काक नीति

आग लगवले काग के, उड़लन करत कुहाच। गफलत में बरगद तरे, नाचल कवन पिशाच? उरुआ बैरी बड़ जबर, लिहलन काग पनाह। कपट संधि के चाल से, रचलन अगियाडाह। साजिश करि कउवन रखल, खोता में अवशेष। मुफुते में मारल गइल, बूढ़ गीध दरवेश। मिलत बजीफा काक के, कउड़ी अँतरी हाड़। मौसम के बदलाव से, जिनिगी भइल उजाड़। पलखत पाइ अलोत में, खेले खेल अनीठ। सोझा में बाना धरे, बड़ मरजाद-बसीठ। एहि अलँग सब रोशनी, ओने सभ अन्हियार। मूरख काना काग के हद जरिबद्ध बिचार। स्वारथ साधन तब तलक ढोरन के पुठवार।…

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हम कवि ना बानी

मरि गइल बा आँखि के पानी तबो गावत बानी पंजरे सटिके राजाजानी।   हमरा खाति मंच बा ओसे बढ़िके पंच बा गोल बा गोलबंदी बा बाँचि रहल लोग बा हमरे कहानी।   सरकारियों अलम बा दोसरे के कलम बा सगरों हमरे पूछ बा नीमनका छूंछ बा जारत लोग सरमे आपन ज़िंदगानी।   हम सरब गुन आगर छांछत जवानी के सागर एही से ऊ हमरा के मानेलें खटियो पर अपने जानेलें सभेके पियाइले पानी।   हर बेरी हमरे बोलावेले निगचे जाँति बइठावेलें चिक्कन बनिके घूमिले पूछीं मति का का चूमिले कविता…

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भोजपुरी के पानी

बजड़ा से बचपन उपजाईं, जौ से जोश जवानी। माँटी से माँटी के कविता, भोजपुरी के पानी। हम्मर नइखे कवनो सानी, रउरा मानीं भा ना मानीं। गेहूँ के गदराइल बाली गावे गीत गुमान के। सरसो के बुकवा लागल तन तूरे कठिन पखान के। धान धँउस ना सहलसि, दिहलसि कबहूँ कवनो भाँति के, रहर रहनिरखवार ठाढ़ करि ऊँचा पगड़ी शान से। मकई माथे टीका कइलसि छाती भइल उतानी। मटर टरे ना देत बचन के कबहूँ कवनो काल में। चन्नन माथे चमचम चमके चना बेंचि हर साल में। गावे गीत गरब से गोंएड़…

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भोजपुरिया

रउरा लिखनीं बेद हो गइल, हम जो लिखीं कहानी ह? साँच- साँच बस रउरा कहनीं, हम जो कहीं जुबानी ह? आ जाईं एकरोज अखाड़ा हम बस अतने जानीले, बतला देइबि कतना दम बा, का भोजपुरिया पानी ह? पीपर, बरगद, पाकड़, महुआ, जामुन, गुल्लर आम के। राउर मरजी कहि लीं कुछुवो, पूजीं सुबहो शाम के। तनगरमी से जाड़ लजाला, माथे राखीं घाम के। बादर आ के करे चिरउरी, जल ढारे बिन दाम के। सूरूज चंदा पहरा देलें, नाता ई खनदानी ह। मड़ुआ, टांगुन, साँवा, साईं, बजड़ा, जौ उपजाइ के मठ्ठा, रोटी,…

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मोरी के कीड़ा

बुझल आग के लपट, राखो में आट होला । चलल बेखबर बात में, ओह मे कुछ खास होला। पुरा जगती परानी के , भीतरो जजबात होला। सब कीड़ा, एक जइसन ना, बाकिर मोरी के, कुछ खास होला। सामने धमकावे उ मुदई ना, लेकिन आपने मे आन होला। केहु हमदरदी देखाके संत बनेला, त केहु आपन घरही में शैतान होला। मत डेराई आपन दुश्मन से, रउआ लगे रातो-दिन बइठल, संघतिये छिपल डंकदार होला। का करेम जमाना सोवारथी बा”साधुजी”, कलयुग के सारथिये लंकदार होला।   शैलेन्द्र कुमार साधु पं०महेन्द्र मिश्र के मिश्रवलिया…

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माई

माई माई हम पुकरेनी कतहूं माई ना हमार हमनी के छोर के कहा गइलू हो तोहरा बिन सुना बा संसार एक ही बार लौट के तू आ जाइतू हो तोहसे कई लेती प्यार जब तुहू धरती पे रहालू हो धरती स्वर्ग समान अब तुहु कहवा चल गइलू हो मनवा भईल बा बेहाल कहे के सब केहू आपन हो तोहरा बिन केहू ना हमार शरीर हमार जान तोहार रहे हो तोहरा बिन ईहो भईल बेजान माई माई हम पुकारेनी हो कतहूं माई ना हमार दिनवा त कसहू कट जाला हो रतिया…

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दहेज़

माई-बाप तो चाहे करी धूम-धाम से बेटी बिदाई, बाकी गरीब रहे बाप तो ई ‘दहेज़’ कहवाँ से दियाई। रिवाज ई कईसन बनाइले बा हमनीके समाज हो, कर देहलस बरबाद बेटियन के ई कुप्रथा ‘दहेज’ के हो। गुण-अवगुण नाहीं रुपया से नापल-जोखल जाला, देखी सभे बिना ‘दहेज़’ के बरियात दुआर पर से लौटल जाला। समाज के ई बंधन बियाह काहे जरूरी बा…? बेटी पढ़ल-लिखल त ‘दहेज़’ काहे जरूरी बा…? जउन गरीब बिदाई में बेटी के एगो साड़ी ना दे सकेला, दिही कहवाँ से ‘दहेज़’ जे दुई वक़्त के रोटी ना जुटा सकेला।…

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भोजपुरिया

रउरा लिखनीं बेद हो गइल, हम जो लिखीं कहानी ह? साँच- साँच बस रउरा कहनीं, हम जो कहीं जुबानी ह? आ जाईं एकरोज अखाड़ा हम बस अतने जानीले, बतला देइबि कतना दम बा, का भोजपुरिया पानी ह? पीपर, बरगद, पाकड़, महुआ, जामुन, गुल्लर आम के। राउर मरजी कहि लीं कुछुवो, पूजीं सुबहो शाम के। तनगरमी से जाड़ लजाला, माथे राखीं घाम के। बादर आ के करे चिरउरी, जल ढारे बिन दाम के। सूरूज चंदा पहरा देलें, नाता ई खनदानी ह। मड़ुआ, टांगुन, साँवा, साईं, बजड़ा, जौ उपजाइ के मठ्ठा, रोटी,…

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सिंगार

*[01]* पियवा जतन करे, मनवा मगन रहे, पग के नुपूर तब, झनके झनकि झनन। पिक करे कुकु कुकु,हिय करे हुकु हुकु, चमन निरेखि कली,अलि देखि सनकि मन।। *[02]* आँखि में कजरा डारि,केस में गजरा झारि, सोरहो सिंगार करि,चलतु धनि बनि ठनि। लंगहा लहार मारे, चुनरी ओहार करे, देखे लो ठहर जाये, बोलतु नहि तनि मनि।। *[03]* ओठ भोरवा के कोर तन शशि जस गोर, देखि ललचे चकोर,महके गमकि गमक। अति कोमल कोपल,मधु बोल अनमोल, घोरे मिसरी के घोल,चहके सहकि बहक।। *[04]* हिया हिलकोर मारे,मार बड़ी जोर मारे पूरा पोरे पोर…

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धन-कटनी

*[01]* खेतवा की आरी आरी,सुनरी सुग्घरि नारी, पीयरि पहिरी सारी,छमके छमकि छमक। हँसुआ से काटि धान,गावेली मधुर गान, कर के कंगन दूनो,खनके खनकि खनक।। *[02]* लामे लामे पारि धरे लामे पलिहारि धरे, गुर्ही करे बोझा बान्हे,धनिया चमकि चमक। पुरुआ बयार बहे,रूपगर नार लागे, गते से गुजर जाये,रहिया छनकि छनक।। *[03]* पिया खरिहानी करी,आँटी अरु बोझाबारी, सभके ही सोझाकरी,किनारी अंकवारि धरि। चानीझरी रानीझरी,नारी रतनारी झरी, हीरा पन्ना मोतीझरी, सोनाचूर बखारि भरि।। *[04]* चूरा चाउर बनेला,खीर जाउर चढ़ेला, जन गन मन सभ,जीयेलनि हुलसि कर। बहरी अंजोर करे, भीतरी बिभोर कर सभ मिली…

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