असों आइल फागुन

रस भरल चारु ओर पोरे पोर सजनी असों आइल फागुन झकझोर सजनी।। चंचल चितवन चान सुरुज बुझाला नेहिया मातल मन अनासो बउराला मारे हिया में हिलोर सजोर सजनी असों आइल फागुन झकझोर सजनी।। अंग अंग चढ़े लागल बेसुध लहरिया सोsना चानी से भरल सगरो डढ़िया हाँक कोइलर लगावे होते भोर सजनी असों आइल फागुन झकझोर सजनी।। चनिया के रतिया में चानस जगा दीं आव गुजरिया रंग प्यार के लगा दीं बात मानs नाही करब बरजोर सजनी असों आइल फागुन झकझोर सजनी।।     केशव मोहन पाण्डेय  

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मातृभाषा

माई हो हम तहरे जइसन बात करीं भोजपुरी में। अपनाई ले दोसर भाषा, ज़रूरत में, मजबूरी में। तूही असरा, तूही चिंता, तहरे से सिरजल संसार बा जहवाँ माई, मातृ-भाषा ना, ऊ माटी बेकार बा तहरे जइसन नेह छोह दोसर के दरसाई हो हो जाई सब कुछ केहू, नाही होई माई हो हम दूनो से प्यार करीले, दूनो खातिर मन में आदर बा जे अपना माई से साँचों प्यार करेला, ओमें सब माई खातिर जीवन सादर बा माई के आशीष रही त ना होई कवनो कष्ट से सामना। आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा…

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नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

भोजपुरिया संस्कृति में जतरा पर निकलत बेरा, कवनो नया काम शुरू करत बेरा चाहे कवनो शुभ काज के बेरा, दुआर, अंगना आ सतीमाई के अथाने चउका पुरल जाला। कोरोना के विश्व-व्यापी महामारी के विषाद-काल में हृदय के हरषावत ‘भोजपुरी साहित्य सरिता’ के जनवरी-फरवरी 2021 के एह संयुक्तांक के आवरण ओही चउक पुरला के आकृति बा। हरदी के रंग के शुभ-संदेश हर भोजपुरिया क्षेत्र के लोग जानेला आ आदर करेला। ‘भोजपुरी साहित्य सरिता’ के प्रस्तुत अंक के आवरण भोजपुरिया चित्रकारी पर बा। भोजपुरी भाषा आ साहित्य जइसन भोजपुरी कला आ चित्रकला…

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भकजोन्ही

बइठाका के इज्जत बहारन में ना फेंकाव, से सुँघनी लाल दिन-रात घर के मान बढ़ावे खातिर तेलोबेल कऽ लेलन। उनका घर में उनकर धरमपत्नी जी तनके साथे बेटा सुरुज आ बेटी सरोजो बाड़ी। लाला बड़ा तेज हवें। जब कहीं परिवार नियोजन के चर्चो सुने के ना मिलत रहे, तब्बे ऊ अपने परिवार के संख्या पर ब्रेक लगा दिहलें। सुरुज त सोंझ सड़की के सीधवा मुसाफिर हवें। ना नौ जानेलन, ना छव। एक बेर त ईऽ कहल जा सकल जाता कि उनके देंह बाप के गुन से कम आ महतारी के…

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गोधन बाबा चलले अहेरिया

अभीन कतहूँ से दिवाली के उमंग कम नइखे भइल कि गोधन बाबा के कुटाए के दिन आ जाला। अभी ठीक से दिवाली के दिअरीओ नइखे बिनाइल। बैन के बादो चारूओर पटाखा के बारूद के गंध फइलल बा। फाटल-जरल कागज अभी ठीक से बहराइलो नइखे। मोमबत्ती के जारन अभीन छोड़ावलो नइखे गइल। घर-दुआर, खान-पान सबमें अभीन तेल के बास बा। नवका कपड़ा के आकर्षण अभी कम नइखे भइल। अभीन घर में मीठाई भरले बा कि बिहाने उठते दीदी खातिर भजकटेया जोहाये लागल। गोधन-पूजा अपना भोजपुरिया समाज में एगो दोसरे रूप में…

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एगो त्रिवेणी इहवों बा

मन में घुमे के उछाह, सुन्दरता के आकर्षण आ दू देशन के राजनैतिक सीमा के बतरस के त्रिवेणी में बहत हम त्रिवेणी जात रहनी. हमनी के छह संघतिया रहनी जा आ एगो जीप के ड्राईवर. हमरा के छोड़ के सभे एह प्रान्त से परिचित रहे. हमरा बेचैनी के एगो इहो कारन रहे की आजु ले हम त्रिवेणी नाम इलाहबाद के संगम खातिर सुनले रहनी. ई त्रिवेणी कवन ह? उत्तर-प्रदेश के कुशीनगर जिला मुख्यालय से लगभग नब्बे किलोमीटर उत्तर-पछिम के कोन में बा ई. पाहिले त गंडक नदी के भयावहता के…

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सर्वभाषा ट्रस्ट के वार्षिकोत्सव मनावल गइल

भाषा, साहित्य, कला आउर संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के खाति समर्पित संस्था सर्व भाषा ट्रस्ट दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में पहिलका वार्षिकोत्सव के आयोजन कइल गइल।अपने सोवागत भाषण में सर्व भाषा ट्रस्ट के परिकल्पना आउर ओकरे योजनावन पर अध्यक्ष अशोक लव विस्तार से चरचा कइने। उ भविष के योजनन के चर्चा कइने। सचिव रीता मिश्रा आ समन्वयक केशव मोहन पाण्डेय वार्षिक रिपोर्ट पढ़ने। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री अजीत दुबे जी भाषा के महातिम  बतावत सर्व भाषा की कार्य-योजनावन के  सरहलें। कार्यक्रम के शुरुआतेमे  देश के युवा ओडिसी नृत्यांगना सुश्री…

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अँगार जरो

अँगार जरो तहरा हिया नइखे जो प्यार हो अँगार जरो तहरा हिया।   ओहि रे अँगारवा में मान मद जरी जाए मन के घमंडवा के दससीस मरी जाए बरी जाए जड़-बनवा में बरम लुकार हो   जरे अंग अंग कि चढ़े रंग दोसरका एके गो देहिया के लोग ना हो फरका भले होखे दुश्मनवा जरि मरि खार हो   छल दम्भ भेद भाव मिली के मेटाव भाई भोजपुरिया हो मन के मिलाव जुगुत कइला पर बही उलटो जलधार हो। — केशव मोहन पाण्डेय —

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बदली जरूर

उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर देखीं जुग राम के रावण के कन्हैया के चाणक्य-चंद्रगुप्त के अशोक के उनका भैया के का भइल? बदलिए नु गइल? चाहे रहल केहू केतनो मगरूर उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर।। बदली त राग बदली रंग बदली बदलाव अकेले रउरे खातिर ना होई सबका संग बदली बदली त हवा बदली हाल बदली हमार तपस्या बदली राउर बवाल बदली माहौलो हो ता रंगीन समय नइखे दूर उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर।। बदलाव कण कण में होई प्रीत में होई रण में होई लुकारी में…

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भोजपुरी लोकगीत में नारी

भारतीय संस्कृति में हर प्रकार से विविधता देखल जा सकल जाला। ई विविधता भोजपुरी की गहना बन जाले। एगो अलगे पहचान बन जाले। इहे विविधते त अपना भोजपुरी संस्कृति के विशिष्टता देला आ अलग पहचान बनावेला। एह संस्कृति आ पहचान के कवनो बनल-बनावल निश्चित ढ़ाँचा में नइखे गढ़ल जा सकत। ई त बलखात अल्हड़ नदी जइसन कवनो बान्हो से नइखे घेरा सकत। ई त ओह वसंती हवा जइसन बावली, मस्तमौला आ स्वतंत्र ह, जवना पर केहू के जोर ना चलेला। अपने मन के मालीक। एह के कवनो दिशा-निर्देश के माने-मतलब…

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