कजरी

1

अइलें नाही तोहरो बिरनवाँ हो,

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

 

गोतिनी मोरी चलेले अतिराइल

अपने पियवा के रंग में रंगाइल

कि सून लागे हमरा भवनवाँ हो,

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

 

भोरहीं सिवाने सुनाले कजरिया

रहिया निहारत तोहरी गुजरिया

कि मानि लेता हमरा कहनवाँ हो,

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

 

बिरहा के मारल तोहरी सजनियाँ

रतिया सेजिया आवे नाही निनियाँ

कि लोरे सउनाइल नयनवाँ हो,

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

 

आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी

सवनवाँ आई गइलें ननदी।

2

बह· लागल बरखा बयार हो,

नाही अइलें सजनवाँ॥

 

बरसेला सगरों झमाझम पनियाँ

चुवेले मड़इया, चुवय लागल छन्हियाँ

डूबल जाला बहरी ओसार हो,

नाही अइलें सजनवाँ॥

 

भर गइल सभका खेतवा में पनियाँ

भोरहीं से लाग जाई सभाके रोपनियाँ

हुलसिहें रोपना निहार हो,

नाही अइलें सजनवाँ॥

 

भर-भर दिन हम ताकीले रहिया

हमरा बलम जी अइहें कहिया

सून लागे बखरी-बघार हो,

नाही अइलें सजनवाँ॥

3

रहि रहि उमड़े कारी बदरिया

रिमझिम परे फुहरिया ना ।

परे फुहरिया ना हो,

रिमझिम परे फुहरिया ना।

 

पियवा भइल बा परदेसिया

नाही भावे सेजरिया ना।

 

झुलुआ परल कदम के डारि

सखियाँ गावें कजरिया ना।

 

झूलत राधा, झूलें मोहन

बन बन बजे बसुरिया ना।

हमरो सावन हो मनभावन

घरवाँ अवतें संवरिया ना।

 

-जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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