हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा…
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तेल के खेल
समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत…
Read Moreभोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?
भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद जइसन देशन ले फैल गइल बा। लगभग 20–25 करोड़ लोग भोजपुरी समझेला या बोलेला। बावजूद एह सब के, आज ई भाषा आपन घरे में आपन आस्तित्व के संकट से जूझत बिया। सबसे बड़…
Read Moreभोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा
भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि “लोकप्रिय गीतन” के उभरेला ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से कहीं जादे व्यापक बा। भोजपुरी ना त खाली “मौसमी” गीतन के भासा ह, न खाली मनोरंजन के साधन; ई संघर्ष, करुणा, त्याग, समर्पण, श्रम, वियोग अउर मुक्ति के जियत-जागत सांस्कृतिक दस्तावेज ह। त्याग अउर समर्पण…
Read Moreभोजपुरी गीतन में होली वर्णन
भोजपुरिया धरती उत्सवधर्मी धरती ह। भोजपुरिया लोकजीवन मुख्य रूप से खेती-किसानी पर आधारित बाटे ना, त मेहनत मजदूरी पर। भोजपुरिया लोकजीवन के हर एक परब त्योहार कृषि से जुड़ल बाटे। एह त्योहारन में होली-फगुआ के त कहहीं के का बा?घर के कोठिला में घान-चाउर भरल रहेला, बघार में गेहूँ गदरात रहेला,आम-महुआ मोजरात रहेला आ सरसो पिअर रंग फुलाए लागेला,त समझीं बसंत आ गइल बा। किसान-मजदूर देख-देख हरखित होला आ बसंत पंचमी से शुरू होखे वाला होरी के उत्सव अबीर खेल के शुरू करेला आ लगभग चालीस दिन तक एह…
Read Moreभुलरू बाबा के रहस्य
गाँव में एकहि गो नाव सभकरा बतकही पर चढ़ल रहे, उ रहे भुलरू बाबा के नेकी आ दान धरम । लोग बाग कहत रहले कि ऊ साधारण मनई ना, देवता के रूप हउवन। पाँच गो भाई में तिसरका, आ चालीस बरिस के हो गइले बाकिर बिआहो ना कइले आ ऊपर से विद्वान आ दानी। गांव में बाबा के बाबू जी स्कूल खोलले रहले। बाद में पक्का बनल आ सरकार से मान्यता भी मिल गइल। प्रिंसिपल आ सीनियर मास्टर खुदे भुलरू बाबा रहले। भुलरु बाबा के जिनगी स्कूल के लइका-बच्चा से…
Read Moreफगुआ के लोक-दर्शन : राग से विराग तक
फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला। मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।” बसंत के राजसी छटा खाली मौसम के बदलाव ना, बलुक विज्ञान से लेके मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आ आध्यात्मिकता तक के गहिर ताना-बाना में गूँथल बा। फगुआ–होली भारत के समेकित जीवन-अनुभव के रंग-बिरंग उत्सव ह, जेकरा…
Read Moreजब से बहल बयारि फगुन के।
अमराई में कहईं कोइलि बोल गइल ह। मोजर गंध हिया के बान्हन खोल गइल ह। उसठा होंठ कसाँइन लागे आँखिन चढ़ल खुमार सगुन के। कवन निगोरा टेसू बन में आग लगावल? कोना आँतर में मुरझाइल राग जगावल। पनख रहल मनगुपुते डारी अँखुवन से गँउजार तरुन के। कुइँ दल खिलल भँवर मदमातल, घूप थिराइल। तलई के पानी में केकर रूप हिराइल? बउराहिन जलमछरी जोहे पता न कउँची खाक-बिहुन के। रतियो कुछ गर्हुआइल जइसन, चैन उपाटल। ना सुख सपन सिराइल तबले, नीन उचाटल। बन पाँखी के तान तान से,…
Read Moreअपनापा
फगुनहट के सुगंध गाँव में उतर चुकल रहे। महुआ टपकत रहे आ हवा में भींजल मिठास घुलल रहे। रामदास के घर के आँगन में चूल्हा दहकत रहे। कड़ाही में पुआ फूल-फूल के उठत रहे जवना के रामदास के कनिया आँचल सम्हारत उलट-पुलट करत रहली। रामदास के पत्नी सीता खूब गोर,हँसमुख आ मेहनती रहली जेकरा कारण सबके मन में उनकर खास जगह बन गइल रहे। रामदास, सादा मन के किसान रहले पर होली उनकर खास परब रहे। पुआ छानत कनिया के दुआर के ओहँगन पर खड़ा होके मुस्कुरा के देखत रहलन…
Read Moreआयल जगावे फगुनवा
जागा जवान अरे जागा किसान आयल जगावे फगुनवा, रंग बिरंगा है नेहिया के बान आयल जगावे फगुनवा। सुगना जगावे कोयलिया जगावे गेहुंआ के बाली पे नाच दिखावे, भौरा जगावे ला गावे हो गान आयल जगावे फगुनवा। वीरों का मौसम है, वीरों का चोला, देखि वसन्ती जिया मोरा डोला। जय बोला जवान, जय बोला किसान, आयल जगावे फगुनवा। जागा जवान अरे जागा किसान आयल जगावे फगुनवा। रंग बिरंगा है नेहिया के बान आयल जगावे फगुनवा। उमाशंकर शुक्ल दर्पण ग्राम -पोस्ट पक्खनपुर बिछैला जिला अम्बेडकरनगर, उत्तरप्रदेश पिन 224125 दूरभाष 8882168961
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