भोजपुरी में गद्य से शुरुआत करिके पद्य के दुनियाँ में उतरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार चंद्रेश्वर जी के पहिला भोजपुरी कविता -संग्रह ‘गोहार ‘ के पढ़े से पहिले हम ‘कवि का ओर से दूर गो बात ‘ के पढ़े लगनीं।अपना एह आत्मकथ्य में कवि कविता के लेके कुछ साफ-साफ बतकही कइले बाड़न।उनकर कहनाम बा – 1-” कविता सच्चाइयन से जोड़ के मनुष्य-जीवन के एगो गति प्रदान करेले।××××× सभ्यता -संस्कृति के रचे-गढ़े में मय संसार में ओकर योगदान विशेष रहल बा।ऊ प्रेम आ प्रतिरोध साथ लेके आपन जय-जतरा प निकलेले।”…
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एगो मसखरापन के भाव-कुभाव सब जगह हावी बा
1.एगो भोजपुरी निरगुन के मरम “सभकर ख़ूनवा एकही रे हऊवे, धरमवा अलगा – अलगा बा। केहू माई-बाप के चरनिया के धोवे, केहू के माई-बाप दिन -रात रोवे। माई के ममता एकही रे हऊवे, ललनवा अलगा – अलगा बा। हीरा जनम पवल- s सुंदर तन हो, तब काहे गंदा बाटे तोहार मन हो। सभकर नेहिया एकही रे हऊवे,बिचारवा अलगा-अलगा बा।” एह भोजपुरी पारंपरिक निर्गुण में जीवन के जइसे मए मरम राखि दिहल गइल बा। सभकर ख़ून के रंग एकही होला,लाल रंग। धरम अलग-अलग होला। अर्थात् धरम इंसानियत के बांटे के काम…
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