दिल

आदमी के दिल दरिया ह,सागर ह, हर चीज से बडा़ ह । चीकन ह मक्खन जइसन, मोम जइसे पिघल जाला, बाकिर, हीरा से भी कड़ा ह । . तड़पेला तकलीफ देखि ,दोसरा के, मौका पर ,जान भी,दे देला । उहे दिल,आतना,निष्ठुर ह,निर्दयी ह कि, बिना हिचक के,जान भी, ले लेला । । स्थिर ह आताना कि,, कवनो झंझावात तूफां से भी ना हिले । सरल ह,ढलान देखि बहि जाला , कठोर ह कि, मिलियो के भी ना मिले ।। सहि लेला आधात,बोझ दोसरा के, अपना माथा पर रखि लेला ।…

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साधो, अब न रहब यहि गाँव

हियाँ उमर भरि रोध हजारन, पग-पग कूकरहाँव। गोबर गउआँ बात न बूझसि चमगीदर मग धावसि, उरझि-पुरझि मरि जासि बावरा अंतभेद नहिं पावसि। निपट फरेबी सियरन के सुर छेद रहल गहिराँव। सिधवा के तिल-तिल मउअति बा, टेढ़िया फरे फुलाय, थोपल जाय तबेला माथे, बानर केरि बलाय, न्याव टकौरी दोल्हा खेले, उल्टे-सीधे दाँव। जटहा बरगद पात चोरावल, तरकुल मन अगराइल, बन-बबूर करइल गाछी के, रूखर तन गदराइल। अमराई में कउआ कुल के मचल गदर गुहराँव। कोइलि का गइहें मनसाइन? करुई बोलि बढन्ती, कहवाँ फूल कटेरी चम्पा, फफसत जाय बिजन्ती। धुन-सुबास-दृग-तिसना मूअल, मरघट…

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गजल

मौसमी प्रीत में अबके भरम आइल बा। राज रूप के जंगलन में भुलाइल बा।। संगे-संग पतझड़ का अगुआन बनके । बगियन में फूलन के बहार आइल बा।। जाने कइसे एक-दोसर के धरम बाँची। गवें से गांव में फेरू फाग आइल बा।। ऊ ना आपन मन के बात कहस कबहूँ। हमार जबान त जज्बात से सिआइल बा।। आँख से उनका आइल सनेस नेह के। होठ बाकिर इनकार में फड़फड़ाइल बा।। जिनगी इनकर-उनकर राह का ताकी। नजर में फरेब का दुनिया समाइल बा।। उनका हर पिआस के हल बा ‘कौशलʼ। दरद जिनका…

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पौधा

कब अब बिहान होई, खुशी में परान होई। जउन पौधा लागल बा, सहिओ जवान होई।। के पानी दी ,के खाद दी, के वहके वरदान दी। चार दिन जियते, फिर उहे उजाड़ होई ।। लगाव त लगाव पेड़, घरे अउर दलान में। जहां रहे सबकर नजर, होश और ख्याल में ।। पानी दिह, खाद दिह, गोरुओ न चर पाए । जउन लागल बा आज , काल्हिहो तक बढ़ पाए ।। बाप-दादा के लगावल पेड़, कुल हम काट देहली। लइकन के लगावल पौधा, उनहू के छांट देहली।। गलती के सुधार द, सांस…

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काक नीति

आग लगवले काग के, उड़लन करत कुहाच। गफलत में बरगद तरे, नाचल कवन पिशाच? उरुआ बैरी बड़ जबर, लिहलन काग पनाह। कपट संधि के चाल से, रचलन अगियाडाह। साजिश करि कउवन रखल, खोता में अवशेष। मुफुते में मारल गइल, बूढ़ गीध दरवेश। मिलत बजीफा काक के, कउड़ी अँतरी हाड़। मौसम के बदलाव से, जिनिगी भइल उजाड़। पलखत पाइ अलोत में, खेले खेल अनीठ। सोझा में बाना धरे, बड़ मरजाद-बसीठ। एहि अलँग सब रोशनी, ओने सभ अन्हियार। मूरख काना काग के हद जरिबद्ध बिचार। स्वारथ साधन तब तलक ढोरन के पुठवार।…

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भोजपुरी के पानी

बजड़ा से बचपन उपजाईं, जौ से जोश जवानी। माँटी से माँटी के कविता, भोजपुरी के पानी। हम्मर नइखे कवनो सानी, रउरा मानीं भा ना मानीं। गेहूँ के गदराइल बाली गावे गीत गुमान के। सरसो के बुकवा लागल तन तूरे कठिन पखान के। धान धँउस ना सहलसि, दिहलसि कबहूँ कवनो भाँति के, रहर रहनिरखवार ठाढ़ करि ऊँचा पगड़ी शान से। मकई माथे टीका कइलसि छाती भइल उतानी। मटर टरे ना देत बचन के कबहूँ कवनो काल में। चन्नन माथे चमचम चमके चना बेंचि हर साल में। गावे गीत गरब से गोंएड़…

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भोजपुरिया

रउरा लिखनीं बेद हो गइल, हम जो लिखीं कहानी ह? साँच- साँच बस रउरा कहनीं, हम जो कहीं जुबानी ह? आ जाईं एकरोज अखाड़ा हम बस अतने जानीले, बतला देइबि कतना दम बा, का भोजपुरिया पानी ह? पीपर, बरगद, पाकड़, महुआ, जामुन, गुल्लर आम के। राउर मरजी कहि लीं कुछुवो, पूजीं सुबहो शाम के। तनगरमी से जाड़ लजाला, माथे राखीं घाम के। बादर आ के करे चिरउरी, जल ढारे बिन दाम के। सूरूज चंदा पहरा देलें, नाता ई खनदानी ह। मड़ुआ, टांगुन, साँवा, साईं, बजड़ा, जौ उपजाइ के मठ्ठा, रोटी,…

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मोरी के कीड़ा

बुझल आग के लपट, राखो में आट होला । चलल बेखबर बात में, ओह मे कुछ खास होला। पुरा जगती परानी के , भीतरो जजबात होला। सब कीड़ा, एक जइसन ना, बाकिर मोरी के, कुछ खास होला। सामने धमकावे उ मुदई ना, लेकिन आपने मे आन होला। केहु हमदरदी देखाके संत बनेला, त केहु आपन घरही में शैतान होला। मत डेराई आपन दुश्मन से, रउआ लगे रातो-दिन बइठल, संघतिये छिपल डंकदार होला। का करेम जमाना सोवारथी बा”साधुजी”, कलयुग के सारथिये लंकदार होला।   शैलेन्द्र कुमार साधु पं०महेन्द्र मिश्र के मिश्रवलिया…

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माई

माई माई हम पुकरेनी कतहूं माई ना हमार हमनी के छोर के कहा गइलू हो तोहरा बिन सुना बा संसार एक ही बार लौट के तू आ जाइतू हो तोहसे कई लेती प्यार जब तुहू धरती पे रहालू हो धरती स्वर्ग समान अब तुहु कहवा चल गइलू हो मनवा भईल बा बेहाल कहे के सब केहू आपन हो तोहरा बिन केहू ना हमार शरीर हमार जान तोहार रहे हो तोहरा बिन ईहो भईल बेजान माई माई हम पुकारेनी हो कतहूं माई ना हमार दिनवा त कसहू कट जाला हो रतिया…

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दहेज़

माई-बाप तो चाहे करी धूम-धाम से बेटी बिदाई, बाकी गरीब रहे बाप तो ई ‘दहेज़’ कहवाँ से दियाई। रिवाज ई कईसन बनाइले बा हमनीके समाज हो, कर देहलस बरबाद बेटियन के ई कुप्रथा ‘दहेज’ के हो। गुण-अवगुण नाहीं रुपया से नापल-जोखल जाला, देखी सभे बिना ‘दहेज़’ के बरियात दुआर पर से लौटल जाला। समाज के ई बंधन बियाह काहे जरूरी बा…? बेटी पढ़ल-लिखल त ‘दहेज़’ काहे जरूरी बा…? जउन गरीब बिदाई में बेटी के एगो साड़ी ना दे सकेला, दिही कहवाँ से ‘दहेज़’ जे दुई वक़्त के रोटी ना जुटा सकेला।…

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