सोझ, सपाट आ सरल भाषा के कहानी संग्रह- अकथ प्रेम

अपने माई भाषा भोजपुरी में आजु कहानी के सिरजना करे वाली महिला लेखिका लो अंगुरी पर गिने भर बाड़ी। त अइसना में डॉ रजनी रंजन के बारे में ई  कहल कि उ भोजपुरी साहित्य जगत में पहिचान के मोहताज नइखी, अतिशयोक्ति ना कहाई। डॉ रजनी रंजन भोजपुरी कि साहित्यिक मासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के खोज बाड़ी आ उनुका लेखन के बीरवा एही पत्रिका संगही फरत फुलात आगु बढ़ल। एह कहानी संग्रह के सगरी पहिले से लोक में बाड़ी सन, काहें से कि कुल्हि पतरिकन में प्रकाशित हो चुकल बाड़ी…

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भोजपुरी साहित्य में प्रेम अउर सद्भावना

लोक में रचल-बसल भोजपुरी भाषा आ ओह भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास, अपना जड़ से मजबूती से जुड़ल समाज आ ओह समाज में पसरल रीति-नीति के आपन अलग विशेषता बाटे। अपने एही विशेषता के संगे अलग- अलग सोपान गढ़त, ओके सजावत-सँवारत, ओकरे भीतरि के सुगंध के  अलग-अलग तरीका से अलग-अलग जगह बिखेरत भोजपुरी भाषा सदियन से गतिशील रहल बा आ अजुवो ले बा। अपना रसता में आवे वाला कवनो झंझावत से उपरियात, समय के मार के किनारे लगावत अपने भीतरि के ऊष्मा जस के तस अपने में समुआ के…

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ठकुरान के ठसक

विंध्य के पहाड़ियन के घाटी में बसल गाँव आ उहाँ के रहनिहारन के एगो अलगे सुघरई होले। पहुनई में त करेजा काढ़ि के रख देला लो, बाकि मोछ के बात आ गइल बेखौफ आर-पार करे खातिर उतर जाला लो। खेती- किसानी आ गोरू-बछरू से नेह छोह राखे वाला लो अपनइत नीमन से निबाहेला। अइसने एगो गाँव के बाति जवना गाँव में ढेर बाभन लोग रहे। ओह गाँव में अउरो जात धरम के लोग रहे बाकि एगो खास बात उ ई कि ओह गाँव में एगो राजपूत परिवारो बसल रहे। धन…

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पंडित हरिराम द्विवेदी होखला के माने मतलब

पंडित हरिराम द्विवेदी से हमार रिस्ता 12 पीढ़ी पुरान ह। कांतिथ के परवा गाँव से आइल कश्यप गोत्रीय  3 भाइन के एगो परिवार में से एक भाई के खानदान से उहाँ के बानी आ दोसरा भाई के खानदान से हमनी बानी। उहाँ के 11 वीं पीढ़ी में बाड़ें आ हम 12वीं पीढ़ी में। माने ठसक के संगे दयादी बा आ उ अजुवो जियल जा रहल बा। लोकजीवन आउर लोक संस्कृति के कतौ जब बात होखे लागेला, त चाहे-अनचाहे लोककवि लोगन के भुलाइल संभव ना हो पवेला।भोजपुरिया जगत मे अनगिनत लोककवि…

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आपन बात

अझुरहट के सझुरावत ,रसता बनावत गवें-गवें आगु बढ़े के जवन तागत साहित्य से मिलेले उ कहीं अउर से भेंटाले कि ना, एह पर कुछ कहल एह घरी हमरा उचित नइखे बुझात। भोजपुरी साहित्य के धार के आपन बहाव ह,लहर ह,तरंग ह, हुहुकारल ह, फुफुकारल ह। ओही में आपन-आपन नइया लेके हिचकोला खात किनारा पहुँचे क ललक जिनगी के प्रान वायु लेखा बा। आजु भोजपुरी में जहाँ साहित्य के झोली भरा रहल बा, उहें एहमें ढेर विकारो आ रहल बा। जवने क हाल-समाचार समय-समय पर उतिरात रहेला। कई बेर साँच के…

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बाप के माल ह

इनकर उनकर सबकर दबा के हजम कइल रउरे चाल ह। बेसरमी से कहेलन बाप के माल ह।   कुछो जोड़-घटा द इहाँ उहाँ के कुछो सटा द कुछ गूगल से उधार करS बाचल-खुचल अनुवाद करS फेर कतनों अनवाद करS थेथरई त ढाल ह। बाप के माल ह।   एगो गिरोह बना ल कुकुर-बिलारो के मंच पर चढ़ा द जेकरा स के नइखे पता ओकरा शोध के काम पकड़ा द कबों अपनों विरोध करवा  द एह पर त सभे निहाल ह। बाप के माल ह।   कतों घुसुर के तर्क-बितर्क अपना…

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दुनिया त गोले नु बा

का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बाजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के…

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बतावा बुढ़ऊ

काहें काशी पर मोहइला बतावा बुढ़ऊ। काहें आदि देव कहइला बतावा बुढ़ऊ।   जाने के त सभ जानेला हउवा बड़का दानी भगतन खातिर कई जाला, बढ़-चढ़ के मनमानी काहें असुरन पर लोभइला बतावा बुढ़ऊ।   जेकर अरजी तहरे लग्गे दुख ओकर भागेला दाही-दुसमन भूत-प्रेत, पानी सबही माँगेला काहें दसानन से लुटइला बतावा बुढ़ऊ।   हम निरधन तहरा सोझा,हमके राह देखावा मझधार में बूड़त नइया, ओके पार लगावा काहें हम पर ना छोहइला बतावा बुढ़ऊ।   कैलास के बासी हउवा, मृग छाला पहिरेला जंगल झाड़ का बतलाईं, पहड़ो में रहि लेला।…

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कजरी

भर सावन मोहे तरसइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। कवना सउतिन में अझुरइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   खेतवा फाटे अस फटे बेवइया बेहन सूखत जइसे मुदइया काहें असवों नाहीं अइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   कइसे जीहें चिरई-चुरमुन बबुआ चलिहें कइसे ढुनमुन ई बुझियो ना सरमइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   मचल बाटे हाहाकार अवता लेता सभे उबार कवना बातिन से कोहनइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   तोहू भइला जस विकास तूरला किसानन के आस जनता फेरा में फंसइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।  …

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बनउवा रूप तहरा

दहके पलास फूल जिया डहकावे हो। बनउवा रूप तहरा हमरा ना भावे हो॥   सोरहो सिंगार ओढ़ि ललखर चुनरिया गाँव नगर होत आइल सइयाँ दुअरिया गोरिया के नखरा जिया ललचावे हो। बनउवा रूप—–   घर अँगनइया में धप-धप अँजोरिया टटके सजल बाटे ललकी सेजरिया गजरा गुलाबी गोरी जिया बहकावे हो॥  बनउवा रूप—–   रूसियो के  फूलल नाहके कोहनाइल पजरा पहुँचि गोरी नियरा  ना आइल उपरल हिया में सूल जिया दहकावे हो॥ बनउवा रूप—–   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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