एगो गाँव रहल जेकर नाम रहे -अमवा घाट। शांत-सुकून से भरल, खेत-खरिहान, नदी-नाला, आ चिरई-चुरगुन के बोल से रजगज।ओही गाँव में रहलन– लोग त “कवि जी” उनका के कहत रहे बाकिर उनकर असली नाम रामेश्वर प्रसाद मिश्र रहल। उनकर कवितई अइसन रहे कि लोग उनकर असली नाम बिसार दिहले। कवि जी कइसे कवि बनलन, ई कहानी बड़ा मजेदार बा। कवि जी रोज बिहाने बिहाने नदी किनारे टहले जास। ओहि किनारे एगो पुरान पीपर के नीचे बइठ जात रहलन । उनके पास ना कागज रहत रहे, ना कलम— बाकिर दिमाग में…
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अपनापा
फगुनहट के सुगंध गाँव में उतर चुकल रहे। महुआ टपकत रहे आ हवा में भींजल मिठास घुलल रहे। रामदास के घर के आँगन में चूल्हा दहकत रहे। कड़ाही में पुआ फूल-फूल के उठत रहे जवना के रामदास के कनिया आँचल सम्हारत उलट-पुलट करत रहली। रामदास के पत्नी सीता खूब गोर,हँसमुख आ मेहनती रहली जेकरा कारण सबके मन में उनकर खास जगह बन गइल रहे। रामदास, सादा मन के किसान रहले पर होली उनकर खास परब रहे। पुआ छानत कनिया के दुआर के ओहँगन पर खड़ा होके मुस्कुरा के देखत रहलन…
Read Moreआपन बात
ईश्वर की सृष्टि के साथ मिले, त तनाव दूर होखे के सथहीं रचना में इहे आदमी के मूड के बेहतर करे के रसायन भी बन जाला। ई हमनी के शरीर के कोशिका सभन के भी पोषित करेला। । मानसिक स्वास्थ्य खातिर भी ई एगो टॉनिक होखेला। एहसे ऊर्जा, ताजगी, चैतन्यता के साथे जीवनशक्ति बढ़ जाला। प्रकृति के रचना के संग सुकूं आ शांति भी मिलेला जेह से तनाव आ चिंता भी दूर हो जाला आ सोच सकारात्मक दिशा के साथ कुछ नया करे खातिर प्रेरित करेला।अइसहीं सभ त्योहार के आपन…
Read Moreमाटसाहेब
माट साहेब के आवे से पहिले लइका सब इस्कूल गेट पर भीड़ लगा देत रहलन। माट साहेब आवते हाथ में बाल्टी उठा लेस।उनका पीछे सब बच्चा सब सफाई में लाग जात रहले। तनिके देर में इस्कूल के काया कलप हो जात रहे। फेर सब लइकन के सथहीं बइठा के ककहरा, पहाड़ा, कविता आ खेल सब करवावस।लइकन के साथहीं खाना खाये बइठस। छुट्टी होते अपना फटफटिया पर छुटल छाटल लइकन के साथे भी ले जास। ई माट साहेब के गाँव के कुछ लइका,जवन कि ओही इस्कूल से पढ़ के काॅलेज पढत…
Read Moreआपन बात
अनघा भाव मन के उद्बबेगत बहुत कुछ कह जाला। उहे सब जब लेखनी में समा के कागज पर उतरेला तब सबकुछ नया नया लागेला। बीतल समय से बहुत सुन्दर चित्र मिलेला जवना में वर्तमान परिप्रेक्ष्य खुद हीं अपना के फिट पावेला आ ई मेल मन के खूबे भावेला।सुख, दुख,दया, अहम ,क्रोध आदि भाव साक्षात आपन प्रभाव डालेगा। अपना गुण के अनुकूल ई रिश्ता में खटास आ चाहे मिठास ले आवेला बाकिर रचना के मरम हमेशा आनंद में परिवर्तित हो के मिलेला। शिव सृष्टि के सिरजक हईं।उहाँ के मानुष आ प्रकृति …
Read Moreसोझ, सपाट आ सरल भाषा के कहानी संग्रह- अकथ प्रेम
अपने माई भाषा भोजपुरी में आजु कहानी के सिरजना करे वाली महिला लेखिका लो अंगुरी पर गिने भर बाड़ी। त अइसना में डॉ रजनी रंजन के बारे में ई कहल कि उ भोजपुरी साहित्य जगत में पहिचान के मोहताज नइखी, अतिशयोक्ति ना कहाई। डॉ रजनी रंजन भोजपुरी कि साहित्यिक मासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के खोज बाड़ी आ उनुका लेखन के बीरवा एही पत्रिका संगही फरत फुलात आगु बढ़ल। एह कहानी संग्रह के सगरी पहिले से लोक में बाड़ी सन, काहें से कि कुल्हि पतरिकन में प्रकाशित हो चुकल बाड़ी…
Read Moreलोक-परलोक के संघतिया
दुलारी देवी के सज्जन सिंह से बिआह भइला 40 बरीस खुल के ना बोल पावत रहली आ ना उनुका से नजर मिला सकत रहली। उनकर खड़ाऊँ के खटर खटर सुनऽते उनकर घूघ नाक तक आ जात रहे। सज्जन सिंह से ऊ कुछुओ बोलऽतो बतिआवत रहली कि ना कहल मुसकिले रहे। सज्जन सिंह बड़ी दम-खम वाला जमींदार के पूत रहलन।जमींदरई त माई-बाप संगही ओरा-बिला गइल रहे बाकिर ओकर असर सज्जनसिंह पर अजुओ खूब रहे। दुआर पर हरदम आसामी आ अंगना में औरतन के खेत खरिहान से आइल सामान के बटोरे-सटोरे के…
Read Moreनदी आ बेटी
नदी आ बेटी के सिरजन भगवान धरती के सुनरी सरूप बदे बनवलन। धरती पर मनई के बसे आ जीये बदे ई दुनो जन के अपना जीवन नेछावर करेके भेजलन। बेटी धरती पर मनई बसईली त नदी ओही मनई के जीवन दान दिहली ।खेती आ पानी के जुगाड़ के जिम्मा ई लिहली। ऐसही धरती फलत-फूलत आज एतना बड़ आपन संसार बना लिहली। खूब खूश होखे ई दुनो जन आपन एतना सुंदर सिरजन देख के। आज नदी बेकल बारी। उनका के सब लोग गंदा कर देत बा। उ आपन दुख केकरा से…
Read Moreभउजी
हमरा पूरा जवार में एके गो भउजी रहली । बिजे भउजी। गाँव में भउजी , चाची, दादी ई सबलोगन के उनकरा ‘भतार’ के नाम से ही बोलावल जाला। आ सब नाम के साथे ‘वा’ आ चाहे ‘ईया’ लगा के बोलला से अपना निअन जनावेलन लोग। भईया हमरा सब गोतिया के बड़ बेटा हउअन। गाँव में बड़ लोग उनका के बिजइया आ छोट लोग बिजे भईया आ बिजे चाचा कहेलन। बिजे भईया सगरी जवार के छोट लइकन के देखनहार रहलन। उहे सभ लइकन के पढाई लिखाई आ चाहे अउरो कवनो बात होय…
Read Moreहरिहरी काकी
भोरे भोरे फोन घरघड़ाइल त हरिहरी चाची कसमसात पलंग से उठ के ओकरे तरफ झटक के बड़बड़ात चलली- कवना के भोरे भोरे आग लागल बा।आजकाल ई फोनवो आदमी के जान पर बनहुक नियन गोली दागता।आरे आवतानी रे।तनी थिर हो रे बाबा।तोरा नियन हमरा में जान थोड़े भरल बा, जे हमहु घनघना के पहुंच जाइब। उमिर भइल। कहत कहत झटकले फोन उठवली- परनाम अम्मा! हम मनहरन। का भइल एतना भोरे भोरे तान कसले बाड़ऽ। आरे अम्मा! जरूरी बा।अबहीयें बम्बई जाये खातिर टरेन धरे के बा।एही से फोन कइनीहऽ। का भइल हो?…
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