का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के दोसरका भिडियो सोसल मीडिया पर वायरल करे में जी-जान से लाग गइल बा, जवना में मउसम विज्ञानी उनुका संगे ठाढ़ ना होखे के फतिहा पढ़त माटी में मिल जाए के कवल उठा रहल बाड़ें। ओह घरी गोतिया के पाँत वाला लोग थपरी से मेज बजा रहल बा आ दयाद लोग बगली झाँक रहल बा। बगली झाँके वाला लोग मने मन कुछ ठानियों रहल बा। जब ओह लोग का हिसाब से मोका भेंटी,तब उहो लोग आपन खेला देखावे में इचिको ना हिचकी। अचके में कुछ लोग के हिचकियो आ रहल बा । अब आ रहल बा त आ रहल बा, कइलो कुछ ना जा सके। पानी पी पी के हिचकी रोके लोग कि दोसरा के कोसे, ई एगो अझुरहट के मसला बा।अब जवन मसला बा, ओह पर विचार होखबे करी। कब होखी, ई अबही बतावल मोसकिल बा।
तिवारी बाबा के पान के दोकनिया पर एह बाति के लेके गोल प गोल बना के लोग बतकूचन में लागल बा। मुद्दा एकही गो बा ‘बड़का रंगदार’ के ? इहाँ रंगदारियो के अलगे अंदाज बा । अंदाजो अइसन कि जवन कब बदल जाई, एकर कवनो भरोषा नइखे। भोरे कुछ आउर आ संझा के कुछ आउर। एक्के दिन में कई बेर बदल सकत बा, परिधान मंतरी के परिधान लेखा । ई भरोषा वाली बतिया कुछ समुझ में कमे आवेले। काहे से कि भरोषा नाँव के जीव अब एह दुनियाँ में बाचल नइखे। जहाँ-तहाँ कुछ मिलबो करिहें त उ अल्पसंख्यक के कोटा में मिलिहें। अल्पसंख्यक के मतलब पांचो बखत वालन से नइखे। इहाँ कुरसियो के खेला नइखे कि अल्पसंख्यक के नाँव पर वोट खातिर कुछों बोले भा कुछों करे में एह देस के नेता लोगन के ढेर खुसी होले। ई प्रजातिये अइसन होले, जवन कुरसी खातिर कुछो आ कबों करे खातिर तइयार रहेले। बाक़िर इहाँ बाति जवन बा, उ बा ‘बड़का रंगदार’ के। सभे से नाँव बदल-बदल के रंगदारी वसूले के बा । रंगदारी वसूले खातिर कवनो बहाना मिल जाये त ठीक नाही त गढ़ा जाई कवनो नवका बहाना। बाति एतने भर नइखे, एहमें कुछ अउरो खेला बा। दुकनियों चलावे के बा, जवन समान बनल बा, ओकरा बेचहूँ के बा। अइसन खेला जवना में राम के आगे राम आ रहीम के आगे रहीम बोल के आपन काम निकारे के चलाकी भर भर के बा । मजे के बात ई बा कि एकरा कुछ लोग बुझियो नइखे पावत आ अपने नटई के नाप थमा देत बाड़ें। जब नटई के नाप हाथ में आइये गइल बा त दबावे काहे चूके भला। एह फेरा में एह घरी कई लोग फँस चुकल बा आ आपन सत्यानास करवा रहल बा। अइसने लोगन का चलते उनुका दुकनियो जम के चल रहल बा आ रंगदारी के त का पूछेके।
चाह के भा न चाह के उनुका के लोग ‘बड़का रंगदार’ मानिये लेले बा आ किलस के भा हँस के रंगदारी चुका रहल बा। अपने लोगन से उनुका के आपन बड़का हितैसी बता रहल बा। एह बतावे वाला काम खातिर बड़का-बड़का मीडिया हाउस लागल बा। पचास रुपिया चुका के दस रुपिया वापिस पाके इहाँ के लोगन के खुस होखे के सिवा अउर कउनो रसतो नइखे लउकत। रउरा के कउनो रसता लउकत होखे त हमरो के बताएम। तब तलक अपना देस के लोगन लेखा हमहूँ राह निहारत रहब।
- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी