बड़का रंगदार के

का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के…

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तेल के खेल

समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत…

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उहे अदिमिया

” का भइया ! तोहार चाल हमके तनिको ना समझ में आवेला।अइसन धउरवला ह कि हाँफत-हाँफत करेजा दुखाय लागल। अइसन ऊँहवा का रहल ह भाय कि हेतना डेराय गइला ह ….आंय।” आपन गोल -गोल आँख नचावत, बहुत मुश्किल से मनोज अपने हंफरी के कंट्रोल  करे क कोशिश में लगल रहलन।परताप मुस्कियात चाह पियत कनखी से चौरसिया ओरी ताकत पुरहर भेद से भरल रहलन।जेतने मनोज परेशान ओतने परताप उनकी ओर से बेधियान। ” का हो भइया लोग ! कवने ओरी से गोल आवत हे ? का परभू इनहुँ के त ना…

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कुंडी क रहस्य

” देखा , ले त चलत हईं सिवसंकर भइया के इंहा बाकिर कुछ एने -ओने हो जाई त हमके दोस मत दिहा।समझ गइला ना ! अपने कपार क अलाय-बलाय हमरे पर मत पटकीहा।” परताप एह अंदाज़ में बतिया कढ़वलन कि मनोज क पहिलहीं से संकित जीव में थरहरी दउड़ गइल।घबरा के पुछलन – ” काहें डेरवावत हउवा भाय।सिवसंकर सर क एतना बड़ाई सुनले हईं कि बिना मिलले रह ना जात ह।बनारस आके बिना उनकर चरन स्पर्श कइले लवट जाइब त हमार आत्मा के कल ना पड़ी।” मनोज क बेकली देखके…

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बिहार चुनाव में वोट के कोरनीस

वोट के हाला महिनवन से चालू बा । राजधानी से ले के हाटे – बाजारे , चउके – चउराहे , गाँवे गिराँवे , घरे – घरे वोटे के बात होत बा । जवन काम पाँच बरिस असरे टंगाइल रहल , अब चल – चलंती के बेरा ओकर नींव दिआए लागल , उद्घाटन होखे लागल । नेता लोग के धावा – धूपी , दउड़ा – दउड़ी चालू हो गइल । जे सत्ता में बा , ओकरा सत्ता बचावे के बेचैनी बा आ जे सत्ता से दूर बा , ऊ तरह –…

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नवके मनराखन के मनकही

का जमाना आ गयो भाया, लागत बा कि जयचंदन के फिरो दिन बहुरे लागल। अपना के फलाना भाषा के साहित्यकार कहवा के लुगरी आ लकड़ी बिटोरे में सरम ना लागे बाक़िर ओह भाषा पर अंगुरी उठावत बेरा अपना के बड़का भाषाविद बुझे लागल बा लोग। साँच के नकारे के फेरा में लोग कुछो लिखे- बोले लागत बा। लोग बुझत बा कि ई भषवा परती सरकारी जमीन ह, ओहपे कुछो करीं, धरीं, केहू कहे सुने वाला नइखे। केहू साँच बतावतो होखे त बतावत रहे, अपना कोरट के जज अपनही नु बानी,…

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नातिदीर्घ हास-परिहास -भड़ाँस मूलक निबंध

[पढ़े के पहिले निहोरा-भोजपुरी लोकचेतना के बानी हियऽ।सामूहिक चेतना के ।इहाँ कवनों प्रवृत्ति के उभरत- पसरत देर ना लागे।इहाँ जवन होला भा लउकेला ऊ सामूहिक चेतने से निकसिये के कहीं पइसारो पावेला।एह से एह आलेख के ओही नजरिया से पढ़ल जाये के चाहीं।तबे आनंद मिली।कवनों बात के अपने पर लोकल ओतने बेजाँय हऽ जेतना अपना खुशामद पर अगरा के आसमान छूये खातिर उछले लागल।] हमनीं से जिन अझुरइहें हबकि लिहब ~~~~~~~~~~~○○~~~~~~~~~~ भोजपुरी में एगो त पढ़ के लिखे वाला मनइये कम बाड़न आ जिन बड़लो बाड़न ऊ अपना के केहू…

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उरुआ के लभ मैरेज

एक बेरी के बात ह कि कैलाश मानसरोवर के एगो हंस के बियाह भइल त ऊ अपना मेहरारू हंसिनी से कहलस कि चले के बिहार घूमे. हंसिनी पुछलस कि ओहिजा देखे जुगुत का बा? तब हंस कहलन कि जवने बा तवने देखल जाई! फेर कहलस कि ओहिजा हिमालय नियन पहाड़ त नइखे, बाकिर कैमूर पहाड़ी बा, रोहतासगढ़ के किला बा. गंगा नदी नइखे त का भइल, दुर्गावती आ करमनासा नदी बाड़ी सन. भगवान भोलेनाथ नइखन त का भइल, उनके रूप गुप्तेश्वर नाथ के गुप्ताधाम बा. हंसिनी खुश हो गइली आ…

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भोजपुरी साहित्कारन के कुछ कटगरी

हम ई पहिलहीं स्वीकार कर लेत बानीं कि हमरा कुछ ना बुझाला, एह से हम जवन कहबि ओकर कवनो माने-मतलब मत निकालब स। ई त बस आजु एकदमे कुछ बुझात ना रहुए त कुछ बुझाए खातिर कुछ बूझ कह देत बानीं, बाकिर हमरा निअर आदमी से ई आशा मत करब कि हमरा कबो कुछ बुझाई। भोजपुरी में(अउरियो जगे कम-बेसी इहे होत होई। ओइसे अउरी जगह वाली बात हम अंदाजने कहलीं हँ, आपन अनुभव कुछ खास नइखे।) एह घरी तीन तरह के रचनाकार पावल जा रहल बाड़े– तप्ततन अइँठल:एह कटगरी के…

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अउवल दरजे वाली बकलोली

का जमाना आ गयो भाया,इहवाँ त बेगार नीति आ बाउर नियत वाला लो सबहरे ‘अँधेर नगरी’ का ओर धकियावे खातिर बेकल बुझात बा। का घरे का दुअरे , का गाँवे का बहरे सभे कुछ ‘टका सेर’ बेंचे आ कीने क हाँक लगावे में प्रान-पन से जुट गइल बा। अइसन लोगन का पाछे गवें-गवें ढेर लोग घुरिया रहल बा। अपना सोवारथ का चलते ओह लोगन के सुर में आपन सुरो मिला रहल बा। मने ‘मिले सुर मेरा- तुम्हारा’ क धुन खूब बज रहल बा। अउर त अउर धुन उहो लो टेर…

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