एगो रहलन कवि जी

एगो गाँव रहल जेकर नाम रहे -अमवा घाट। शांत-सुकून से भरल, खेत-खरिहान, नदी-नाला, आ चिरई-चुरगुन के बोल से रजगज।ओही गाँव में रहलन– लोग त “कवि जी” उनका के कहत रहे बाकिर उनकर असली नाम रामेश्वर प्रसाद मिश्र रहल। उनकर कवितई अइसन रहे कि लोग उनकर असली नाम बिसार दिहले। कवि जी कइसे कवि बनलन, ई कहानी बड़ा मजेदार बा। कवि जी रोज बिहाने बिहाने नदी किनारे टहले जास। ओहि किनारे एगो पुरान पीपर के नीचे बइठ जात रहलन । उनके पास ना कागज रहत रहे, ना कलम— बाकिर दिमाग में…

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फितूर

” चोर चमार गांव में फितूर मचा के रखले रहन सं साला…! बरियात से लवटते बटोराहे भेंटा गइलें सं । लाठी डंडा लेले सभे टूट परल ओहनिन पर। अकेले बंदूक लेले हमहीं । तीन गो के गोली मरनी सरवन के। बाकी लोग लाठी डंडा से मारत मारत भहरा देंले । खदेर खदेर के मरले लोग।  केतना के कपार फूटल। केतना के हाथ टूटल। खूब बढ़िया से थूरा गइले सं । अब नेवर हो जइहे सं । एगो अउरी चीज देखलS लोग कि ना… मारे में कूरिमियों आ अहिरों एक दू…

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पूजा घर

मनोहर दूनों हाथ जोड़ के भगवान से कहलें ” प्रभु हमरा के एगो बड़हन मकान दिहीं ताकि हम रउरा खातिर अलग से पूजा घर बना के राउर पूजा कर सकीं। ” ” हम तहार ई काम नइखीं कर सकत ” भगवान कहलें । ” काहे प्रभु ” मनोहर अचकचा के पूछलें । ” अभी तूं त हमरा के हरदम अपना आँखि के सोझा राखे लऽ । भोरे,सांझ के हमार पूजा करेलऽ । हमरा आगा माथ नवावे ल ।हम जे तहरा बड़हन मकान दे देबि त तूं खाली भोर आ सांझ…

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इहवाँ हमनी के सरकार

लिखल, पढ़ल, सोचल, बोलल मानल जाई तकरार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   हमरे से हौ नून तेल आ हमरे से कानून चाहे रहा तू केरल बबुआ चाहे देहरादून   अगड़ा, पिछड़ा, दलित के खेला सब हमरे ब्योपार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   कबों खातिर एस सी एस टी,कबों के बा यू जी सी बचा-खुचा आरक्षण से, घलुआ बाटे खबर नबीसी   बिना जांच-पड़ताल के बबुआ सुखले खइबा मार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   झगड़ो केहू कतौ भले, खतरा तहनी के सिरे किल्लत के उठी…

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चइता के साध मरि गइलें हो रामा

हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत  महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा…

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तेल के खेल

समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत…

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भोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?

भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद जइसन देशन ले फैल गइल बा। लगभग 20–25 करोड़ लोग भोजपुरी समझेला या बोलेला। बावजूद एह सब के, आज ई भाषा आपन घरे में आपन आस्तित्व के संकट से जूझत बिया। सबसे बड़…

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भोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा

भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि “लोकप्रिय गीतन” के उभरेला  ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से कहीं जादे व्यापक बा। भोजपुरी ना त खाली “मौसमी” गीतन के भासा ह, न खाली मनोरंजन के साधन; ई संघर्ष, करुणा, त्याग, समर्पण, श्रम, वियोग अउर मुक्ति के जियत-जागत सांस्कृतिक दस्तावेज ह। त्याग अउर समर्पण…

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