बुढौती के दर्द

बुढौती के दुख दर्द कहले मे का बा। येंहर बाटे खाई आ ओंहर कुआं बा। अइसन पतोहियन से पाला पड़ल बा कि भरपेट खइलहू के लाला पड़ल बा। हमन के कोठरिया करे के सफाई कहीं कुड़ा बा कहीं जाला पड़ल बा। बेटवा बहुरिया कूलर मे बा सूऽतल आपन ओसरवे खटाला पड़ल बा। बोल कुछ त बोले बा बुढवा सठिआइल न बोलऽ त कहीहं मुहें ताला पड़ल बा। दस रूपया बबुआ से मांगऽब त बोलीहं कमाई ना बाटे निठाला पड़ल बा। जगदीश खेतान

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हमहूं लूटीं तेहू लूट

हमहूं लूटीं तेहू लूट। दूनो पहिने मंहग सूट। उपर वाले के भी खियाव। अपने पीअ आ उनके पियाव। अईसे जो कईले जईब त रिश्ता हरदम रही अटूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अंगरेजन के हवे सिखावल। आ हमनी के ई अपनावल। शासन अगर करे के बा त जनता मे डरले जा फूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अगर करे केहू कंप्लेन। साहब के द तू सैम्पेन। उनसे मिल-जुल मौज उड़ाव साथे उनके ल दूई घूंट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। आदिकाल से चली आईल बा। केहू न येसे बच पाईल बा। केहू के…

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बारिश के दिन

बारिश के दिन आइल बा। सूखल पात हेराइल बा। गौना बरात के दिन बीतल बैंड आ बाजा चुपाइल बा। नाव चलवले मे कागज के लरीका सब मनुआइल बा। छत पर अब ऊ ना आवेली छतरी के दिन आइल बा। बदरे करेलं आंख मिचौनी इयाद केहू के आइल बा। रहल किसान सूखा से चिंतित बाढ से अब अफनाइल बा। नाचे लगलं मोर मोरनी जब से बरखा आइल बा। धान के रोपनी होखे लागल खेत मे गीत सुनाइल बा। बीछला के गिर गइलं मंगरु पूरा बदन चोटाइल बा। ये ही मे दारु…

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घर के मजदूर

शहर मे हम मशहूर हईं। पर घर मे मजदूर हईं। भोरे पांच बजे उठ जाईं। गैस जलाईं चाय बनाईं। मेहरारु लगे ले जाईं। ओके जगाईं और पिआईं। जी हजूरी करत रहीलां हम येतना मजबूर हईं। हम घर मे मजदूर हईं। ओके शहरीयो मे ले जाईं। लुग्गा आ बिख्खो कीनवाईं। बाल्कनी मे फीलिम देखा के चाट मिठाई ओके खिआईं। खुश होके कहेली तब ऊ चमन के हम अंगूर हई। हम घर मे मजदूर हईं। रही-रही देली गीदड़भभकी। नइहर गईले के नित धमकी। जौन कहेली तौन करीलां तब्बो कहेली हमके सनकी। जौने…

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हे शहरी बाबू

हे शहरी बाबू न अइह$ हमरे गांव हो। फेर-फेर आवे के लेब$ नाही नाव हो।   आम और इमली के पेड़ बा कटाईल। अर्जुन यूकिलिप्टस के पौधा रोपाईल। पीपर के पेड़ सुखल मिली कहां छांव हो। हे शहरी बाबू न अईह$ हमरे गाँव हो।   राम अऊर रहीम घरे, भईल बंटवारा। बंटा गईल सगरो, दलान आ ओसारा। आपस मे बढल बाटे केतना दुराव हो। हे शहरी बाबू न अईह$ हमरे गाँव हो।   दूर-दूर ले चील गिद्ध ना देखाता। नीलकंठ देखे के सब अफनाता। अब बस कउवन के बा कांव-कांव…

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