छाया हव चमचन क,राउर कपार पर
बस देत रहा पईसा नरेगा दबाय के,
लूटा पंचईती,न चूका,सुराज हव
फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के।
खद्दर पर दाग,कउनो चिंता क बात नाही
पोखरी नीलाम करा,चुपके चुपाय के,
गंवई खड़ंजा हो,भलहीं से उंच खाल
अपने दुआरी क,रखिहा बनाय के।
लूटा पंचईती,न चुका,सूरज हव
फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के।
चिन्ह चिन्ह दिहा,अवास खास खास के
मिली कमीशन,हो भीतरैं नदाय के,
चाटुकार ओहु में,खोज लिहा मन जोग
भोग जे दुआरे,लगावत होइ आय के।
लूटा पंचईती,न चूका,सुराज हव
फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के।
दल्ला दलालन क,पालन देखात हव
बन गईलन एही में,केतना कमाय के,
कहीं चुवत करानी पर,छानी उजाड़ देख
“योगी” समाज बाय,रोवत लूकाय के।
लूटा पंचईती,न चूका,सुराज हव
फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के।।”योगी”
योगेन्द्र शर्मा “योगी”
भीषमपुर,चकिया,
चन्दौली (उ.प्र.)