हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा कबों-कबों इहो लागेला कि माटी के साहित्यकारो लोग अब ई बतिया भुला चुकल बा भा भुलवावे के क्रम में बा। सहर त सहरे बा, अब गउवों सहरे लेखा हो गइल बा । उहों अब एह गीतन के लेके चेतना के अभाव लउके लागल बा। भोजपुरी साहित्य सरिता के एह अंक में हमरा कवनो रचनाकारन के चैती/चइता गीत भा एह पर कवनो आलेख ना भेंटल। मन ह, कसक त उठबे करी । फेर एक बेर ई बाति इयादो करावल जरूरी लागल ह।
एह विधा में विरले कवनो भोजपुरिया रचनाकार होखिहें जे ढेर थोर ना लिखले होखे, बाक़िर ओहके लेके ललक वाली बाति नइखे रह गइल । फेर अइसना में भोर परल कवनो बड़ बाति नइखे। बाक़िर साँच त ई बा कि ‘आजु चइता के फ़लक ढेर लमहर हो चुकल बा। राम, कृष्ण, प्रेम, बिरह, उत्सव, हुलास, खेती, किसानी से आगु बढ़त चइता आम मनई के पीर से लेके राजनीति के तीर तक चला रहल बा।त कहीं मतदान करे खातिर लोगन के जगा रहल बा। एह घरी त ढेर अलग अलग प्रयोगो हो रहल बा। अइसने प्रयोग नीचे देखल जा सकेला-
“कुरसी के महूरत न भेंटइलें हो रामा,
करिखा पोतइलें।
तब नाही बुझनी माई मोर बतिया
कुरसी पठवनी दोसरा के सेतिहा
मोर भाग आगि जरी गइलें हो रामा,
करिखा पोतइलें।’’ – (जयशंकर प्रसाद द्विवेदी )
सभेले सुखद बाति ई बाकि रउरा सभे के नेह-छोह आ सहजोग का चलते भोजपुरी साहित्य सरिता पत्रिका इग्यारहवें बरिस में पहुँच गइल । ई अंक इग्यारहवें बरिस के पहिल अंक बने जा रहल बा। आगहूँ इहे नेह-छोह आ सरोकार सभे के बनल रहे, ई कामना मन में जोगवले भोजपुरी साहित्य सरिता सम्पादन टीम भोजपुरी साहित्य जगत आ समाज के हिन्दू नव वर्ष के शुभकामना भेज रहल बा । चलत-चलत एगो चइता के रस में डूबीं सभे-
बिरह के नाद सुनावे हो रामा
चइत चितचोरवा।
कोइली के बोलिया करत ठिठोलिया
सून लागे अँगना आ सून महलिया
ननदी क मुसुकी रिगावे हो रामा,
चइत चितचोरवा।
सुधिया के खोरिया तातल दुपहरिया
हियरा जरावेले टह टह अँजोरिया
ई बाति मनवा न भावे हो रामा,
चइत चितचोरवा।
पपिहा क पिऊ पिऊ लगेला सँसतिया
जिनगी जियान होत लागे न जुगतिया
बयरिया झुरकि दुलरावे हो रामा,
चइत चितचोरवा।
- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी