कठपुतरी नियर काठ के घोड़ा पर बइठ के जब लइका हँसत रहे, तब ई माटी कइसन महकत रहे, याद बा? ओह घरी, जब सांझ के अन्हरिया दुआर पर आके गोड़ पसारत रहे, तब एगो लइकी अपने आँचरा में कपड़ा के गुड़िया छिपइले रसोई के कोना में बइठ जात रहे। ऊ गुड़िया ना रहे, ओकर करेजा रहे। माटी के चूल्हा, काठ के चकई, अउर बाँस के कमान से छूटल तीर… ई सब कवनो खेल ना रहे भाई, ई त पूरा क पूरा जिनगी रहे। लइके के हाथ में जब माटी के…
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