का फरक …?

बाति त जवन बा तवन बा बाति त इहे बा जवन हम लिखेनी भा छापेनी। बाचल-खुचल के कुछो बूझीं बलुक ओकरो से कुछ बेसी बूझीं हमरे दीहलका गियान सगरों बघारेले हम चिघ्घारिले त उहो चिघ्घारेले।   ओइसे जहवाँ तक राउर नजर जाई सब अपने बा दोसरा के सपने नु बा रहो ? का फरक ….? अइसन कुल्हि ढेर देखले सुनले बानी लोग चिचिआई,छिछिआई फेरु चुपा जाई फेर त हमरे नु कहाई पगड़िया त हमरे माथे नु बन्हाई ?   फलाने के चीजु ढेकाने अपने नाँव से छापें भा गावें चाहे…

Read More

प्रो. बलभद्र के आलोचना-दृष्टि

भोजपुरी साहित्य में आलोचना विधा विकासशील बा।भोजपुरी आलोचना में मैदान खाली बा।एह दिसाईं ढेर परती-पराँत बा।एह दिसाईं बहुते मेहनत के दरकार बा।एह स्थिति में सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा सद्यः प्रकाशित डॉ बलभद्र के आलोचना पुस्तक”भोजपुरी साहित्य:हाल-फिलहाल”भोजपुरी आलोचना विकसित करे के दिसाईं उल्लेखनीय कृति बा।माईभाषा में शिक्षा के जरूरत अब राजपाट भी महसूस कर रहल बा।5अगस्त,2021के द हिंदू में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के माईभाषा में शिक्षा के महत्व के प्रसंग में एगो लेख:”ए लैंग्वेज लैडर फॉर एन एडुकेशन रोडब्लॉक” (शिक्षा मार्ग खातिर शिक्षा के सीढ़ी)प्रकाशित भइल बा।तकनीकी शिक्षा के…

Read More

भोजपुरी साहित्य:परम्परा आ परख

बिना सरकारी संरक्षण आ पोषण के लोकभाषा भोजपुरी के रचनात्मक विकास लगातार हो रहल बा।भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक विकास में आरंभे से समाज के गण्यमान्य आ प्रबुद्ध लोग सक्रिय रहल बा, आजो सक्रिय बा आ काल्हुओ रही।अपना माईभाषा से केकरा प्रेम आ लगाव ना ह?माने माईभाषा से आ माईभूमि से लगाव आ प्रेम सबके होला, होखे के चाहीं।भोजपुरी साहित्य में हर विधा में लगातार रचना हो रहल बा:कविता, कहानी, उपन्यास, लघुकथा, एकांकी, नाटक, निबंध, विनिबंध, जीवनी, संस्मरण, आत्मकथा, व्यंग, समीक्षा, आलोचना, यात्रा-संस्मरण, पत्राचार आदि-आदि।भोजपुरी साहित्यिक पत्रकारिता के सामने तबो एगो…

Read More

चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

Read More

गजल

बहुते के कलम घिस गइल,ढेरे के ना धार अबहीं बाकी बा बहुते के इलाज कइल गइल, ढेरे के उपचार अबहीं बाकी बा   केतनन के पेट भरल बाटे, केतनन के भूख ज्वाला बा लेसले बहुते के लोर बा पोछल गइल, ढेरे के रोजगार अबहीं बा   केतना ना माई जर मर गइली, डोली ना उठल बेटी ना पढ़ली बहुते के हाथे मेंहदी बा लागल, ढेरे के उधार अबहीं बाकी बा   एह देस के हाल गजब बउए, जहँवा के लोग अजब बा कुछ बहुते के दिल हिल मिल जाला, ढेरे…

Read More

मनई आ मच्छर

मनई आ मच्छर दूनो के राशि एके हवे। दूनो मे मात्रा भी बराबर हवे। सोचल जाव त सुभावो एके ह। तबो दूनों मे एक फरक बतावल जाला। मनई बुद्धिजीवी कहाला आ मच्छर परजीवी। हमरा ई दसे आना सही लागेला। मच्छर बुद्दिजीवी ना ह। ई त आठ आना पक्का ठीक बा  बाकि मनई परजीवी न हवे,एकर कवन गारंटी बा। ईमानदारी आ मेहनत-मजूरी करे वाला मनई कहइहे का?इनके जिनगी कवनों जिनगी ह। हूसियार लोग के कहनाम ह कि पइसा दिमाग से कमाइल जाला। मेहनत से त कवनो तरे पेट भरेला। अपने आप…

Read More

केहू खातिर बैंगन पथ्य आ केहू खातिर बैरी

का जमाना आ गयो भाया,फुलौरा के नावों लोग भुला गइल। शहरन मे ओकर कुछ दोसरे नाँव राख़ लेले बा लोग। के जानी दही बड़ा बोले लागल बा लोग। आगु बढ़ला के फेर मे कई बेर जान बूझ बुरबकाह बनेला लोग। एह सगरी बातन के पाछे अगुवा बने के सपना होखेला। बाकि कहाउत त जस के तास बा, अजुवो ढेर लोग बेमतलबो के आपन मुँह सुजा के फुलौरा अस कइले रहेला। ई कवानों जरूरी नइखे कि मुँह फुलौरा अस बनावे के पाछे बाउरे बाति होखों, ढेर हाली लोग नीमनो बाति हो…

Read More

कजरी

डाढ़ि डाढ़ि जइसे पातरी बिजुलिया झूले खाइ के कलइया झूले ना। नैन अलोते छिपाई गोड़े गोड़े गुदराई धाइ बइसि के सहेली के कन्हइया झूले। खाइ के दूनो पल्ला बीने बाँधे गोरी बँहिया नेवाधे आधे ऊन में लपेटली सलइया झूले। खाइ   आनन्द संधिदूत

Read More

कजरी

पवन झकझोरे बालम मोरे। नन्ही नन्ही पनिया के बुनिया पलकिया पर ढोय ढोय बदरी बदन प’ गिरावेले कोंवर अंग टोय टोय हँसले रहउँ ना बरेला गुदरउँना सरब अंग बोरे बालम मोरे। नासा भँहु तानेला अकसवा में बोरो लागे जरत बुतात बा धुआँ धुआँ सोरहो सिंगारवा कि बूँन बूँन अँसुआ झुरात बा लोर झरे अँखिया बरवनी के पँखिया हिलेले कोरे कोरे बालम मोरे। सभ्यता समर काटे चिउटी देखत तोर लाजहीन दुनिया कहीं उड़े पल्ला कहीं अँचरा बदरिया के नीक ना रहनिया चम चम बिजुरी कमलदल अँगुरी फोरेले पोरे पोरे बालम मोरे।…

Read More

सवाल के गठरी

हमनीके देश नया नया सवाल उगावे वाला देश ह । कुछ सवाल त परमानेंट बान स जवन कबो ना बदलेलस, साँच कहल जॉव त हमनीक ओके बदलले ना चाही जा । रउवा इहो कह सकीला की सवाल से लड़ल हमनी क पुरनका शौक ह । लईकिन के आजादी आ पोशाक प सवाल त सनातनी सभ्यता का हिस्सा ह । ओहिजे बेरोजगारी वाला सवाल प बुरबक नियर चुप रहले में भलाई समझी ला जा । खुदे कामचोरी क के भरस्टाचार के शिस्टाचार वाला दर्जा दे के नेताजी के भरस्टाचार के गरियावल…

Read More