सिंगार

*[01]* पियवा जतन करे, मनवा मगन रहे, पग के नुपूर तब, झनके झनकि झनन। पिक करे कुकु कुकु,हिय करे हुकु हुकु, चमन निरेखि कली,अलि देखि सनकि मन।। *[02]* आँखि में कजरा डारि,केस में गजरा झारि, सोरहो सिंगार करि,चलतु धनि बनि ठनि। लंगहा लहार मारे, चुनरी ओहार करे, देखे लो ठहर जाये, बोलतु नहि तनि मनि।। *[03]* ओठ भोरवा के कोर तन शशि जस गोर, देखि ललचे चकोर,महके गमकि गमक। अति कोमल कोपल,मधु बोल अनमोल, घोरे मिसरी के घोल,चहके सहकि बहक।। *[04]* हिया हिलकोर मारे,मार बड़ी जोर मारे पूरा पोरे पोर…

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धन-कटनी

*[01]* खेतवा की आरी आरी,सुनरी सुग्घरि नारी, पीयरि पहिरी सारी,छमके छमकि छमक। हँसुआ से काटि धान,गावेली मधुर गान, कर के कंगन दूनो,खनके खनकि खनक।। *[02]* लामे लामे पारि धरे लामे पलिहारि धरे, गुर्ही करे बोझा बान्हे,धनिया चमकि चमक। पुरुआ बयार बहे,रूपगर नार लागे, गते से गुजर जाये,रहिया छनकि छनक।। *[03]* पिया खरिहानी करी,आँटी अरु बोझाबारी, सभके ही सोझाकरी,किनारी अंकवारि धरि। चानीझरी रानीझरी,नारी रतनारी झरी, हीरा पन्ना मोतीझरी, सोनाचूर बखारि भरि।। *[04]* चूरा चाउर बनेला,खीर जाउर चढ़ेला, जन गन मन सभ,जीयेलनि हुलसि कर। बहरी अंजोर करे, भीतरी बिभोर कर सभ मिली…

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बागी बलिया

गंगा सरयू टोंस के संगम जहवा होला भृगु क्षेत्र ह बलिया दादा लोग रहेले भोला जहां के भृगु बाबा सुनs विष्णु से लड़ गईले अंग्रेजन के गुरुर के डाउन मंगल कइले। ओह धरती में ऊर्जा बाटे मुर्दा भी मुस्काला चितु के गर्जन सुन के अंग्रेज कइले हल्ला   बागी बलिया ह ओकर अगस्त क्रांति के अगुआ आज़ादी के खातिर ओइजा मुअले बहुते बबुआ हिंदी के हस्ताक्षर भइले हज़ारी प्रसाद द्विवेदी केकर अइसन हिम्मत होइ के लक्ष्य के भेदी परशुराम चतुर्वेदी के संत परंपरा भइल जहवा जारी जे भी आपन जोर…

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हमार गांव

हमार गांव ना अइसन तइसन सगरो गांव से भारी बा खेती बारी दूर भइल ना खुरपा बा ना कुदारी बा   खेती में खूब काम भइल उ मेहनत ना जारी बा हरीश रकेश मौज में बारे मुंह मे सब दिन गारी बा   बाबा के खीस पर डर समाइल अंजुवो मन पर भारी बा कइसे कहीं बात ओहदिन के अंजुवो ले निकझारी बा   गांव गांव ह ऊपर नीचे केकरा काम के के खींचे सवसेे अब त भइले बबुआ खेती लागत बेमारी बा खाँची खचोली लउकत नइखे गोबर गोइठा कतहु…

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गोबर के महादे’

बड़ी रे रकटना से गढ़ल महादे’ गोईं, बइठे देवल चढ़ि धइके गहिर ध्यान। पान-फूल अछतो प पलक न खोले बौरा, आरजू मिन्नत कइ जियरा बा हलकान। अपने गरज लागे छोड़ेले न पैंयाँ दैया, हमरी गरज पर नाधि देले चउगान। साँसति में लागे भोला, फँफरा में बड़बोला- “चल री बछेरी मोरी काँटे-कुशे धाने-धान।” दिनेश पाण्डेय, पटना।

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बुढौती के दर्द

बुढौती के दुख दर्द कहले मे का बा। येंहर बाटे खाई आ ओंहर कुआं बा। अइसन पतोहियन से पाला पड़ल बा कि भरपेट खइलहू के लाला पड़ल बा। हमन के कोठरिया करे के सफाई कहीं कुड़ा बा कहीं जाला पड़ल बा। बेटवा बहुरिया कूलर मे बा सूऽतल आपन ओसरवे खटाला पड़ल बा। बोल कुछ त बोले बा बुढवा सठिआइल न बोलऽ त कहीहं मुहें ताला पड़ल बा। दस रूपया बबुआ से मांगऽब त बोलीहं कमाई ना बाटे निठाला पड़ल बा। जगदीश खेतान

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गवन राग

मनबेदिल ह साँझ, हवा ठिठकल अस, गाछि-बिरीछ उतान, ऊपरे कुहर भरल। हिरना हिय हारल, भयगर रन-बन, राह-बाट अनजान, आसते तम उतरल। कौने खोह-खलेटी में, दरिया दलदल में, पता न कौनि मुड़ान, विघाती बयर परल। बस ले दे कुछ सेस, रात अनजानी संगी, फिर फजिरे मुलुकान, गवन के राग तिरल। दिनेश पाण्डेय, पटना।

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बेगर बात के बात

चरर मरर बोलत हौ चचरा सून अन्हरिया रात। देखS फान के बइठल हउवन बेगर बात के बात।   घाट-घाट के पानी पियलन कबहुँ नाही चैन से जियलन ऊसर भइल समझ के बखरी भोरहीं से बउरात।   बुझलें बस अपने के अउवल घरी घरी बस पाँव पुजउवल फरिआइल ना एकौ रगरा जिनगी से अंउजात।   बइठ बेवाई सेंकत बाड़न तबौ बकैती फेंकत बाड़न कहरि-कहरि के कटिहें जिनगी आफत संग सउनात।   अँगने बिसुरत लइकी-लइका सपन भइल थरिया के खइका दुअरे भिनकत माछी हरदम पहुना घरे घहरात।   कुचकुचवा ला खोंढर बाटे…

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बड़ा-बड़ा फेरा बा

बड़ा-बड़ा फेरा बा भारी झमेला बा तिलक त लेबे के मन नइखे समधी जी दहेज के पेंच लगावे के सरधा एकदम नइखे समधी जी बाकी हई ……. नाच ह बाजा ह खजुली ह खाजा ह साज ह समैना ह बीजे ह बैना ह गांव ह जवार ह गोतिया देयाद ह हीत ह हीतारथ ह सभके सवारथ ह हरिस ह कलसा ह गउरी गनेसा ह पुजा ह पतरा ह देवतन के असरा ह गहना ह गुरिया ह पवनी पनहरिया ह सूट ह साड़ी ह डोली ह गाड़ी ह कोकड़वर ह बुकवा…

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हिन्दी कै

सुर-ताल आ चाल बदल के ठाँव बतावें हिन्दी कै॥ सत्तर सांतर बत्तीस बेंवत भाव बतावें हिन्दी कै ॥   जे जे जान लगवलस एहमे सभके मान जगवलस एहमे ओकरै छाती दाल दरै के दाँव बतावें हिन्दी कै ॥   सबके माल मलाई आपन मीटिंग सिटिंग संगे ज्ञापन लोक राग भाषा बोली कै नाँव बतावें हिन्दी कै ॥   बूढ़-पुरनियन के करनी पर चाटन-बाटन सब चरनी पर भूसा संगे खरी सउन के गाँव बतावें हिन्दी कै ॥   पीयत घीव ओढ़िके चदरी बेमौसम हौ फाटल बदरी बनिहें भाफ करम कै पानी…

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