एगो गाँव रहल जेकर नाम रहे -अमवा घाट। शांत-सुकून से भरल, खेत-खरिहान, नदी-नाला, आ चिरई-चुरगुन के बोल से रजगज।ओही गाँव में रहलन– लोग त “कवि जी” उनका के कहत रहे बाकिर उनकर असली नाम रामेश्वर प्रसाद मिश्र रहल। उनकर कवितई अइसन रहे कि लोग उनकर असली नाम बिसार दिहले।
कवि जी कइसे कवि बनलन, ई कहानी बड़ा मजेदार बा।
कवि जी रोज बिहाने बिहाने नदी किनारे टहले जास। ओहि किनारे एगो पुरान पीपर के नीचे बइठ जात रहलन । उनके पास ना कागज रहत रहे, ना कलम— बाकिर दिमाग में कविता उमड़ के आइए जात रहे। ओह घरी कवि जी खूब मगन होके कविता वाचन करस।बाकिर सुनवइया केहु ना रहे।कबो कबो लोग आवत जात उनका के बोलत सुने त कहे-पागल हउव का?अकेलहीं बुदबुदा ताड़।ऊं हँस के कहस- नवका कविता फुटल बा आईं बइठीं तो सुना देब। बाकिर भोरे भोर काम पर भागे वाला मनई के कविता सुने के कहाँ फुरसत।
एक दिन गाँव के स्कूल में “कविता प्रतियोगिता” रखल गइल। मास्टर साहेब कवि जी के नेवता पेठइलन—
“कवि जी! आके एह में आपन कविता सुनाईं।”
कवि जी त आ गइलन ।एक आदमी कहलन – आ इनका लगे ना काँपी बा ना डायरी ,का सुनइहें! कवि जी के कान तक ई बात पहुंच गइल । ऊ सकुचात बोललें—
“हमरा से कविता त कागज पर ना लिखाला बलुक दिमाग में बस आपे उतर जाला।”
इसकुल के लड़िका-लइकी सब त बड़ा उत्साहित रहलन । मंच त सजल रहल बस जइसहीं गाँव के लोग जुटान भइल त कवि जी मंच पर चढ़लन।
सबके मन में उत्सुकता रहे – कवि जी का सुनइहें?
कवि जी आँख मूँदलन, माथ पर हाथ फेरलन, आ गला खँखारलन।फिर अचानक गइलन—
“आकाश में उड़े एक चिरई,
साँझ भइल त लौटल मड़ई,
जेकरे दिल में प्रेम न बसल,
ओकरे खेत ना उगे फसल।”
सब लोग ताली पीट देलक, खूब ताली पिटाइल ।मास्टर साहेब पूछलें—
“कवि जी! ई कविता कहाँ से सूझेला ?”
कवि जी मुस्कुरा के बोललन—
“भइया, कविता हम ना बनावेनी… उ त आपन रास्ता खोज के हमरा दिमाग में खुदहीं आ जाले।”कवि जी गदगद हो गइले। आखिर आज उनकरा कविता के शाबासी मिलिए गइल।अबकी कवि जी के नाम गाँव से बहरी भी गइल।
एक दिन शहर से एगो बड़का लेखक गाँव के कार्यक्रम में कवि जी के कवितई के तारीफ सुन के अइलन। उ कवि जी के खोजत-खोजत पीपर गाछ के नीचे पहुँच गइलें। देखलें– कवि जी चुपचाप नदी देख के हँसत जात बाड़न।
ई देखके लेखक पूछलें—
“का कवि जी, कविता खाली हँसले से बन जाला का?”
कवि जी जवाब देलन—
“नदी जइसे आपन धार बहावत रहेला; ओसहीं हमारा मन कविता बहावत रहेला। हम त बस महसूस कर रहल बानी ,
ओकरे आनंद से मुख मुस्करा रहल बानी। ।”
जबाब सुन के लेखक प्रभावित हो के कहलें— राउर कविता छपी तबे नु सभका तक पहुंची आ राउर नाम होई।”
कवि जी हँसत बोललन—
“हमार कविता कागज पर कैदी बन के ना रह पाई। ई त-
हवा में उड़ेले,
नदी में बहेले,
गाँव में रहेले,
मनई के कहेले,
आ गाँवे के बोली-बानी में मिल जाले।”
लेखक खूब प्रभावित भइले बाकिर कवि जी कविता कागद पर उतरवावे खातिर तैयार ना भइले। हार पछता के लेखक लौट गइले।
धीरे-धीरे कवि जी के नाम दूर-दूर तक फइल गइल। अब लोग उनका के कहे लागल—“ मुखी कवि जी,जिनकर कविता कागज पर ना,दिल में छपेला।”
एक दिन फेर लेखक मुखी कवि जी से मिले खातिर गाँव अइलन। ऊ बड़ी मिन्नत कइलन कि कवि जी अपना साथे कुछ दिन उनका के राखस आ अपना नियन कविता लिखे के सिखावस काहे कि उ छंद में लिखे ना जानत रहलन बाकिर छंद उनका खूबे पसंद आवे। मुखी कवि मान मनौव्वल के बाद उनका संगे रखे के तैयार हो गइले। धीरे धीरे दुनु जन आपन कविता के बखान एक दुसरा से करे लगले।तनिके समय में दोस्ती नजदीकी में बदल गइल रहे।एक दिन लेखक कहले कि हमर मेहरारू पहिले कविता छंद में सुनावत रहली ऊ ढेरे लिखले बाड़ी।जब खुश रहेली त गावत कय बार सुनले बानी। बड़ा नीक लागेला।बाकिर बाद में कहे लगली कि अब हमार मन इ कवितई से उचट गइल बा एहसे अब ना गावेली ना लिखेली। एगो कविता उहे लिखले बाड़ी बाकिर ओकरा के अधूरा छोड़ दिहले बाड़ी । हमरा ऊ बहुते पसंद बा। कय बार ओकरा के हम पुरावे के कोशिश कइनी बाकिर अंतरा पहिलका नियन जमल ना। हम त गद्य लिखे के ज्यादा पसंद करीले।पद पर हमार पकड़ कमजोर बा।एही से जब रउआ लगे आइल बानी त सोचतानी रउआ एकरा के जरूर पूरा देब।रउआ के सुनाईं का! मुखी कहलन-सुनाईं! देखीं तनी।पूरे लायक होई त पूरा देब।लेखक जइसे कविता शुरू कइले मुखी के मुँह खुलले रह गइल। कविता खतम भइला पर लेखक कहले अगिला बंद बनाईं त।
मुखी के त काठ मार गइल। धीरे से कहलें- रउरा यकीन बा,ई उहे लिखले बाड़ी। कबो उनका के लिखत देखले बानी।
तनी सकुचात-मुस्कात कहलन- लिखत त देखले नइखीं कबो।बाकिर गावत पढत सुनले बानी।मुखी कहलन-रूकीं! फेर पाकिट से एगो फटहीं आ मुचराइल छोटहन डायरी निकाल के एगो पेज खोल के लेखक के आगे कर देहलन।लीहीं देखीं त इहे बंद रहल ह नु। लेखक भौंचक्का! रउरा लगे कइसे? कवि जी कहलन- ईहो हमरे लिखल ह। ऊ गइली त साथे ले गइली। ओही घरी से प्रेमगीत हम कबो लिखबे ना कइनी। पहिले हम बड़ी मिज़ाज वाला रहनी। स्कूल में उनका से भेंट भइल त कविता हमरा हृदय में जनमल ।हम खूब लिखीं आ जब उ हमरा आसपास होखस त उनके बहाने से हम आपन कविता सुनाईं।ऊ सुन के खूब हमर तारीफ करस।हम एकरा के धीरे धीरे आपन जिनिगी बुझे लगनी। कबो-कबो ऊ हमर गीत के नया राग बना के हमरा के सुनावत रहली। बाकिर उनकर आपन दुनिया रहे जवना में ऊ मगन रहत रहली।एक दिन हम उनका के आपन डायरी में लिखल सब गीत दे दिहनी ई कहके कि तुम बहुत अच्छा गाती हो।
फेर त दोस्ती बढ़े लागल। एक दिन एही नदी किनारे पिकनिक पर सब दोस्त इकट्ठा भइनी त उ हमार डायरी हमके वापस कर देहली।कहली कि जे हमरा ठीक लागल ह उ हम अपना डायरी में उतार लेले बानी। आगे के पढ़ाई ससुराल से होई एह से तहार डायरी तहरा के वापस कर देतबानी।
हमरा त काठ मार गइल। अब जवन रोग अकेलहीं पैदा कइले रहीं ओकर दवाई भी खुदे खोजे के पडल। प्रेमगीत तब से आज ले ना लिखाइल।बाकिर इ नदी के किनार आ इ पीपर गाछ हमर जिनगी बन गइल। कविता के रुप बदल गइल।अब प्रकृति हमार विषय बा। बाकिर ओहिमे राग प्रेम से भर जाला। लंबा साँस लेके मुखी जी कहले – उनका नइखे पता आ कहब मत। कहते कहते मुखी जी लुढक गइले आ उनकर जीवन समाप्त हो गइल।
लेखक बुझ गइले कि वियोग से उपजल गीत के राग काहे एतना मधुर होला। जे कुछ अचानक भइल उ तऽ गाँव में आग जइसन फइल गइल। गाँव भर के लोग मिलके उनकर अंतिम संस्कार कइलन।सब खतम भइला पर लेखक अपना घर के तरफ रूख कइलन। लेखक के मन अपराध बोध से भर गइल रहे।समय बीतल पर अब लेखक के मन राग से भर गइल रहे।ऊ जहाँ जास ओह गीत के सुनावस बाकिर मुखी कवि के नाम से सुनावस।कहस कि अमवा घाट के पीपर अबहियो उनकर कहानी कहेला—
उनका सरल जीवन, उनका सहज हँसी, आ उनका कविता के अजब दुनिया।
कवि जी के सोच असाधारण , — कवि जी बस एही से खास बन गइलें।
अब लोग कहे—
“एगो रहलन— मुखी कवि जी! जे
कागज पर भले कुछ ना लिखलें,
पर लोगन के मन में बहुत कुछ छोड़ गइलें।”
आजुवो गाँव में जब पीपर के नीचे हवा चलेला त लोग कहेला—
“इहे जगह पर एगो रहलन कवि जी… जे चुपचाप दुनिया समझत रहलन ।” पीपर,पतई ,नदी,गाँव आ धरती सबमें कवि जी हमेशा रहिहें।
- डॉ रजनी रंजन
घाटशिला,झारखंड