अइसे त उनकर नाम रघुनाथ मिसिर ह, बाकिर गाँव में बड़ से छोट तक सभे उनका के रघ्घू, बाबा के नाम से जानेला आ पुकारेला। घर के हाता में, नीम के छाँह तरे रघ्घू बाबा खटिया पर लेटल रहन। उनकर दिन के अधिकाह समय एकरे छांह में बीते ला। घर के भीतर जाये से घबड़ा लन। कभी आँगनैया बाल-बच्चन से गुलजार रहत रहे, आजु सन्नाटा के राज बा।
उनकर मेहरारू,एकलउता बेटा,पतोह आ पाँच बरीस के पोता,नाव से नदी पार करत घड़ी, बढ़िआइल नदी के भेंट चढ़ गइल रहन। खाली तीन बरीस के पोती, मुनिया के मलाह बचा सकल रहन।
ओह हादसा के बाद रघ्घू बाबा के जीवन मुनिया के ईर्द-गिर्द घूमे लागल। उनकर घर संभाले वाली अनुचरी गीता के गोद में मुनिया पले लागल। गीता आ ओकर मरद सोहन खेती-बाड़ी से लेके घर के सारा काम संभालत रहन। धीरे-धीरे जिंदगी फेर पटरी पर आवे लागल। लेकिन बिधना के मन त कुछ आउर रहे।
दू साल बाद, बरसात के शुरूआत रहे। शहर में जेमिनी सरकस आइल रहे। गाँव के कुछ मरद औरत के एगो टोली दिन के तीन बजे वाला खेल देखे जाय वाला रहे। मुनिया सरकस देखे खातिर मचल उठल। औरतन के सिफारिस पर रघ्घू बाबा के मन बदल गइल। टिकट के रुपिया दल के मेठ के देत बेरा कहलन,
“मुनिया के अकेले मत छोड़िहऽ लोग।”
पाँच बरस के मुनिया उछलत-कूदत सरकस देखे चल गइल। आखिरी खेला चलत रहे,तबे आँधी-पानी शुरू हो गइल। तमाशा खतम होते ही निकसे के जल्दीबाजी में ठेला-ठेली शुरू हो गइल। बाहर भी अगला शो के दर्शक जमा रहन। जोर से बिजली कड़कल, आ केने से दो एक गो बिदुकल साँड़ आ गइल। भगदड़ मच गइल। ओही घड़ी बिजली भी गुल हो गइल। घुप्प अँधेरा छा गइल। ओह बिपदा में मुनिया गाँव के लोग से बिछुड़ गइल।
मुनिया के खोज में गाँव के लोग कोई कोर कसर ना छोड़लन। मुनिया ना मिलल। थक-हारके लोग पुलिस भरोसे खोजल छोड़ देहलन। रघ्घू बाबा आस ना छोड़लन। उनका बिसवास बा कि एक दिन ऊ मिली जरूर।
“रघ्घू बाबा कहॅंवा चल गइल रहीं?”
लखन के माई के आवाज से रघ्घू बाबा के धियान टूटल। पूछलन, “के हऽ? लखना के माई?”
“हॅं।”
“ थाना गइल रहीं । खाली हाथ लउट अइनी। जाने किस्मत में का लिखवा बा!”
“ बिना जलखई के निकस गइलीं। गीतवा गरग-गरम कचउड़ी आउर घुघनी हमरा के थमा गइल बिया। ले के आवत बानी।”
लखन के घर बगल में ही रहे। ऊ जलखई लेके अइली आ रघ्घू बाबा के सामने धरऽत कहली, “गरम-गरम खइतीं तब न सवाद मिलित। ठंढ़ा कचउड़ी चीमड़ भ गइल होई आ घुघनी बेसवाद।”
“ जिनगिये बेसवाद भऽ गइल बा लखना के माई । अब का सवाद आ बेसवाद!”
रघुनाथ बाबा के टूअर अइसन उदास बोली सुन के लखन के माई के मन भर आइल।
दिन के खाना बनावे खातिर गीता अइली। ओकर घर, रघ्घू बाबा के घर के ठीक पिछे बा ! दूनों घर के अंगनाई के अलग करत ईंट-सिमेंट के दिवाल खड़ा बा। एह से रघ्घू बाबा के घरे चहुँपे खातिर, गीता के गली के चक्कर काट के आवेके पड़ेला। रघ्घू बाबा खटिया पर खरहरे सुतऽल रहन। सबेरे वाला जलखई असही खटिया के सिरहाने जमीन पर धइल रहे। मख्खी भिनभिनात रही स। खटिया पर खरहरे सुतल देख के ओकर ममत जाग उठल। छिपुली आ कटोरी उठाके जलखई के घूरा पर फेंके चल देली।
“केतना मन से इनकर पसन के बनऽवले रहीं, सब अकारथ गइल।”, जूठा फेंक के अइली त रघुनाथ बाबा के जगऽवली, “रघ्घू बाबा उठीं। दिन निकहा चढ़ गइल बा।”
“गीता बबुनी?”
“हॅं। खाना बनाईं कि उपासे रहब?”
“खिचड़ी आउर आलू के चोखा बनाव जल्दी से। भूख लागल बा।”
“लागी ना ! काल्ह रात के भी कुछुओ ना खइनी। खाइब ना त सरीर कमजोर होत चल जाइ। जिनगी अपने दम जीये के होला बाबा!” गीता के बोली में मन के नेह भरल रहे।
“जिनगी कसहूँ कटत ही जाई, गीता बबुनी!”
गीता के ऑंख भर आइल।
“अइसन मत सोचीं! नजरिया बदलीं,जिनगी में मुसुकान भर जाई। बाबा आस के अँचरा बरीयार होखे ला।”
मुनिया के बिछुड़ला दस बरीस हो गइल रहे। रघ्घू बाबा ओकर आस छोड़ चुकल रहन, लेकिन ओकर ईयाद पिछा ना छोड़त रहे। अपना के पूजा-पाठ, आ धरम-करम में लगवले रखत रहन। ओह दिनवा सनीचर रहे। ऊ महाबीर मंदिर से लवटत रहन। उनकरा साथे गाँव के सूरज देव मास्टर भी रहन। रास्ता में सूरज देव कहलन,
“ रघ्घू बाबा भभिस्य के केहू ना जाने। हमार मानीं त कोई लड़का भा लड़की के गोद ले लीहीं।”
“सुझाव त नेक हऽवऽ।”
रास्ता में रघ्घू बाबा के पैर गढ्ढा में पड़ गइल। लड़खड़इलन, त सूरज देव थाम लेलन।
“अकेले मत निकलल करीं। दूनों अँखियन में माड़ा बा, ठीक से देखाई नइखे देत। आपरेसन काहे नइखी करवा लेत?”
“ मन बना लेने बानी। जल्दीए कराइब।”
ऐने दू दिन से रघ्घू बाबा बुखार में पड़ल रहन। बैसाख के महीना रहे। ऊपर आग बरसावत सूरूज आ नीचे धधकत धरती। गीता रघ्घू बाबा खातिर काढ़ा लेले भुनभुनात लंगड़ात अइली, “कब से कहत बानी कि अँगना वाला भितिया में एकगो दरवाजा फोरवा दीं। रात-बिरात कब जरूरत पड़ जाय, के जानत बा।”
रघ्घू बाबा के नजर गीता के पट्टी बन्हल गोड़ पर पड़ल।
“ पैर में का भऽ गइल?”
“कुछुओ ना। तलवा में हलका फोरा पड़ गइल हा,ठीक हो जाई।”
फोड़ा के कारन समझत देर ना लागल, रघ्घू बाबा के। कुछ बोललन ना। गीता आउर सोहन, दूनो बेकत के निसवारथ ,निरमल मन उनका से छिपल ना रहे। कई दिन से उनका मन में कुछ बिचार आकार लेत रहे। आज साकार करे के निरनय मन में बइठ गइल।
दू दिन बाद आँगन के भितिया में दरवाजा फोरवा देल गइल।
बरसात खतम होते ही गीता-सोहन के देखरेख में रघ्घू बाबा एक आँख के आपरेसन करवा लेलन। आँख में दवाई डालत गीता हँसत कहली, “अब बुझात बा दरवाजा फोरवावे के फायदा?”
” परिवार रहला के ई हे त सुख ह गीता बबुनी।”
कुछ दिन बाद रघ्घू बाबा आपन कुल जायदाद के वसीयतनामा सोहन आ गीता के नाम लिख देलन। अगला मंगलवार दुपहरिया बाद रजिस्ट्री होखे वाला रहे। रघ्घू बाबा हनुमान मंदिर से सूरज देव के साथे लवटत रहन। रघ्घू बाबा के खोजत गीता भेंटा गइली। ऊ बहुत खुश आ उतसाहित रहे। हाथ के सरकारी नोटिस बाबा के देत कहली,
“बाबा मुनिया मिल गइल।”
नोटिस पढ़के सूरज देव मोबाइल पर तुरत थाना इंचार्ज से बात कइलन। बात करके रघ्घु बाबा के बतवलन, “हमनी के महिला पुलिस स्टेशन चलके पहचान करे के पड़ी। रउआ घरे जाके तइयार होखीं। हम मोटरसाइकिल लेके आवत बानी।”
आस-नीरास के बीच झूलत रघुनाथ बाबा महिला थाना के अंदर पाँव रखलन। महिला थानाप्रभारी बतवली कि पुलिस के हालिया दबिश में एगो लड़की बरामद भइल बिया। पूछताछ में ऊ आपन नाम मुनिया बतवले बिया। पुरान गुमशुदगी अभिलेख से मिलान के बाद रघ्घू बाबा के बुलावल गइल रहे।
कुछ कागज पर दस्तखत कराके उनका के लड़की के पास ले गइली थानाप्रभारी। लड़की डेराइल-घबड़ाइल सिमटल, टुअर अइसन टुकुर-टुकुर देखत रहे। रघ्घू बाबा दरोगा जी से कहलन,
“ मुनिया घबडाइल बिआ। हमरा के अकेला में बात करे दीं त बड़ किरपा होई।”
“ठीक बा बाबा। देरी जनि करब।” कह के थानाप्रभारी चल गइली।
रघ्घू बाबा लड़की के गौर से देखे लगलन। पंद्रह बरस के लड़की में पाँच बरीस के मुनिया के खोजत रहन। कभी बुझाय कि ओकर चेहरा में उनकर मुनिया झलकत बिआ,त कभी बेगाना अइसन। कब हूँ ओकरा में बेटा के अइसन नाक आ दादी अइसन लिलार देखाई पड़े,त अगले छन एकदमे अलग। ऊहापोह से निजात पावे के प्रयास में पूछलन,
“पहचानत बाड़ू हमरा के,हम के हईं?”
“ना। हमार नाम मुनिया हऽ, लेकिन ना रउआ के पहिचान पावत बानी, ना इयाद हमार साथ देता। सब धुआँस रहल बा।”
निरास होके जसही बाहर जाए खातिर मुड़लन, लड़की उनकर पाँव पकड़ के बिलखे लागल ,
“बाबा छोड़के मत जाईं।”
रघुनाथ बाबा बुत बनल खड़ा रहन। रघ्घू बाबा के मन डगमगात रहे। भीतर भीसन द्वंद्व चलत रहे ।
“अगर ई हमार मुनिया ना होखे त? आ अगर ई हे होखे तब?”
“बाबा, दरिंदवन के हवाले मत करीं! सड़क पर अकेले रोअत-बिलखत अबोध बच्ची के करेजा से लगाके जवन माई-बाबू हमरा के पलले-पोसले रहन, ऊ अब ई दुनिया में नइखन।” लड़किया के लोर उनकर पाँव पखारत रहे।
“हमरा के बेटी ना त नौकरानी समझ के ही रख लीं। कोई सिकायत के मउका ना देब।”
रघ्घू बाबा धरमसंकट में पड़ल रहन।
दोसरा के मुनिया के आपन मान के रखल कहाँ तक जायज बा? आउर नइखी मानत, त ई अनाथ असहाय लड़की के फेर ओही बेरम दुनिया के हवाले करल पाप ना होखी? एक ओर वात्सल्य से भरल हृदय, असहाय के प्रति कर्तव्य और करुणा, आ खुद के अकेलापन और दूसर ओर मुनिया के चेहरा में माई-बाप, दादा-दादी के चेहरा खोजत गाँव के लोग के खोजी नजर। निरनय हर छन कठिन होत जात रहे। अंत में उधेड़बुन से बाहर निकल अटल निर्णय लेलन। ‘लोग जे समझे, समझत रहे। हम कहतनी कि ई हमार पोती मुनिया हऽ।’
मुसकइलन आ कहलन, “ लोर पोंछ बेटी। तूँही त रघ्घू बाबा के पोती, मुनिया हऊ। रोअल बंद करऽ।”
काफी दौड़-धूप और कानूनी कार्रवाई के बाद ‘बाल कल्याण समिति’ से मुनिया के लेके, रघ्घू बाबा घरे अइलन।
रास्ता में रघ्घु बाबा सूरज देव से कहलन, “आजु बरिसों बाद मन अँजोरिया से भर गइल।”
निसन्तान गीता ओकरा के टीका लगा के आरती उतारत रही, त कहलन “ तोहार बेटी ह ई। एकरे कमी रह गइल रहे तोहार जिनगी में,आज उहो पूरा हो गइल।”
गीता के आँख भर आइल आ मुनिया के करेजा से लगा लिहलीं।
- शरण आशुतोष
पटना