केकरे ख़ातिर

दिनवा दिनवा भागत हउवअ केकरे खातिर रतिया रतिया जागत हउवअ केकरे खातिर   बीवी-बच्चा ख़ातिर भी ना  समय बचत बा ऑफिस में ही सारा-सारा समय कटत बा पइसा त आवत बा लेकिन जीवन बा फीका पइसा खर्च करअ क टाइम कहाँ मिळत बा   बहरअ रहअ चाहत हउवअ केकरे खातिर झूठअ मन बहलावत हउवअ केकरे खातिर   करअ नौकरी के रोकत बा खूब करअ खिंचअ रुपिया के टोकत बा खूब धरअ लेकिन अपने देहियों क तनी करअ फिकिर के कहले बा नया जमाना देख मरअ   बेटाइम क चाभत हउवअ केकरे खातिर छुप के चूरन फांकत  हउवअ केकरे खातिर   दूसरे क बस देख -देख क होड़ मचल…

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बगल में छुरी

आन्हर बहिर गरहो से गहिर पोतले चन्नन उजरे पहिर।   ओढ़ले कमरी लिहले गगरी बिष से भरल चललें डहरी।   कुछहू बोलत सगरों  डोलत सरम छोड़िके गठरी खोलत।   कुछ के बटलें सभके कहलें मुँह पर ढकनी बन्हले रहलें।   कउड़ा तपलें उलटा जपलें बाउर माहुर सोझहीं नपलें।   करमें भगलें धउरे लगलें हाथ जोरिके मफ़ियो मगलें। राखीं दूरी मिलें त थूरीं जिनके मुँह राम बगल में छुरी॥   डॉ जे पी द्विवेदी संपादक भोजपुरी साहित्य सरिता

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हमार टोला

घरे-घर पालेलें सपोला, हमार टोला। सभही बनेला रामबोला, हमार टोला॥   चर-चेरउरी से बतिया बनावेला आगु-पाछा घूमि उनुका पटावेला कतहूँ उठवले फिरे झोला, हमार टोला ॥   जोरत गाँठत सुतार  जोगावेला चन्नन छिरकी जगहियो गमकावेला ओहमें मिलवले बिसगोला,हमार टोला॥   बीने-बरावे में बखत खपावेला आपन अपने के कुल्हि चमकावेला निकसेला बइठी के डोला,हमार टोला॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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