कतों सत्ता लोलुपता का चलते सत्ता के स्वामी लोग के करतूत, ओकरा चलते समाज के , नवहा लोगन के भा बच्चा-बुतरु सभ के बिखियाइल नजायज कइसे बा, परिभाषित नइखे कइल जा सकत। कुछ लाख लोगन का चलते डेढ़ अरब जनता के दरकिनार क के देखत सरकार अब कुरसी का छोड़ अउर कवनो बात समुझे-बुझे के तइयार नइखे देखात । सरकार के भाषा हिटलर , मुसोलिनी भा रावण आ कंस के भाषा लेखा बन चुकल बा। आपुसे में बिख के खेती करत-करावत सरकार आ सरकारी तंत्र अपना गुरूर में आन्हर हो चुकल बा। एस सी /एस टी , यू जी सी जइसन कानून एगो खास वर्ग के बिरोध में लिया के देस के गृह युद्ध में ढकेले के परयास लेखा बा। मंहगाई का चलते आम जिनगी गवें-गवें दुरूह भइल जात बा।शिक्षा चौदहवीं क चाँद बनि चुकल बा। सरकार आ शासन-प्रसासन में बइठल लोग बस आपन घर भरे में लागल बा।
भाषा, साहित्य आ संस्कृति के हाल त कहे-सुने जोग बचले नइखे । सरकार अकादमियन के ज़मींदोज़ करे में जी-जान से जुटल बा भा ओह ओर देखलो नइखे चाहत, कहल ना जा सके।बिहार, उत्तर प्रदेश भा दिल्ली के अकादमी आ ओहसे आस लगवले साहित्यकार लोगन के स्थिति साँप-छछूंदर लेखा हो चुकल बा। सरकार का लगे कलाकार/साहित्यकार लोग खातिर समये नइखे। हाँ , टिनहिया कलाकारन के सरकार में बइठावे के जुगत जरूर बा। जे लोग भाषा/ संस्कृति के मान मर्दन कइले बा, आज सरकार में बा। एह बातिन के लेके कवनो आंदोलन खड़ा होत बा , त ओहमें सरकार में बइठल लोगन के विदेशी हाथ लउके लागत बा। मने सरकार अपने कर्तव्य के तिलांजलि दे चुकल बा।
जंतर-मंतर पर एक का बाद एक रैली आ ओहमें जुटत जन समूह बहुत कुछ कह रहल बा। सरकार हर बात के बरजोरी दबावे में लागल बा। लइका, लइकी , मरद , मेहरारू, बुढ़-पुरनिया सभे पर लाठी भांजल सरकार के आदत बनि चुकल बा।चउथा स्तम्भ सरकार के तोता बनि के जनता के गुमराह करि रहल बा । एकरा इतर चले वाला पत्रकार लोग के अपना रोजी-रोटी से विलग कइल जा रहल बा भा कवनो एक्ट में जेहल भेंजल जा रहल बा। बौद्धिक तंत्र के कुंद करि के माला पकड़ा दीहल गइल बा। मने सड़क से संसद तक अराजकता के महल खड़ा कर दीहल गइल बा। सवाल पूछल जुर्म हो चुकल बा।
प्रकृति के कहर अलगे बा । कतों सुखाड़ त कतों दहार । खेती-किसानी से नवकी पीढ़ी के पलायन पर ना त कतों बात-बतकही होत बा आ नाही ओकरे निवारन के कवनो उपाय। जनसंख्या सुरसा के मुँह लेखा बढ़ले जा रहल बा। अपनइत के चिता में आग लगले जमाना हो गइल। फेर बचल का बा । एक-दोसरा के लूटे-खसोटे आ टँगरी खींचे के कवायद। आजु के आपन बा, एह पर कुछ कहल आ तथाकथित आपने पर सहज में बिसवास कइल बहुते मोसकिल हो चुकल बा। मुँह में राम , बगल में छुरी लेहले फिरे वाले लोगन के जनसंख्या बढ़ते जा रहल बा। एक भाई दोसरा भाई के हिस्सा खाये में प्राण-पन से जुटल बा आ मोका लगते नटई दबावे में ओकरा सोचहूँ के नइखे परत। कतने मई-बाबू लोग अइसने के साथ देखाई दे रहल बाड़ें। इहो ढेर बाउर बाति बा, जवना पर सभे के सोचे के जरूरत बा।
अइसन स्थिति-परिस्थिति से ना त लेखक लोग बाचल बा आ ना त संपादके बाचल बाड़ें। पढ़निहार लोगन के अकाल त सभे भाषा-साहित्य में बा। फेर भोजपुरी जइसन बेगर मान्यता वाली भाषन के स्थिति सोचनीय त रहबे करी भा ई कहीं कि बड़ले बा। एकरा बादो अगर कतों आस के किरन लउकत होखी त उ साहित्ये में होखी। जहाँ आस बा,उमेद बा, उहाँ का बारे में सोचलो जरूरी बा आ कुछ कइलो जरूरी बा। अइसने कुल्हि आरोह आ अवरोह से जूझत भोजपुरी साहित्य सरिता के टटका अंक रउवा सभे के हाथ में सँउप रहल बानी । जय भोजपुरी ।
- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
संपादक
भोजपुरी साहित्य सरिता