भोजपुरी नाटक के विविध रूप

नाटक एगो अइसन विधा ह, जवना के ब्रह्म आँख से देख के कान से सुन के होला। ई विधा बहुत पुरान ह। एकरा सम्बन्ध में कई प्रकार के मत पावल जाला। नाटक के उत्पत्ति का विषय में एगो कथा बा कि सब देवता लोग ब्रह्मा जी के पास में गइल लोग आ काहल लोग कि एह शृष्टि में मनोरंजन के कवनों व्यवस्था कइल जाव। ब्रह्मा जी शृग वेद से कथानक,सामवेद से संगीत अथर्व वेद से रस आ अजुर्वेद से अभिनय लेके पांचवा वेद नाट्य वेद के अवतारना कइनी। ओकरा बाद…

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चंदेश्वर के कविता संग्रह ‘गोहार ‘पढ़ला-गुनला के बाद —

भोजपुरी में गद्य से शुरुआत करिके पद्य के दुनियाँ में उतरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार चंद्रेश्वर जी के पहिला भोजपुरी कविता -संग्रह ‘गोहार ‘ के पढ़े से पहिले हम ‘कवि का ओर से दूर गो बात ‘ के पढ़े लगनीं।अपना एह आत्मकथ्य में कवि कविता के लेके कुछ साफ-साफ बतकही कइले बाड़न।उनकर कहनाम बा – 1-” कविता सच्चाइयन से जोड़ के मनुष्य-जीवन के एगो गति प्रदान करेले।××××× सभ्यता -संस्कृति के रचे-गढ़े में मय संसार में ओकर योगदान विशेष रहल बा।ऊ प्रेम आ प्रतिरोध साथ लेके आपन जय-जतरा प निकलेले।”…

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गंगा के नवगीत भीतर भाव के उत्पात

भोजपुरी साहित्यांगन के एगो चमकत सितारा गंगा बाबू, हँ गंगा प्रसाद अरुण के भोजपुरी काव्य संसार में आपन विशेष पहचान बा। गंगा बाबू के कलम भोजपुरी के हर विधा के समृद्ध कइले बा बाकिर उहां के प्रिय विधा काव्य रहे। कविता में उहाँ के गीत, नवगीत, हाइकु, गजल आ दूसरों विधा में खूब कलम चलवनीं बाकिर उनुका भीतर गीत – नवगीत के अजस्त्र धारा बहत रहत रहे। उहाँ के भोजपुरी गीत – नवगीत संसार के एगो विशेष पहचान देनीं। मंच से लेके पुस्तक आ पत्रिकन तक में। उहाँ के ‘…

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भोजपुरी साहित्य के काल विभाजन

कवनो भाषा के परिचय के मतलब होला ओकरा उत्पत्ति से लेके वर्तमान तक के क्रम बद्ध गतिविधि के विस्तार पूर्वक जानल भा जानकारी प्राप्त कइल। भोजपुरी हिन्द आर्यन  भाषा परिवार के एगो सशक्त भाषा ह,जवना के उत्पत्ति मागधी,प्राकृत आ ओकरा अपभ्रंश से भइल मानल जाला। आजु भोजपुरी के सर्वमान्य लिपि देवनागरी लिपि बा। पहिले से शुरू कके आज ले गौरवशाली भोजपुरियन के चित्त, चिंतन ,चेतना में हो रहल परिवर्तन , परिमार्जन के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में समसामयिक बदलाव के दस्तावेजीकरण  के भोजपुरी साहित्य के इतिहास कहल जा सकेला । साहित्य…

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मारीसस देस के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत

सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन ।। मारीसस में “गिरमिटिया” पीड़ा, संघर्ष आ अस्मिता के जवन इतिहास हौ, उ ओकरा के गीत, कविता आ भावनात्मक अभिव्यक्ति में ढाल के अमर कर देहलन ।। “गिरमिटिया आत्मा के आवाज़ रहलन ब्रजेंद्र मधुकर भगत”…

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भोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?

भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद जइसन देशन ले फैल गइल बा। लगभग 20–25 करोड़ लोग भोजपुरी समझेला या बोलेला। बावजूद एह सब के, आज ई भाषा आपन घरे में आपन आस्तित्व के संकट से जूझत बिया। सबसे बड़…

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भोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा

भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि “लोकप्रिय गीतन” के उभरेला  ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से कहीं जादे व्यापक बा। भोजपुरी ना त खाली “मौसमी” गीतन के भासा ह, न खाली मनोरंजन के साधन; ई संघर्ष, करुणा, त्याग, समर्पण, श्रम, वियोग अउर मुक्ति के जियत-जागत सांस्कृतिक दस्तावेज ह। त्याग अउर समर्पण…

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भोजपुरी गीतन में होली वर्णन

  भोजपुरिया धरती उत्सवधर्मी  धरती ह। भोजपुरिया लोकजीवन मुख्य रूप से खेती-किसानी पर आधारित बाटे ना, त मेहनत मजदूरी पर। भोजपुरिया लोकजीवन के हर एक परब त्योहार कृषि से जुड़ल बाटे। एह त्योहारन में होली-फगुआ के त कहहीं के का बा?घर के कोठिला में घान-चाउर भरल रहेला, बघार में गेहूँ गदरात रहेला,आम-महुआ मोजरात रहेला आ सरसो पिअर रंग फुलाए लागेला,त समझीं बसंत आ गइल बा। किसान-मजदूर देख-देख हरखित होला आ बसंत पंचमी से शुरू होखे वाला होरी के उत्सव अबीर खेल के शुरू करेला आ लगभग चालीस दिन तक एह…

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फगुआ के लोक-दर्शन : राग से विराग तक

फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला। मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।” बसंत के राजसी छटा खाली मौसम के बदलाव ना, बलुक विज्ञान से लेके मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आ आध्यात्मिकता तक के गहिर ताना-बाना में गूँथल बा। फगुआ–होली भारत के समेकित जीवन-अनुभव के रंग-बिरंग उत्सव ह, जेकरा…

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भोजपुरी लेखन आ प्रकाशन-2025

भोजपुरी साहित्य आ संस्कृति के विकास के दिसाँई भोजपुरी समाज निरंतर प्रयासरत बा।भोजपुरी- विकास खातिर दर्जनन भोजपुरी संस्था लगातार कार्यक्रम आयोजित करत रहल बाड़ी सँ।साहित्यकार -कलाकार-राजनेता सभे अपना ओर से भोजपुरी के विकास खातिर हर संभव प्रयास कर रहल बा।भोजपुरी साहित्य के विकास के दिसाँई सबहर रचनात्मक प्रयास चल रहल बा।हर तरे के बिधन में विविध विषय-वस्तु पर रचनाकार लोग कलम चला रहल बा।अश्लीलतापरक गायन के मुखर विरोध हो रहल बा।सार्थक आ सोद्देश्य गायकी के सराहना मिल रहल बा।धीर-धीरे अश्लीलता आ जातीयतापरक गायन के प्रतिरोध में समानान्तर रूप से आज…

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