कठपुतरी नियर काठ के घोड़ा पर बइठ के जब लइका हँसत रहे, तब ई माटी कइसन महकत रहे, याद बा? ओह घरी, जब सांझ के अन्हरिया दुआर पर आके गोड़ पसारत रहे, तब एगो लइकी अपने आँचरा में कपड़ा के गुड़िया छिपइले रसोई के कोना में बइठ जात रहे। ऊ गुड़िया ना रहे, ओकर करेजा रहे। माटी के चूल्हा, काठ के चकई, अउर बाँस के कमान से छूटल तीर… ई सब कवनो खेल ना रहे भाई, ई त पूरा क पूरा जिनगी रहे। लइके के हाथ में जब माटी के खिलौना आवत रहे, तब ओकरा के छुअते-छुअते मालूम पड़त रहे कि ई ओही माटी क अंश हवे जेकरा में ओकर पुरखा समा गइल बाड़ें। कुम्हार के चाक पर घूमते भइल ओही खिलौना में गाँव के कवनो बूढ़ कारीगर के काँपत हाथन क सिसकी छिपल रहत रहे। ऊ खिलौना जब टूटत रहे, तब कवनो लइका ना रोअत रहे, बल्कि ओकरा भीतर क एगो कोमल मन भरभरा के ढह जात रहे।
बाकिर समय! समय त अइसन कसाई हवे जे चुपचाप आवेला अउर सगरी नेह-छोह बटोर के कबाड़खाना में फेंक देवेला। फिर धीरे-धीरे हवा बदल गइल। गाँव के ओही अमराई में जहाँ कंचे खनकत रहन, उहाँ एक दिन अजीब सन्नाटा पसर गइल। लइके ओसारे से गायब हो गइले। कहाँ गइले? कवनो अइसन गर्त में, जेकर थाह आजु तक कवनो माई-बाबूजी ना लगा पवलन। प्लास्टिक क चमकदार, बेजान अउर कड़कड़ात भइल डिब्बा सभ घर में घुस गइल। ऊ लेगो सेट्स, ऊ पजल्स, ऊ छुअते चमके वाला मोबाइल क स्क्रीन… ई सब खिलौना ना रहन, ई सब त ओही मासूमियत क कफन रहे जेकरा के हमनी के ओढ़ा देहनी जा।
अब खेल में कवनो संगी-साथी ना रहे। अब कवनो लइकी अपनी गुड़िया के बियाह करे खातिर पड़ोस के सहेली के ना बोलावत रहे। खेल अब कवनो बंद कोठरी में, एक गो अकेले लइका अउर ओकर अन्हार स्क्रीन के बीच क अइसन सौदा बन गइल जहाँ रूह क कवनो जगह ना रहे। वीडियो गेम्स के ओही आभासी दुनिया में लइका अइसन भूलभुलैया में धँसत गइल कि ओकरा मालूम ही ना चलल कि कबे ओकर हँसई, ओकर रोआई अउर ओकर बचपना ओही स्क्रीन के भीतर कवनो पिक्सेल बन के बिखर गइल। रोबोटिक्स अउर वर्चुअल रियलिटी के नाँव पर हमनी के लइकन के हाथ में अइसन ज़हर थमा देहनी जा, जे रोज धीरे-धीरे ओकरा भीतर के इंसान के मारत रहे।
माई-बाबूजी सोचत रहन कि लइका चालाक होत बा, ओकर बौद्धिक विकास होत बा। बाकिर केहू ना देखल कि ओही चालाकी के पाछे ओकर आँखिन क नूर गायब होत रहे, ओकर रीढ़ क हड्डी टेढ़ी होत रहे, अउर ओकर मासूम करेजा कटकटा के पत्थर बनत रहे। स्वदेशी कारीगरी के ऊ सिसकती भइल रूह त कबे क दम तोड़ देले रहे, अब त बस चीन अउर बड़-बड़ देसन से आइल केमिकल अउर प्लास्टिक क ऊ नग्न नाच रहे, जे लइकन के फेफड़ा में ज़हर बन के घुलत रहे। बाज़ार अउर ई-कॉमर्स क अइसन अजगर फन कढ़ले बइठल रहे कि हर दुआर पर कवनो ना कवनो नया प्लास्टिक क डिब्बा आके गिरत रहे, अउर हर डिब्बा के साथे घर क एगो कोना अउर अन्हात जात रहे।
मन भर आवेला जब सोचिला कि ई कइसन कल रहे, कइसन आज बा, अउर कइसन कल होइ! साँस थम जाला ई सोच के। एक दिन अइसन आई, जब हर घर में सिर्फ मशीन होइहें। लइका मशीन नियर पैदा होइहें, मशीन नियर खेलिहें अउर मशीन नियर मर जइहें। प्रकृति रोअत बिया, ई धरती प्लास्टिक के बोझ से कराहतिया, बाकिर हमनी के अन्हार कुआँ में गिरत जा तानी जा।
एगो बात बताईं? परसों रात के जब पूरा सहर सो गइल रहे, हम अपनी घर के कबाड़खाना में गइनी। उहाँ धूल से तोपाइल एगो पुरान संदूक रहे। ओकरा के खोलनी त ओकरा भीतर ओही पुरान माटी के गुड़िया क एगो कलाई मिलल। ऊ कलाई कवनो केमिकल क ना रहे, ओकरा में हमरी माई के नेह क सुगन्ध रहे। हम ओकरा के हाथ में उठवनी अउर जइसे ही ओकरा के अपनी छाती से लगवनी, ओकरा भीतर से कवनो रोए क आवाज़ आईल।
हम डर गइनी। मोबाइल क फ़्लैश जला के देखनी। ऊ माटी क टूटल हाथ रोअत ना रहे, ओकरा में से खून चूअत रहे। अउर बगल में बइठल हमार आपन लइका, अपनी हाथ में चमचमात भइल नया मोबाइल लेले, अइसा बेजान आँखि से हमके देखलस जइसे ऊ कवनो ज़िंदा इंसान ना, बल्कि ओही प्लास्टिक क एगो रोबोट होखे। हमार करेजा मुट्ठी में आ गइल। हम ओकरा के गोदी में उठावे खातिर हाथ बढ़वनी, बाकिर ऊ हमके पहचिनबे ना कइलस। ओकर हाथ एकदम ठंढा रहे… कड़कड़ात प्लास्टिक नियर, बेजान, एकदम बेजान। हम चिल्लाए के चाहनी, बाकिर हलक से कवनो बोली ना निकलल। सिरिफ एक गो आह निकलल, जे कबाड़खाना के ओही अन्हार में दम तोड़ देलस।
- डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’
(73 8657 8657), बनारस