भोजपुरी साहित्यांगन के एगो चमकत सितारा गंगा बाबू, हँ गंगा प्रसाद अरुण के भोजपुरी काव्य संसार में आपन विशेष पहचान बा। गंगा बाबू के कलम भोजपुरी के हर विधा के समृद्ध कइले बा बाकिर उहां के प्रिय विधा काव्य रहे। कविता में उहाँ के गीत, नवगीत, हाइकु, गजल आ दूसरों विधा में खूब कलम चलवनीं बाकिर उनुका भीतर गीत – नवगीत के अजस्त्र धारा बहत रहत रहे। उहाँ के भोजपुरी गीत – नवगीत संसार के एगो विशेष पहचान देनीं। मंच से लेके पुस्तक आ पत्रिकन तक में। उहाँ के ‘ लकीर ‘ पत्रिका के सम्पादने ना कइनीं, भोजपुरी गीत – मनगीत के दुनिया में एगो बड़हन लकीर खींच देले बानीं जे उहाँ के गीत – संगीत के दुनिया के सिरमौर बना देले बा। आजु उहाँ का हमनी बीच नइखी ई कहल ठीक ना होखी काहे कि अपना गीत – नवगीत के रूप में हमनी बीच बानीं आ आगहूं रहब। उहाँ के एगो गीत – नवगीत संग्रह बा ‘ अंगना महुआ झरल ‘, जवन वर्ष 2010 में प्रकाशित भइल रहे। ओह संग्रह के कुछ रचनन पर एहिजा बात करि संग्रह के बूझे – समझे के प्रयास करब। कहल ह धान के गाँव पुआर से आ अदहन में फदकत भात चार गो चाउर देखि पता चलि जाला। परख खातिर ऐहिजो संग्रह के चार गो रचना।
कविता के जन्म कवि के लोकवादी जीवन अनुभव, संवेदना आ रचनात्मक चेतना के कोंख से होला। जीवन अनुभव जोरे कल्पना के पुट दे ओकरा के सटीक भाषा में पिरो देल कविता के बहुवर्णि आ जीवंत बना देला। गंगा बाबू माटी से जुड़ल अनुभवी कवि के नाम ह जेकर कविता के शब्दन में गहिर अनुभव आ अर्थ छुपल रहेला। लोक के आंतरिक अनुभव से निकलल निचोड़ के ‘ अंगना महुआ झरल ‘ में गंगा बाबू कविता के रूप में रखे के सफल प्रयास कइले बाड़न। जवन चीज हमनी के जीवन से गुम हो रहल बा उहो गंगा बाबू के एह संग्रह में देखे के मिल जात बा, जे कवि के विराट दृष्टि के गवाह बा।
कविता के एगो महत्वपूर्ण गुन ओकरा में छिपल मौन होला। कव गो ना भाव आ स्थिति सीधे ना रखल जा सकेला। संकते में रखल जा सकेला। ऊ मौन कविता के गहिर संवेदना के बता जाला। कबो कवनो घटना भीतर घुलत रहेला कवि के भीतर आ जिंदा रहत भीतरे पाकत रहेला ऊ कबो उचित समय कविता के रूप में सामने आ जाला शब्द रूप में। ओह रचना में घटित घटना के आगि के स्पष्ट रूप से देखल – समझल जा सकेला। ऊ घटना रूप में इतिहास से अलग होला बाकिर सच्चाई के नजदीक। गंगा बाबू के ‘ आंगन महुआ झरल ‘ से गुजरला के बाद ई अनुभव कइल जा सकेला। ओह संकलन के चार गो कवितन में कवि के दृष्टि देखे के एगो छोट प्रयास भर ह ई बतकही।
गंगा बाबू के शब्द में कहल चाहब एह संकलन के बारे में कुछ त कहब –
‘ खूँट में बान्हल गइल बा
नेह के अनुबंध काहे ?
झाँकि के उफनत नयन में
के हिया के थाह चाहे ?
हो गइल बा तेज
अन्दर भाव के उत्पात,
अइसे मत बह पुरवा ! ‘ ( कविता संख्या 19 )
पुरवा उत्पाती होला। आजु के समय पुरवा के कई गो ना रूप बा। ओहि सब पुरवा से तरस्त कवि के अंदर उठत भावन, हिया में उठत हिलोर के संकलन ह ‘ आंगन झरल महुआ ‘।
संकलन के नाम “आंगन झरल महुआ” एगो गहिर संवेदनात्मक अउर सांस्कृतिक प्रतीक समेटले बा अपना में, शाब्दिक अर्थ से हटके। कवि ऐहिजा खाली महुआ के फूल झरे के बात नइखे करत, बल्कि ओकरा पीछे छिपल जिनिगी के दर्शन के बात रखले बा। कवि ऐहिजा संकलित कवितन के अपना भीतर के भावन के सहज रूप में फूटल देख रहल बा। प्राकृतिक रूप से प्रस्फूटित देख रहल बा। कविता के सौंदर्य ओकर प्राकृतिक रूप से प्रस्फूटने में निहित रहेला। संकलित कवितन में मिट्टी की खुशबू अउर ज़मीन से जुड़ल आम लोगिन के सुख-दुख, संघर्ष के नजदीक से महसूस कइल जा सकेला।थाकल – हारल जीवन के पतझड़ के बीच सुंदर आ मूल्यवान विचार जवन हृदय आंगन में जनमल ओकरे के सहेजे के एगो प्रयास ह ‘ आंगन महुआ झरल’। संकलन के एगो कविता के अंश जवन गूढ़ आ संशलिष्ट बा बाकिर रूमानियत पैदा करत एहसास बनि रूह के छू देत बा –
अंगना महुआ झरल
कि तोहरे रूप से।
सँझवत-बाती भइल
कि अँजुरी जोर के,
तुलसी-चउरा
नेहा-बंशी डोर के।
सितुही रतन अगोरे
निरइठ धूप से । ( कविता संख्या 3 )
एह पंक्तियन में गीतकार के भाव के सौंदर्य निरखे जोग बा।कवि के अपने घर आंगन में जवन खुशी बिखरल दिखत बा ओकर श्रेय कवि प्रियतमा के देत बा। साँझ होखते अंजुरी में दीया ले तुलसी चबूतरा पर जरावल संस्कृति आ जड़ से जुड़ाव दिखावत बा। ‘नेहा-बंशी डोर’ में बहुत गहिर बात छिपल बा। कवि कहल चाहत बाड़े कि कृष्ण के बांसुरी से बंधल प्रेम जस गृहणी के प्रेमो तुलसी माई से जुड़ल रहे। सूरज के तपत धूपो में प्रिय रत्न ( पिया ) के राह देख रहल बिया प्रेयसी। एही आशय के अभिव्यक्ति ऊपर के पंक्तियन में कवि के भाव संवेदना, प्रकृति के जुड़ाव के बता रहल बा।
संकलन के कवितन में प्रतीक के उपयोग अइसन कइल गइल बा जे बहुअर्थी चित्र के साथ प्रकृति आ प्रेम के गीत गावत नजर आवत बा। एगो कविता के अंश –
रुप के बसेरा पर रुपा के छाँव।
अउँघाइल गली-गली, निनिआइल गाँव ।
महुआ के गंध झरे
अंग पोर-पोर,
आम के टिकोरा पर
आन्ही के जोर। ( कविता संख्या 41 )
‘धनिया’ के बाँहन पर ‘होरी’ के नाँव।
गाँव जे भोजपुरिया संस्कृति के जड़ ह ओकर अप्रतिम सौंदर्य पर आजु शहरीकरण आ पाश्चात्य रंग के छाया गाँव के रूप बिगाड़ के रख देले बा।कविता में प्रकृति, प्रेम अउर रूप सब एक साथ घुलल देखे के मिलत बा। महुआ आ आम बसंत के देन ह। बसंत में महुआ के मीठ मादक गंध प्रिय के शरीर के रोम- रोम से झरेला। कच्चे आम के टिकोरा पर तेज आँधी का जोर चलेला। ई एगो यथार्थ ह। कमजोरे पर नूं बरियार के बल दिखेला। “धनिया” अउर “होरी” प्रेमी-प्रेमिका के प्रतीक बा जे पति – पत्नी के एक दूसरा के दिल में बसे के बात करत बा। भोजपुरी लोक – लहजा के अप्रतिम रूप एहिजा बड़ी सुंदर ढ़ंग से परोसल गइल बा। कविता के मेहिनी कवि के दृस्टि संपन्न होखे के गवाही दे रहल बा।
साहित्य – कला, सूखा पड़ला में बदरी के आँख मिचौनी, धधकत सुरुज आ पियासल धरती, किसान माथे कर्ज के चिंता, सत्ता के फर्ज से मुँह मोड़ल, घोटाला करि सरकारी खजाना के लूट, आम जन के दुर्दशा, नेता के करम कुकर्म करि मौज में बीत रहल जीवन के एगो कविता मे गंगा बाबू के परोसल देखीं। ई गंगा बाबू के कविताई गुन से पाठक के अवगत करावे खातिर काफी बा। देखी कविता के प्रवाह आ शब्दानुसासन –
गीत-गवनई पहिले अइसन
नयका-नयका तर्ज
कि मौसम कतना बा खुदगर्ज !
सहमल-सिहिकल खेत-मोरनी
थथम-थकल मृग-छौनी,
पावस बरसे आग बदरिया
के ई आँख मिचौनी ।
इन्दर-राजा-नेता-सेवक
बिसरल सब के फर्ज !
रुसल गोसइयाँ देवा-देवी,
उदसल बरखा रानी
का जाने कब ई खेतन में
बरसी सोना-चानी !
सूना नयना गगन निहारे
कइसे उतरी कर्ज !
मिलीभगत हितसाधन, साजिश
हर दर-घाट घोटाला,
जनता-चंदन, रगरे
नेता पइसा-पुन्न कमाला!
खुलल खजाना, तिकड़म
अपने हथिआवे के मर्ज! ( कविता संख्या 23 )
गंगा बाबू के गीत – नवगीत के ई संकलन उहाँ के छोट – बड़ गहिर अनुभूतियन के तिलस्मी आईना ह। गीत के कारीगर अरुण जी के कारीगरी ना जादूगरी ह ‘ आंगन महुआ झरल ‘। गीत – नवगीत के ताकत महसूसल चाहत बानीं त संकलन से गुजरीं, गंगा बाबू के कलम लोहा मनवा के छोड़ी ई हम बिसवास के साथ कह सकत बानीं। नया नया प्रतिक आ बिम्ब कवितन के शिल्प के गझिन बनावत बाड़ी सं, साथे बहुवर्णी। एहसास बनके रूह में उतरे के ताकत बा संकलित गीत – नवगीतनन में। गंगा बाबू के जिनिगी ग्रामीण परिवेश अउर चमकत टाटानगर के संगम में पलल – बढ़ल बा, अनुभव के आंच में तपल बा, एह से गीतन के लबो – लहजा में अनुभूतियन के सार आ समाज के बदलत रुझान खूब समेटाइल बा। भोजपुरी गीत – नवगीत के पुरोधा हमनी बीच अपना कवितन के रूप में हरदम उपस्थित रहीहें।उहाँ के स्मृति के नमन।
कनक किशोर
चलभाष – 9102246536