भोजपुरी नाटक के विविध रूप

नाटक एगो अइसन विधा ह, जवना के ब्रह्म आँख से देख के कान से सुन के होला। ई विधा बहुत पुरान ह। एकरा सम्बन्ध में कई प्रकार के मत पावल जाला। नाटक के उत्पत्ति का विषय में एगो कथा बा कि सब देवता लोग ब्रह्मा जी के पास में गइल लोग आ काहल लोग कि एह शृष्टि में मनोरंजन के कवनों व्यवस्था कइल जाव। ब्रह्मा जी शृग वेद से कथानक,सामवेद से संगीत अथर्व वेद से रस आ अजुर्वेद से अभिनय लेके पांचवा वेद नाट्य वेद के अवतारना कइनी। ओकरा बाद एगो रंग मंच तइयार भइल। ओकरा बाद उहाँ का भारत मुनि के निर्देश दिहनी कि अब नाटक के प्रदर्शन कइल जाव। ब्रह्मा से प्राप्त ज्ञान का अनुसार नाट्याचार्य जवन नाटक प्रस्तुत करवनीं ऊ नाटक के नाँव देवासुर संग्राम रहे जवना में देवता लोग के हार हो जात बा। देवता लोग का क्षोभ भइल। भारत मुनी बतवलें कि नाटक में कवनों प्रकार के पक्षपात के गुंजाइस ना होला। ई एगो मनोरंजन ला कइल जाला आ सामाज के एगो आइना देखावेला । भोजपुरी का पहिले संस्कृत में नाटक राजदरबार में होत रहे।

भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र जी नाटक के व्यवस्था करत लिखत बानी कि काव्य के सर्वगुण सम्पन्न खेल के नाटक कहल जाला । एकर नायक कवनोंमहाराज भा ईश्वर भा परमेश्वर होखे के चाही। एह में रस, शृंगार ,मनोरंजन, हास्य सब होखे के चाही।

नाटक पहिले काव्य के अंतर्गत लिखल जात रहे, बाक़िर बाद में एकर विकास स्वतंत्र रूप से भइल,जवना में रंगमंच के नाटक के एगो तत्व का रूप में स्वीकार कइल गइल आ संवाद के महत्व बहुत बढ़ गइल। नाटक के रचे वाला लोग परदा के पीछा चल गइल आ एपर आउर मेंही से काम भइल।

नाटक के प्रमुख तत्व के रूप में निम्न लिखित के चर्चा कइल आवश्यक बा।

  1. नाटक के वस्तु (कथानक),2. नाटक के पात्र (अभिनेता),3. नाटक के समय आ स्थान , नाटक के संवाद, 5. नाटक के उदेश्य , 6. नाटक के संरचना शिल्प शैली, 7.नाटक के रंगमंच , 8. गीत-संगीत, नृत्य आ 9. नाटक के रस , जब ई सब कुछ नाटक में होई तब जाके नाटक पूरा होई। जहाँ तक भोजपुरी नाटक भा लोक नाटक के बात आवेला त अनायास भिखारी ठाकुर के ही नाम आवेला। भिखारी ठाकुर के बहुत नाटक बा, विदेसिया , भाई विरोध, बेटी-बेंचवा, विधवा-विलाप, पुत्र-बध, गंगा-स्नान , राधे श्याम बहार ,ननद-भउजाई आदि बाक़िरभोजपुरी नाट्य साहित्य के बात आई त 1984 ई0 में नाटक के श्री गणेश रविदत्त शुक्ल , देवासुर चरित  भोजपुरी में लिखनी। ई नाटक पूर्ण रूप से भोजपुरी ना रहे। ई नाटक हिन्दी नाटक का साथे भोजपुरी संवाद के व्यवहार भइल रहे। ओह काल क्रम में एह शुरुवात का बाद और कुछ भी नाटक का रूप में सामाग्री आइल होई, बाक़िर पाठक के अभाव , ब्रिटिश हुकूमत आ नियम कानून का चलते दब गइल होई, दबा दिहल होई, ई सब शोध के विषय बा, बाक़िर लोक नाटकके पूर्व परंपरा गाँव-गवई संस्कार आ खून में रसत बढ़त पीढ़ीआगे बढ़त गइल,जवन भिन्न-भिन्न विषय वस्तु का साथे अलग-अलग रीति-रिवाज परंपरा स्थान का दृष्टिकोण से अलग अलग रूप आ प्रकार में व्यक्ति समाज का सोझा आवत रहल, जवन आगे अपना विविध रूप डोमकच, नौटंकी, रामलीला,बहुरूपिया, जट-जटनी, भाँड़,चैता,नेटुआ, पंवरिया, बख्तों-बख्ताइन, नट, कठपुतरी , खेल-तमासा आदि का रूप में जानल सुनल जात रहे।

डोमकच:- ग्रामीण क्षेत्र में महिला लोग द्वारा ई नाटक खेलल जाला । एकर एगो विशेष प्रयोजन होला। ई मुख्य रूप से लड़का  का विवाह के दिन होला। जब घर से बारात निकल जाला । घर दुआर, टोला-मुहल्ला सब शांत हो जाला, ओह समय रात्रि में चोर उचक्का द्वारा घर में चोरी हो जाये का डर से डोमकच के आयोजन होला। सब लोग रात भर जागल रही । एह में कवनों मंच के आवश्यकता ना होला ना लाइट साउंड के । औरत लोग लालटेन , दिया बाती का माध्यम से ई डोमकच खेलेला। ई मूल रूप से बिहार आ उत्तर प्रदेश में खेलल जाला।

नौटंकी:- लोकनाटकन में ई एगो अइसन विधा ह,जवना में आकृति प्रकृति आ मंच सब एके साथे मिलेला। जयशंकर प्रसाद रंगमंच निबंध में  नौटंकी के चरचा करत ई मानत बारें कि नौटंकी शब्द नाटकी से बनल बा।

            अइसन मानल  जात बा कि तेरहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो के परयास से नौटंकी के बढ़ावा मिलल आ उ नौटंकी के भाषा पर आपन प्रभाव डललें। कुछ जगहा नौटंकी के ‘स्वांग’ आ ‘भगत’ भी कहल जाला। डॉ श्याम परमार के नौटंकी में आल्हा छंद के वीर रस के उत्कर्ष  प्रदान होला । श्री रविन्द्र भ्रमर  लोकनाटकन के दू गो भाग में बाँटत बारें-

  1. धार्मिक 2. लौकिक। लौकिक नाटकन के तीन गो प्रकार होला- भाँड़-भँड़ैती ,विदेसिया आ नौटंकी।

अइसनो कहावत बा कि नौटंकी के जन्मदाता मल्ल, रावत आ रंगा नाव के आदमी लोग रहे , जवन ढोलक पर आपन अभिनय देखावत रहे।

मल्ल जाट जाति के , रावत राजपूत आ रंगा जुलाहा। ई कवनो जाति विशेष के नाटक ना ह,नौटंकी में कवनो ना कवनो रूमानी कथा जरूर होला। ओकरा साथे ओकर प्रिय यंत्र नगाड़ा ह।

डॉ पद्म सिंह शर्मा कमलेश नौटंकी के प्रेम कथा का रूप में मानत बारें। “शीरी-फरहाद”, “सुल्ताना डाकू”, “लैला-मजनू” त्रिया चरित्र, ई सब नौटंकी ख्याति प्राप्त कर चुकल बाड़ी सन। नौटंकी के मंच खुला स्थान पर प्रायः बनावल जाला , मंच बनवला का बाद ऊपर से सामियाना लगा के नगाड़ा वाला एगो कोना में बइठ के आपन-आपन नगाड़ा बजावेलें। दर्शक लोग के साफ दिखाई डेला। हाथरस के नाथा राम नौटंकी के जानल-मानल लेखक बाड़ें। नौटंकी शाहाबाद जिला, चंपारण,सारण कमिश्नरी के हरेक अंचल में आजों खूब होला।

रामलीला:- भोजपुरी इलाका का साथे मैथिली,नेपाल,वृन्दावन में रामलीला के मंचन होत रहेला। रामलीला पौराणिक रामकथा पर आधारित होला। एकर संवाद पद्यात्मक दोहा, चौपाई बा। एकर रंगमंचसब खुला मैदान में होला, जहाँ हजारों लाखों लोग रात-रात भर  बइठ के एकर आनंद उठावेला। रामलीला में मुख्य रूप से धनुष यज्ञ  के दृश्य , सीता स्वयंबर , परसुराम – लक्ष्मण संवाद ,राम वन गमन,सीता हरण, लंका दहन,अंगद-रावण संवाद,लक्षमन –मेघनाथ युद्ध, राम- कुंभकरण युद्ध , राम-रावण युद्ध, भरत मिलाप, आ राम राज्याभिषेक ई सब रामलीला में देखावल जाला, जवना के श्रोता देख के आग़ा जालें।

बहुरूपिया:- बहुत साल पहिले विद्वान लोग के मत रहे कि बहुरूपिया एगो मुगल दरबार के आकर्षण रहे सन। एके गो आदमी कई एक गो रूप बना के समाज के मनोरंजन करS सन। आजों ई परंपरा बा। आज त ई गोरखधंधा हो गइल बा।  जिये खाये ला ई नाटक प्रसिद्ध ब। ई भोजपुरी, मैथिली आ आदिवासी क्षेत्रन में आपन कारनामा देखावत रहे लें सन। हर दिन अलग-अलग मेकअप, कबही दरोगा,वकील,कालीचंडी,शंकर जी के भेष बना के आपन जीवन यापन कर रहल बारें सन।

जट जटनी:- ई नृत्य संगीत मुख्य रूप से भागलपुर , मुंगेर अउर मिथिला के इलाका में प्रचलित बा। उत्तर बिहार आ भोजपुर क्षेत्र के गाँव कुछ गीत गा के हँसा के मनोरंजन करेली सन। एह में दू गो दल होला । औरतन के एगो दल जाट बनेला , उ अपना माथा पर साफा (पगरी) धोती बंडी,कुर्ता , गमछा आ दूसरा दल आपन पारंपरिक परिधान साड़ी, लंहगा पहिरेला। एह में लोकगीत आ संगीत का माध्यम से संवाद होला।

भाँड़:- भाँड़ एक प्रकार के एगो नाटक ह, केहु के नकल उतारल आ स्वांग धारण कइल, ई एगो व्यवसाय बन गइल। अइसन लोग मुख्य रुप से दिल्ली,बनारस , कन्नौज माणिकपुर में रहे वाला बा । एह लोग के स्संगीत के जवन शृंखला बा , बहुत लंबा चलेला। ई लोग पौराणिक नाटक का आधार पर आपन प्रदर्शन करेला। हाल तक बनारस में रांनआठ भाँड़ आपन उत्कृष्ट कला देखावत रहस। भाँड़ शादी बियाह जइसन अवसर पर पहुँच के अपना में बात करके ढोलक पर ताल दे के , संवाद कर के हँसावे  के काम करेला। एह लोग के मेकअप  बेढंगा रही, जवना से मंच आवते लोग का हँसी छूट जाई। इ लोग बात-बात में लटका तुकड़ आ पढ़ गढ़ लेवेला। एह लोग के संवाद के स्तर स्वभाव लोकमानस के बहुत नजदीक बा । एही से एकरा के लोग लोकनाटक में रखले बा। एकरा पर जादा बहस कइल ठीक नइखे।

चैता:-  चैता बिहार के एगो अइसन लोक नाटक ह, जवना में सैकड़ों लोग गोलाकार बइठे ला । झाल मजीरा के साथ बीच में ढोलक मंजीरा छिटकाबीच में गावे वाला गाई साथे ओकरा सब लोग मिल के गावेला । बीच वाला आधा गावेलें, आधा सैकड़ो लोग गाई । एकरा चारों ओर लोग के तांता लागल रहेला। आज चइता के स्वरूप बदल गइल बा । आज नर्तकी के राख़ के चइता करावल जात बा। मधुमास फागुन आ ठीक बाद चैत में ई मुख्य रूप से गावल जाला । एही से एकरा के चइता कहल जाला।

नेटुआ:- ई उत्तरी भारत में एक जगहा से दोसरा जगहा आपन ठेकाना बदलत रहे वाला जाति ह। एकरा के लोग बनजारा भी कहेला । ई सुंदर गठीला बदन वाला होलें सन। एकनी के पेशा गांवा गाई घूम के मदारी, बाजीगरी , पहलवानी देखावेला। एह लोग के मंडली में दू से तीन आदमी होलें, जवन बजार गाँव में जाके नाटकीय भाव में मनोरंजन करेला।

      ई एगो पेशेवर जाति होले , इनकार काम घुमत-फिरत सारंगी , तबला अउर कंसी पर नटुआ लड़का साड़ी ब्लाउज पहिन के नारी का पूरा आभूषण का साथे हाव-भाव लड़की के भूमिका निभावेला । एह लोग के देखे वाला दर्शक अक्सर ग्रामीण होलें । ओकरे के आज का समय में लौंडा नाच कहल जाला। अब ई एगो जाति विशेष के नाच नइखे रह गइल। गंगा स्नान आ छठ पूजा में लोग अपना बच्चा के मनौती का भाड़ा में माई अपना अँचरा पर लौंडा नाच करावेलीं। नटुआ के नाच में राजा विक्रम के सात गो रानी लोग सौतिया दाह कहानी के वर्णन बा। नेटुआ लोग के रंगमंच कहीं तइयार हो जाला।

पँवरिया:- ई एगो विशेष  तरह के ढोलक का सहारे गावय जाये वाला सोहर गीत आ नृत्य करे वाला लोग ह। केहु का घरे जब बच्चा होलें, त ई लोग पगड़ी, अचकन , पायजामा आ ओहू में कुछ लोग नारी का भेष-भूसा में आल्हा,रुदल  आ कुँवर सिंह बीरगाथा गावेला लोग। पँवरिया:- एगो अइसन गीत आ नृत्य का रूप में मानल जाला जवना में मान गुजरिया , राजा परिसोतिम, मामा-भगिना ,कुँवर सिंह , चैन सिंह लोग के कथा आ गीत लंबा समय से गावत आवत बारें सन। ई जवना क्षेत्र में जालें सन, उहाँ के राजा महाराजा पर गीत बनाके गावे लगेलें सन। शाहाबाद में कुँवर सिंह , चंपारण में राजा चैन सिंह के कहानी गाथा के रूप में बा। ई जवना घर में सज-धज के  जालें स, उहाँ बीर गाथा गावत समय तलवार , भाला आ शस्त्र चलावत पैंतरा बाँध-बाँध के एक दोसरा पर वार करे के चाहे लें स , त सहजे ई लोक नाटक बन जाला।

बक्खो-बखाइन:- एहो एगो पँवरिये के मिलल-जुलल रूप ह। एमे एगो पति –पत्नी रहे ले स। केहु का घरे जब लड़का पैदा होला, त लोग आमंत्रित करेला भा ई लोग पता लगा के चल आवेला। ई आपन संगीत मचिया पर बइठके खंझरी बजावत गावेलें स आ परिवार के लोग दर्शक बन के एहनिन के घेर के देखेला। माई,दादी , फुआ आ चाची लोग पईसा , कपड़ा लत्ता लुटावेला । ई लोग पूरा प्रसव पीड़ा से बच्चा भइला तक नाटकीय ढंग से परोसेला । नाचत खेलत बच्चा के पालना में से उठा के पइसा कौड़ी, सोना-चाँदी  के माँग करेला। जब माँग पूरा हो जाला त उ लोग बच्चा के आशीष देके ओकरा माई के दे देवेला।

नट:- दू  गो दिसा में रस्सी बाँध के एगो लड़की आ ताकी सावधानी से चलेला लोग । एगो लग्गी के सहारे कबही-कबही ई लोग नट –मदारी आ जमूरा बन के अजीबो गरीब कारनामा करेला। मदारी जमूरा से सवाल पूछेला आ जमूरा ओकर उत्तर देवेला।

कठपुतली:- काठ के बनावल एगो गुड्डी भा कठपुतली । ई गाँव देहात में राजस्थानी भेष-भूषा में कठपुतली खेल-तमासा दिखावे वाला लोग होला। ई लोग कठपुतली नृत्य अपना थिरकत उँगली से कठपुतली धागा से सधल रहेला। हाथ के इसारा पर ई नाच होला । एकरा ला मंच के जरूरत नइखे। गांवा गाई कठपुतली के खेल देखावे ला ई लोग। अतना निपुन रहेला कि एक आदमी दू-दू गो कठपुतली नचा लेवेला। ई लोग राजस्थान के प्रतापी राजा , मुगल बादशाह लोग के काठ के पात्र के अभिनय करावेला । ग्रामीण इलाका भा मेला में गुलाबो, सिताबो,नामक बहिन लोग के घर के कलह के कठपुतली के द्वारा नाच होला। ई लोग पृथ्वीराज चौहान के कहानी कठपुतली के माध्यम से प्रदर्शित करेला। ई सब नाटक का श्रेणी में आवत बा।

      उपयुक्त नाटक के विविध रूप के देखत नाटक भा लोकनाटक का विषय में जानल समझल जा सकेला।

डॉ सुधांशु कुमार सिंह

मो.-7739515152

 

संदर्भ ग्रंथ:-

  1. भोजपुरी नाटक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय
  2. लोकधर्मी नाट्य परम्परा-लेखक श्याम परमार, प्रकाशक-हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय वाराणसी, प्रथम संस्करण मार्च 1959 पृष्ट-47
  3. हिन्दुस्तानी, त्रैमासिक, जुलाई 1937, पृष्ट-255
  4. लोकधर्मी नाट्य परम्परा-लेखक श्याम परमार, प्रकाशक-हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय वाराणसी, प्रथम संस्करण, मार्च 1959 पृष्ट-50
  5. हिन्दी साहित्य कोश, प0 ज्ञानमंडल लि0बनारस ,प्रथम संस्करण संवत 2015
  6. आलोचना त्रैमासिक, नाटक विशेषांक , हिन्दी लोक नाट्य लेखक – रवीन्द्र भ्रमर , प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
  7. अंजोर,भोजपुरी परिवार त्रैमासिक मुखपत्र अप्रैल-जुलाई 1971 , पृष्ट -9
  8. लोक साहित्य की भूमिका , लेखक- डॉ कृष्ण देव उपाध्याय , प्रकाशक – साहित्य भवन प्रा0 लि0 इलाहाबाद , प्रथम संस्करण 1957, पृष्ट-87
  9. वही…………… पृष्ट संख्या-216
  10. भोजपुरी लोकगीत भाग-1 , लेखक – डॉ कृष्ण देव उपाध्याय

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