गजल

हम मनई निपट गंवार हईं। चालीस माडल के कार हईं।   बैरी हमसे थर-थर कापें पर यारन खातिर यार हईं।   तलाक के बात कबो न करीं हम सात जनम के यार हईं।   करजा मांगे जो केहू आवे कही दीह की हम बीमार हईं। विज्ञापन  बिना चलेला ई हम जनता के अखबार हईं।   आतंकी थर-थर कांपेलं हम राणा के तलवार हईं।   बेकारी  भत्ता दिलवा दीं देखलादीं हम बेकार हईं।   मक्कारी हमसे का करब “खेतान” से बड़ मक्कार हईं।   जगदीश खेतान  

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हमार माई

हमरो  येगो माई रहली। हमरे खातीर सब कुछ सहली।   कब्बो बबुआ कब्बो दुलरुआ कब्बो जिगर के टुकड़ा कहली।   जब गिर जाईं दौड़ के आ के हमके उठा सोहरावत रहली।   खूब हमन के मालिश कईली चांत-चांत मजबूत बनवली।   अपने अंचरा ढांप-ढूप के हमके दूध पिआवत रहली।   हम जो हंसीं त हंसत रहली हम रोईं त रोअत रहली।   रोज सुनावत रहली लोरी। हमके सुता के सूतत रहली।   नजर कहीं न हमके लग जा करीआ टीका लगावत रहली।   उनके खातिर सभे दुलरुआ सतवां रहल या…

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