केहू का थाही

कविता समीक्षा (भोजपुरी में)
कविता : “केहू का थाही”
कवि : जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

केहू का थाही” समकालीन भोजपुरी कविता के एगो सशक्त सामाजिक-व्यंग्यात्मक रचना ह। एह कविता में कवि आज के समाज के बदलत चरित्र, नैतिक पतन, धार्मिक आडंबर, सामाजिक भ्रम आ मानवीय संवेदना के क्षरण पर तीखा प्रहार कइले बाड़ें। कविता के हर अंतरा के आखिरी पंक्ति—“केहू का थाही”—एह बात के रेखांकित करेला कि सच आ झूठ, नीति आ अनीति के बीच के रेखा धीरे-धीरे धुँधली पड़ गइल बा, आ आम आदमी असमंजस में जी रहल बा।

कविता के शुरुआते में कवि  कह रहल बानी —

“दूध फारऽ के मसक्कत,
ढील हेरत के बतकही,
केहू का थाही।”

एह पंक्तियन में समाज के ओह प्रवृत्ति पर व्यंग्य बा, जहाँ लोग समस्या के समाधान से जादे ओकरा पर बहस करे में लागल बा। मेहनत के मोल कम हो गइल बा आ बात के बतंगड़ बनावल आम बात हो गइल बा।

कवि के सामाजिक दृष्टि बहुते पैनी बा। ऊ लिखेलन—

“बात-बात में साँच छिपावल,
फेर लास के पानी चढ़ावल…”

एह पंक्तियन में साँच के दबावे आ झूठ के सजावे-सँवारवे के प्रवृत्ति पर करारा चोट कइल गइल बा। आज के समय में सच के दबा के झूठ के प्रतिष्ठित कइल जा रहल बा, एह यथार्थ के कवि बहुत कम शब्दन में अभिव्यक्त कर देले बाड़ें।

धार्मिक पाखंड पर कवि के व्यंग्य अउरी तेज हो जाला—

“नावें से डेरवावल करी,
चढ़ावा ह, जमके जेब भरी…”

एह पंक्तियन में धर्म के नाम पर भय पैदा करके आर्थिक शोषण करे वाला प्रवृत्ति के उजागर कइल गइल बा। कवि धर्म के विरोध ना करेलें, बल्कि धर्म के व्यवसाय बना देवे वाला मानसिकता के विरोध करेलें।

कविता के सबसे सकारात्मक पक्ष ओह अंतरा में दिखाई देला जहाँ कवि कहेलन—

“हिन्दू मुस्लिम भाईचारा,
सोझा बा जी इहवें सारा,
भरम क पलानी ढही…”

एह पंक्तियन में कवि सांप्रदायिक सद्भाव के समर्थन करेलें आ एह बात के रेखांकित करेलें कि आपसी प्रेम आ भाईचारा ही समाज के असली आधार बा। धर्म के नाम पर फैलावल भ्रम आखिरकार टूटे वाला बा।

कवि के पीड़ा सबसे अधिक ओह समय झलकेला जब ऊ लिखेलन—

“सुरूज़ के देखल भुला गइल,
अन्हरिया क आदत हो गइल…”

एह पंक्तियन में “सुरूज़” आशा, सत्य आ प्रकाश के प्रतीक बा, जबकि “अन्हरिया” निराशा, अन्याय आ अज्ञान के। कवि के चिंता बा कि समाज अन्हियार के एतना अभ्यस्त हो गइल बा कि उजाला के ओर देखे के चाहतो कम हो गइल बा।

भाषा के दृष्टि से कविता अत्यंत सहज, लोकधर्मी आ प्रभावशाली बा। भोजपुरी के ठेठ शब्द, मुहावरा आ लोक-लय कविता के जीवंत बना देले बा। “थाही”, “पलानी”, “मंठा मही” जइसन शब्द कविता के सांस्कृतिक गहराई प्रदान कर रहल बाड़न। कवि कतों अनावश्यक अलंकार के सहारा नइखे लेले, बलुक सीधा, सटीक आ मारक अभिव्यक्ति का माध्यम से अपना बात पाठक तक पहुँचावे के परयास करि रहल बानी।

“केहू का थाही” एगो विचारोत्तेजक भोजपुरी कविता ह, जवन समकालीन समाज के विसंगतियन पर गंभीर सवाल उठा रहल बा। एह कविता में सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना, सांप्रदायिक सद्भाव आ नैतिक मूल्यन के पक्ष में स्वर स्पष्ट सुनाई दे रहल बा। जयशंकर प्रसाद द्विवेदी एह कविता के माध्यम से पाठक के खाली सोचे पर मजबूर ना करत बाड़ें, बलुक समाज में सत्य, विवेक आ मानवीयता के पुनर्स्थापना के सनेसो दे रहल बाड़ें । भोजपुरी के समकालीन सामाजिक कविता में एह रचना के दमगर स्थान निश्चित रूप से मानल जा सकेला।

 

 

  • ज्योति पांडेय

 

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