँख से देख के कान से सुन के होला। ई विधा बहुत पुरान ह। एकरा सम्बन्ध में कई प्रकार के मत पावल जाला। नाटक के उत्पत्ति का विषय में एगो कथा बा कि सब देवता लोग ब्रह्मा जी के पास में गइल लोग आ काहल लोग कि एह शृष्टि में मनोरंजन के कवनों व्यवस्था कइल जाव। ब्रह्मा जी शृग वेद से कथानक,सामवेद से संगीत अथर्व वेद से रस आ अजुर्वेद से अभिनय लेके पांचवा वेद नाट्य वेद के अवतारना कइनी। ओकरा बाद…
Read MoreDay: September 1, 2026
समय के आरोह-अवरोह के बीच समाज
कतों सत्ता लोलुपता का चलते सत्ता के स्वामी लोग के करतूत, ओकरा चलते समाज के , नवहा लोगन के भा बच्चा-बुतरु सभ के बिखियाइल नजायज कइसे बा, परिभाषित नइखे कइल जा सकत। कुछ लाख लोगन का चलते डेढ़ अरब जनता के दरकिनार क के देखत सरकार अब कुरसी का छोड़ अउर कवनो बात समुझे-बुझे के तइयार नइखे देखात । सरकार के भाषा हिटलर , मुसोलिनी भा रावण आ कंस के भाषा लेखा बन चुकल बा। आपुसे में बिख के खेती करत-करावत सरकार आ सरकारी तंत्र अपना गुरूर में आन्हर हो…
Read Moreकस्तूरी हियरा
अइसे त उनकर नाम रघुनाथ मिसिर ह, बाकिर गाँव में बड़ से छोट तक सभे उनका के रघ्घू, बाबा के नाम से जानेला आ पुकारेला। घर के हाता में, नीम के छाँह तरे रघ्घू बाबा खटिया पर लेटल रहन। उनकर दिन के अधिकाह समय एकरे छांह में बीते ला। घर के भीतर जाये से घबड़ा लन। कभी आँगनैया बाल-बच्चन से गुलजार रहत रहे, आजु सन्नाटा के राज बा। उनकर मेहरारू,एकलउता बेटा,पतोह आ पाँच बरीस के पोता,नाव से नदी पार करत घड़ी, बढ़िआइल नदी के भेंट चढ़ गइल रहन। खाली तीन…
Read Moreमाटी क रोआई
कठपुतरी नियर काठ के घोड़ा पर बइठ के जब लइका हँसत रहे, तब ई माटी कइसन महकत रहे, याद बा? ओह घरी, जब सांझ के अन्हरिया दुआर पर आके गोड़ पसारत रहे, तब एगो लइकी अपने आँचरा में कपड़ा के गुड़िया छिपइले रसोई के कोना में बइठ जात रहे। ऊ गुड़िया ना रहे, ओकर करेजा रहे। माटी के चूल्हा, काठ के चकई, अउर बाँस के कमान से छूटल तीर… ई सब कवनो खेल ना रहे भाई, ई त पूरा क पूरा जिनगी रहे। लइके के हाथ में जब माटी के…
Read Moreगजल
1. जेकरा में जड़ रहे उहे भीतर ले गड़ गइल बाकी हवा के झोंक से अपने उखड़ गइल शिकवा-गिला से फायदा कुछुओ त ना भइल बाकी रहे जे ऊहो त रिस्ता बिगड़ गइल लड़की के भाग आज से ऊ अजनबी बनी सिन्दूर जेकरा नाम के माथा में पड़ गइल अपना घरे में हार के बइठल उदास बा ऊ जे कि बात-बात पर दुनिया से लड़ गइल कइसन रहे फसाद ई ऊहे बता सकी जेकर ए मार-काट में दुनिया उजड़ गइल दिल हो गइल उघार…
Read Moreकेहू का थाही
कविता समीक्षा (भोजपुरी में) कविता : “केहू का थाही” कवि : जयशंकर प्रसाद द्विवेदी “केहू का थाही” समकालीन भोजपुरी कविता के एगो सशक्त सामाजिक-व्यंग्यात्मक रचना ह। एह कविता में कवि आज के समाज के बदलत चरित्र, नैतिक पतन, धार्मिक आडंबर, सामाजिक भ्रम आ मानवीय संवेदना के क्षरण पर तीखा प्रहार कइले बाड़ें। कविता के हर अंतरा के आखिरी पंक्ति—“केहू का थाही”—एह बात के रेखांकित करेला कि सच आ झूठ, नीति आ अनीति के बीच के रेखा धीरे-धीरे धुँधली पड़ गइल बा, आ आम आदमी असमंजस में जी रहल बा।…
Read Moreदोसरा के बेटी
शिवजी के मुँह पर हमेशा बारह बाजल रहत रहे। बाकिर ओह दिन ऊ बड़ा खुश रहस। उनका के खुश देखके पड़ोसी राम प्रसाद जी पूछलन, ‘‘का बात ह ? तू त केहू के खुशियो देख के खुश ना होखेल। आज अतना खुश कइसे देखाई देत बाड़ ? कवनो खास बात बा का ?’’ ‘‘मालूम बा कि ना ? लखन भइआ बड़ा आदर्शवादी बनत रहस। उनकर बड़की बेटी सुष्मिता दोसरा जात में बिआह कर रहल बिआ !’’ गोतिया के बात ! भइया के जगहँसाई के बारे में सोच-सोच के ऊ बड़ा…
Read Moreएह लोकतंत्र में सब बा जायज
हिंसा-नफरत के बोली जायज बम-बारूद अ गोली जायज बे मौसम के होली जायज एह लोकतंत्र में सब बा जायज! आक्सीजन के चोरी जायज बेईमानी-घुसखोरी जायज बयपारिन के जमाखोरी जायज एह लोकतंत्र में सब बा जायज! बिन अपराध के जेल जायज मीडिया के घिन खेल जायज चोर अ पुलिस के मेल जायज एह लोकतंत्र में सब बा जायज! राजा एकदम बहरा जायज चेहरे पे कई चेहरा जायज बिन दुलहा के सेहरा जायज एह लोकतंत्र में सब बा जायज! महंग छिच्छा-पढ़ाई जायज महंगी भइल दवाई जायज साहेब के…
Read Moreचंदेश्वर के कविता संग्रह ‘गोहार ‘पढ़ला-गुनला के बाद —
भोजपुरी में गद्य से शुरुआत करिके पद्य के दुनियाँ में उतरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार चंद्रेश्वर जी के पहिला भोजपुरी कविता -संग्रह ‘गोहार ‘ के पढ़े से पहिले हम ‘कवि का ओर से दूर गो बात ‘ के पढ़े लगनीं।अपना एह आत्मकथ्य में कवि कविता के लेके कुछ साफ-साफ बतकही कइले बाड़न।उनकर कहनाम बा – 1-” कविता सच्चाइयन से जोड़ के मनुष्य-जीवन के एगो गति प्रदान करेले।××××× सभ्यता -संस्कृति के रचे-गढ़े में मय संसार में ओकर योगदान विशेष रहल बा।ऊ प्रेम आ प्रतिरोध साथ लेके आपन जय-जतरा प निकलेले।”…
Read Moreगंगा के नवगीत भीतर भाव के उत्पात
भोजपुरी साहित्यांगन के एगो चमकत सितारा गंगा बाबू, हँ गंगा प्रसाद अरुण के भोजपुरी काव्य संसार में आपन विशेष पहचान बा। गंगा बाबू के कलम भोजपुरी के हर विधा के समृद्ध कइले बा बाकिर उहां के प्रिय विधा काव्य रहे। कविता में उहाँ के गीत, नवगीत, हाइकु, गजल आ दूसरों विधा में खूब कलम चलवनीं बाकिर उनुका भीतर गीत – नवगीत के अजस्त्र धारा बहत रहत रहे। उहाँ के भोजपुरी गीत – नवगीत संसार के एगो विशेष पहचान देनीं। मंच से लेके पुस्तक आ पत्रिकन तक में। उहाँ के ‘…
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