जनम के उछाह में सोहर के सरसता

लोक साहित्य कवनो संस्कृति से ढोवे वाला सबसे सहज माध्यम होला। बिना कवनो रोक-टोक आ बिना कवनो बान्हा के अलिखित रूप में कवनों समाज के जन-जीवन के सुन्नर आ सहज झाँकी लोकगीतन के माध्यम से प्रस्तुत होला। साँच बा कि लोकेगीत से लोक जीवन के साँस कायम रहेला। ई लोकगीत में अपना-अपना जवार के आपन-आपन पहिचान आ विशेषता के साथे जन-मानस में विद्यमान पावल जाता। एह लोकगीतन के चमत्कार त ईऽ होला कि खाली शब्दन के हेर-फेर से स्वरुप बदल जाला बाकिर भाव के ताकत ऊहे रहेला। लोकगीतन के गावल…

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बरम बाबा

खाली आस्था के छाँव ना हवें जड़ के उदहारण ना हवें खाली जल के चढ़ावा के आसन, हमरा गाँव के बरम बाबा हवें सबके चिंता करे वाला प्रेम आ सेवा के निष्ठा आ लोक मंगल के राजा के सिंहासन। उनका बहियाँ के तले टोला के सगरो लोग बइठेला सूपा से ओसौनी करत औरतन के दरद तिरछोलई करत मरद सबके किस्सा-कहानी सुनेले बरम बाबा कबो ना आँख मुनेले। ऊ बुढ़वन के चिंता हवे बेटी के विवाह के, आँख के असरा हवन नौजवानन के नोकरी के चाह के, लइकन के ओल्हा-पाती के…

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ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’

कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली कागज के गँठरी होला। बात ई बा कि अबहीने भोजपुरी कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के पहिलकी कविता के किताब ‘पीपर के पतई’ आइल ह। ई किताब कवि के पहिलकी प्रकाशित कृति बा बाकिर ऊहाँ…

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