दोसरा के बेटी

शिवजी के मुँह पर हमेशा बारह बाजल रहत रहे। बाकिर ओह दिन ऊ बड़ा खुश रहस। उनका के खुश देखके पड़ोसी राम प्रसाद जी पूछलन, ‘‘का बात ह ? तू त केहू के खुशियो देख के खुश ना होखेल। आज अतना खुश कइसे देखाई देत बाड़ ? कवनो खास बात बा का ?’’

‘‘मालूम बा कि ना ? लखन भइआ बड़ा आदर्शवादी बनत रहस। उनकर बड़की बेटी सुष्मिता दोसरा जात में बिआह कर रहल बिआ !’’ गोतिया के बात ! भइया के जगहँसाई के बारे में सोच-सोच के ऊ बड़ा खुश रहस।

‘‘बाकिर एहमें नया बात का बा ? अइसन बात अब कवनो नया नइखे रह गइल।’’

‘‘खाक नया नइखे रह गइल ? हम अइसन बिआह के एकदम बिरोधी हईं। खानदान के नाक कट गइल आ नये बात नइखे ?’’ शिवजी के बेटिओ जवान हो गइल रहे। ऊ कहलन, ‘‘एह मामले में हम कवनो ढिलाई ना बरतेनी। अपना बाल-बच्चा के एकदम आवंक में रखेनी। का मजाल कि ओकनी के ऐने-ओने चाहे कवनो ऊँच-नीच कर सको। हमरा इहे चिंता बा कि हम बेटी के रिश्ता खातिर कहईं जाएब त लोग का कही ?’’

लखन के बेटी के बिआह भइल अबहीं सालो ना लागल रहे कि कि महल्ला में हल्ला होखे लागल कि शिवजी के बेटी रूपा दू दिन से घर में नइखे। लोग के पता चल गइल रहे कि ऊ मोहना के बेटा हरिया के साथ भाग गइल बिआ। ई बात लोग खातिर बड़ा चटकदार रहे। जल्दिये महल्ला से बाहरो फइल गइल। सबके पता रहे कि शिवजी के परिवार-खानदान में हरिया के परिवार-खानदान के छुअल पानिओ तक ना चलेला।

शिवजी मुँह लटकवले अपना दुआरी पर घूमत रहस। तबे राम प्रसाद जी के उनकरा पर नज़र पड़ गइल। ऊ मुँहफट आदमी रहस। झट से टोक देलन, ‘‘तहार बेटी रूपा त लखन भइया के बेटी सुष्मितो के पार कर गइली।’’ कुछ रुक के ऊ कहलन, ‘‘लखन भइया के बेटी के बिआह दोसरा जात में होत रहे त तहार खानदान के इज्जत जात रहे। ऊ त आपन बेटी के बिआह धूमधाम से कर देलन, बाकिर तहार बेटी त नाक कटवा के भाग गइल। अब तहार खानदान के इज्जत के का होखी ?’’

शिवजी लगे कवनो जबाब ना रहे। ऊ चुपचाप घर के भीतर चल गइलन।

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अंकुश्री

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