बड़का रंगदार के

का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के…

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समय का संगे साँप-सीढ़ी के खेला

समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…

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नकाबपोश

“गोड़ लागतानी …… बाबा  !”  पंडी जी के दसई,  फरके से गोड़ लगलें । “जय हो ……!  का आइल बाड़े दसई, कवनो काम का बा रे हमरा से ?” ” हं … बाबा ! तनी गृह प्रवेश के दिन पूछे के रहे रउवा से ” सुन  … दसई अब हम छोट जात में पूजा- पाठ, विवाह – शादी,कथा- वर्ता करावे खातिर अलगा – अलगा रेट बान्ह देले बानी। काम कके कीच कीच कइल ठीक ना लागे। हतना लेलीं, त होतना लेलीं । हं बाकिर चमरन के छोड़ के तोहनी  के…

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मारीसस देस के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत

सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन ।। मारीसस में “गिरमिटिया” पीड़ा, संघर्ष आ अस्मिता के जवन इतिहास हौ, उ ओकरा के गीत, कविता आ भावनात्मक अभिव्यक्ति में ढाल के अमर कर देहलन ।। “गिरमिटिया आत्मा के आवाज़ रहलन ब्रजेंद्र मधुकर भगत”…

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एगो मसखरापन के भाव-कुभाव सब जगह हावी बा

1.एगो भोजपुरी निरगुन के मरम “सभकर ख़ूनवा एकही रे हऊवे, धरमवा अलगा – अलगा बा। केहू माई-बाप के चरनिया के धोवे, केहू के माई-बाप दिन -रात रोवे। माई के ममता एकही रे हऊवे, ललनवा अलगा – अलगा बा। हीरा जनम पवल- s सुंदर तन हो, तब काहे गंदा बाटे तोहार मन हो। सभकर नेहिया एकही रे हऊवे,बिचारवा अलगा-अलगा बा।” एह भोजपुरी पारंपरिक निर्गुण में जीवन के जइसे मए मरम राखि दिहल गइल बा। सभकर ख़ून के रंग एकही होला,लाल रंग। धरम अलग-अलग होला। अर्थात् धरम इंसानियत के बांटे के काम…

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