छाया हव चमचन क,राउर कपार पर बस देत रहा पईसा नरेगा दबाय के, लूटा पंचईती,न चूका,सुराज हव फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के। खद्दर पर दाग,कउनो चिंता क बात नाही पोखरी नीलाम करा,चुपके चुपाय के, गंवई खड़ंजा हो,भलहीं से उंच खाल अपने दुआरी क,रखिहा बनाय के। लूटा पंचईती,न चुका,सूरज हव फिर मुखिया जी,साधा निशाना लहाय के। चिन्ह चिन्ह दिहा,अवास खास खास के मिली कमीशन,हो भीतरैं नदाय के, चाटुकार ओहु में,खोज लिहा मन जोग भोग जे दुआरे,लगावत होइ आय के। लूटा पंचईती,न चूका,सुराज हव फिर मुखिया जी,साधा…
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भोजपुरी साहित्य के काल विभाजन
कवनो भाषा के परिचय के मतलब होला ओकरा उत्पत्ति से लेके वर्तमान तक के क्रम बद्ध गतिविधि के विस्तार पूर्वक जानल भा जानकारी प्राप्त कइल। भोजपुरी हिन्द आर्यन भाषा परिवार के एगो सशक्त भाषा ह,जवना के उत्पत्ति मागधी,प्राकृत आ ओकरा अपभ्रंश से भइल मानल जाला। आजु भोजपुरी के सर्वमान्य लिपि देवनागरी लिपि बा। पहिले से शुरू कके आज ले गौरवशाली भोजपुरियन के चित्त, चिंतन ,चेतना में हो रहल परिवर्तन , परिमार्जन के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में समसामयिक बदलाव के दस्तावेजीकरण के भोजपुरी साहित्य के इतिहास कहल जा सकेला । साहित्य…
Read Moreकजरी
1 अइलें नाही तोहरो बिरनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी। आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी सवनवाँ आई गइलें ननदी। गोतिनी मोरी चलेले अतिराइल अपने पियवा के रंग में रंगाइल कि सून लागे हमरा भवनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी। भोरहीं सिवाने सुनाले कजरिया रहिया निहारत तोहरी गुजरिया कि मानि लेता हमरा कहनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी। बिरहा के मारल तोहरी सजनियाँ रतिया सेजिया आवे नाही निनियाँ कि लोरे सउनाइल नयनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी। आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी सवनवाँ…
Read Moreबड़का रंगदार के
का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के…
Read Moreसमय का संगे साँप-सीढ़ी के खेला
समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…
Read Moreनकाबपोश
“गोड़ लागतानी …… बाबा !” पंडी जी के दसई, फरके से गोड़ लगलें । “जय हो ……! का आइल बाड़े दसई, कवनो काम का बा रे हमरा से ?” ” हं … बाबा ! तनी गृह प्रवेश के दिन पूछे के रहे रउवा से ” सुन … दसई अब हम छोट जात में पूजा- पाठ, विवाह – शादी,कथा- वर्ता करावे खातिर अलगा – अलगा रेट बान्ह देले बानी। काम कके कीच कीच कइल ठीक ना लागे। हतना लेलीं, त होतना लेलीं । हं बाकिर चमरन के छोड़ के तोहनी के…
Read Moreमारीसस देस के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत
सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन ।। मारीसस में “गिरमिटिया” पीड़ा, संघर्ष आ अस्मिता के जवन इतिहास हौ, उ ओकरा के गीत, कविता आ भावनात्मक अभिव्यक्ति में ढाल के अमर कर देहलन ।। “गिरमिटिया आत्मा के आवाज़ रहलन ब्रजेंद्र मधुकर भगत”…
Read Moreएगो मसखरापन के भाव-कुभाव सब जगह हावी बा
1.एगो भोजपुरी निरगुन के मरम “सभकर ख़ूनवा एकही रे हऊवे, धरमवा अलगा – अलगा बा। केहू माई-बाप के चरनिया के धोवे, केहू के माई-बाप दिन -रात रोवे। माई के ममता एकही रे हऊवे, ललनवा अलगा – अलगा बा। हीरा जनम पवल- s सुंदर तन हो, तब काहे गंदा बाटे तोहार मन हो। सभकर नेहिया एकही रे हऊवे,बिचारवा अलगा-अलगा बा।” एह भोजपुरी पारंपरिक निर्गुण में जीवन के जइसे मए मरम राखि दिहल गइल बा। सभकर ख़ून के रंग एकही होला,लाल रंग। धरम अलग-अलग होला। अर्थात् धरम इंसानियत के बांटे के काम…
Read Moreजँतसार (पारम्परिक)
नीची रे कुइयवाँ के ऊंची रे जगतिया ए राम ए रामा पनिया जे भरेली बराम्हनी ए राम घोड़वा चढ़ल अइलें जयसिंह रजवा ए राम ए रामा तनिए सा पनिया पियादा ए राम कइसे मैं पनिया पियाई जयसिंह रजवा ए राम ए रामा जतिया के बानी हम जोलाहीन ए राम जोलहीन जोलहीन मती करा बराम्हनी ए राम ए रामा नकिया में सोभेला बुलकिया ए राम । झर रे झरोखा चढ़ी बियही निरेखे ए राम ए राम जस पियवा सवती ले अइलें ए राम ए राम जस पियवा उढ़री ले अइलें ए…
Read Moreएगो रहलन कवि जी
एगो गाँव रहल जेकर नाम रहे -अमवा घाट। शांत-सुकून से भरल, खेत-खरिहान, नदी-नाला, आ चिरई-चुरगुन के बोल से रजगज।ओही गाँव में रहलन– लोग त “कवि जी” उनका के कहत रहे बाकिर उनकर असली नाम रामेश्वर प्रसाद मिश्र रहल। उनकर कवितई अइसन रहे कि लोग उनकर असली नाम बिसार दिहले। कवि जी कइसे कवि बनलन, ई कहानी बड़ा मजेदार बा। कवि जी रोज बिहाने बिहाने नदी किनारे टहले जास। ओहि किनारे एगो पुरान पीपर के नीचे बइठ जात रहलन । उनके पास ना कागज रहत रहे, ना कलम— बाकिर दिमाग में…
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