माटी क जाँता

कातिक पुन्वासी क दिन सबेरवै से साफ सफाई मे लगल रहली।छुट्टी क दिन रहेला त अउर काम बढलै जाला, अबही कपड़न के घाम देखावै के बा ।चारू अक्षत गरे से लिपट गइनै । “अम्मा घूमे चला।” ” कहवाँ चली हमार राजा बेटा” “माल चला न।” अच्छा ठीक बा….। हमार चार साल क बेटा के माल जाये के नशा सवार रहेला। हमहू जैइसे -तइसे काम समेट के दोनो बच्चन के लेके चल दिहनी।शहर मे भीड़-भाड़ बढ़लै जाला।सबके जल्दी जाये क अइसन होड़ मचल रहेले की पुछा मत। बनारस क जाम त…

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आपन बात

आभाषी दुनिया के मकड़जाल मे अझुराइल अदमी के लग्गे अपने भाषा के लेके केतना समय बा , एकर उत्तर खोजे के जरूरत नइखे । उत्तर सगरों छीटाइल बा , देखि समझी आउर बिचारी । ना जाने केतनी भोजपुरी के पत्र पतिरका कब शुरू भइनी स , आ कब बन्न हो गइनी स , केतना जाने के मालूम बा ? ओहमे एगो पतिरका इकाई के अंक से दहाई के अंक मे पहुँच रहल बा , सराहे जोग बा । जवन समाज अपने कर्मठता ला जानल जाला , आज उहे समाज आपन…

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स्मृति शेष (विशेष)

परम पूज्य महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युग महापुरुष रहनै। 25 दिसंबर 1861 ई0 में पंडित ब्रजनाथ आउर श्रीमती मुन्ना देवी के बेटा के रूप में जन्म लेहनै । ब्रजनाथ व्यास जी के पवित्र आउर  सात्विक गुड़न क भरपूर प्रभाव मदन मोहन मालवीय जी में बचपने  से दिखाए लगल । घर में प्रारंभिक शिक्षा के बाद उनके पंडित हरदेव जी के धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला मे भेजल गयल। पंडित जी अपने शिष्यन के अपने बचवा जैसे मानै। दूध पियावै अउर कसरत करावै । कुश्ती भी लड़वावै । उनकर इहे ध्येय…

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” कबीर अउर रैदास क बानी में भोजपुरी “

कबीर अउर रैदास दुनो भक्त दुनो जात बिरादरी मे निचले दरजा मे मानल जानेल जाने। आज भोजपुरी के लेके बड़ा गहमागहमी भइल बा अइसने मे रहि रहि के मन कबीर अउर रैदास पर चली जात ह। कबीर के सुभाव मे एक तेवर बा जबकि रैदास क बोली वचन बड़ा ही नरम बा। लेकिन दुनो समाज मे फइलल बुराई अउर अन्याय के खिलाफ बोलेलन । निष्काम भाव उनकर सबके बदे बा। रैदास जी क जनम छोट जाति मे भयल रहे लेकिन ओनकर अन्दर क बिसवास ओनकर ताकत रहल। रैदास लड़कपन से…

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आपन बात

भोजपुरी साहित्य सरिता क इ अंक आप लोगन के सौंपत के बहुत हर्ष होत बा। सबसे बड़ी खुशी क इ बात ह कि ई अवसर कार्तिक महिना के बा । कउनो राष्ट्र देश के सांस्कृतिक वैभव क परिचायक उहवां के लोक साहित्य होखेला। जवने से उहवां के संस्कार परंपरा जीवन आदर्श उत्सव विषाद नायक नायिका रितु गीत विवाह गीत भजन राजनीतिक सामाजिक धार्मिक गीतन के बोल में समाहित रहेला। वइसे तो हर देश के आपन एक परम्परा होखेला लेकिन हमरे देश के बात निराला बा। इहवा “कोस -कोस पर बदलें…

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कोठेवालियाँ

रानी के बियाह क बड़ा.शोर ह बरात बलिया से आयील ह,दश दिन पहिलवै से टेंट तम्बू लगै शूरू हो गयल ,अरे होहि के चाहि आखिर तहसीलदार साहब क पहिली बेटी बिहल जात बा,दुआरे क रौनक त देखतै बनत बा।तहसीलदार साहब खूदै हर चीज क निगरानी करत हउए।खूटा गाड़े बदे बास चाहत ह ,उदया लगत बा किआज कुल बसवरिय काट घली,इ उदया सुसुरा तहसीलदार के देखैला चार पोरसा ऊपर चढ़ जाला।अउर आज त रमेशो (तहसीलदार क भाय)आवैके हउए।रमेश बहुत दिलदार मनयी हउए ,ओनके बारे मे का-का बतावै…जब उ पढ़ै जा ओनकर…

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हे नारी तोहार केतना रूप

दुआर ओसार कुल साफ हो जायेके चाही , बाबू संझवे से सबके बिगड़त हउए । तनिको कही कसर ना रहे के चाही , बतायै देत हई । अबही हम स्कूले जात हई, देखी त मनेजर साहब काहे के बोलवले हउए । जब अपने घरे काम रहेला त बहरवौ अकाज पड़ल रहेला। अच्छा सुनत हउ कि ना हे भागवान , तोही से कहत हई । तनि बेटी के समझाय दिहा। माई बेचारी त गाय नियर ह। जवन बाबु कहि दें,  होखे के चाही । आज दिदिया के देखै बदे लइका वाले…

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अबही समय लगी

आजकल रोग अउर बेमारी क आफर चलत बा एगो प दू फीरी लगत बा । सुगर देखावै जा थाईराइड भी निकलिए  जाई ।  ब्लडप्रेसर भी बढ़ल रहेला इहो बिकास क राह धईलs ।  समझ मे ना आवत बा ई शरीरी क का गत लिखल बा । जबकि हमने दरसन क बात ढेर कइल जाला , बतियावत मे त वैसहु कोई ना पायी लेकिन इ सच बा रोजै जीयै क मनसा बढ़त जाले । अस्पताल पहुँच के देखा त सगरी दुनिया बेमार ह। हमहूँ सोचली कि आज डाक्टर के तनि देखा…

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सामा चकवा लोक कथा

सामा चकवा क  ई लोक कथा भारतीय लोक मानस मे रचल बसल बा। एक भाई अपने बहिन बदे अपने बाप क बिरोध करेला अऊर ओके निर्दोष साबित कइके समाज के लोगन के एगो नेक सन्देस देला। आज जहाँ समाज मे रिस्ता  नाता बेमानी होत जात ह । ऊहा इ त्योहार क आजू के समय मे महत्व बढ. जाला। ई कहानी बा,  राजा कृष्न क बेटी साम्बवती रहनी। एक चुगुलखोर जाके राजा से कहेला कि सामवती एगो ऋषि के साथे गलत समबन्ध बनवले हई। राजा ओकरे बाती पर बिसवास कई लेनै।…

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कबीर के दामपत्य प्रतीको में भोजपुरी की बानगी

सन्त लोगन क सबसे प्रिय प्रतीक दामपत्य भाव रहल । कबीर मूलतः सन्त रहनै। सन्तन मे दू प्रकार क योजना पावल जाला एगो परम्परा से मिलेला अऊर दूसर स्वयम अपने कवि करम से। कवि क जीवन दरशन अऊर मूल चिन्तन शैली क दर्शन होला। एही लिए सन्त कवियन मे प्रतीक बिधान देखेके मिलेला इ लोगन के अइसने प्रतीकन से उनकर पुरहर साधनात्मक जीनगी प्रतिबिम्बित होखेला । हाँ लोकजीवन अउर परम्परा से मिले वालन प्रतीकन के अपनावै मे अधिक रस लेनै । बियाह, गवना ,अउर तमाम प्रतीक लोक जीवन से ग्रहण…

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