अइसन गारी के गारी जनि जानी के बहाने लोक के बतकही

भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास से सभे सुपरिचित बाटे। भोजपुरिया लोक के विशिष्ट पहिचानो बाटे। कहल जाला कि  विविधता जहां के पहिचान आ परिभाषा होखे,अइसन लोक के बाति बरबस मन के मोह लेवेले। लोक जवन अपने संगे अपने संस्कृति के संवारत आ संइहारत आगु बढ़ेला। ओकर बढ़न्ति ओकरे जीवंतता के पहिचान होले।ओह पहिचान के जोगावे क श्रमसाध्य काम भोजपुरिया समाज के मेहरारू लोगन के कान्ही दर कान्ही चलत चलल आ रहल बा। अपने सुघरई आ मिठास के जोगवले सनकिरवा लेखा जुगजुगा रहल बा। भोजपुरिया समाज के समुझे आ जाने खातिर ओकरे लोकगीतन के जानल आ समुझल जरूरी बाटे। भोजपुरिया समाज में अलग-अलग अवसर पर अलग-अलग गीत गावल जानी सन। भोजपुरिया समाज में कई गो अइसन अवसर आवेला जब गारी ‘मंगल गारी’ बनि जाले, सत्कार के एगो बरियार सुभाव हो जाले। लोग गारी न सुनला के अपमान बुझेला मने गारी सुने के जोहेला आ सुनला का बाद ओकरा सनमानों करेला। गारी गवउवा नेगो देला। गारी दीहल, गारी बकल आ गारी गवला के मरम के बहुते विस्तार से लेखक समुझवले बाड़ें। भोजपुरी संस्कृति में भोजपुरिया समाज अपने समधी के ऊंच पीढ़ा देला। उनुका से अंगेया लेके उत्सव के शुरुवात कइल जाला। अपना तन, मन आ धन के परेम से समरपित करत भोजपुरिया समाज अपने समधी के भोजन करावे के बेरा जेवनार गीत से उनुका सोवागत करेला। अइसन बहुते तथ्यन के उकेरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के एगो वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शंकर मुनि राय जी जिनगी के एह अनुभव के बहुते मनोयोग से ‘भोजपुरी के संस्कार गीत – अइसन गारी के गारी जनि जानी’ में  परोसे के परयास कइले बाड़न।

‘भोजपुरी के संस्कार गीत – अइसन गारी के गारी जनि जानी’ के लेखक डॉ शंकर मुनि राय जी अपना एगो आलेख के एह किताबि के आमुख बनवले बानी। एह आलेख में उहाँ के भोजपुरी गारी के रूप आ ओकरे महातिम के मनगर ढंग से परोसले बानी।कवना बेरा आ कवना घरी गारी गावल जाले ओकरा के नीमन से निरूपित कइले बानी। अलग-अलग बेरा में गावे जाए वाली गारी गीतन के अलग अलग नांव से जानल जाला । एह किताबि में भोजपुरिया समाज में प्रचलित तीन तरह(सोवागत गारी, जेवनार आ हटका)  के कुछ बहुत प्रचलित गीतन संकलित कइल गइल बा। एह गीतन के अर्थ के संगे विश्लेषितो कइल गइल बा।अजुवो भोजपुरिया क्षेत्र में थोड़-ढेर फेर बदल का संगे ई कुल्हि गीत चलन में बाड़ी सन।

बैदिक ग्रंथन में 16 संस्कार के बात कहल गइल बा। भोजपुरी लोक में एह कुल्हि संस्कारन खातिर अलग-अलग गीत-गवनई के विधान बा । ढेर संस्कार एह घरी बिला चुकल बाड़न सन । तबो अबहियों कुछ संस्कारन के लोग छाव का संगे मनवेला। हिन्दू समाज संस्कारन में बन्हाइल बाटे आ एहमें ओके सुखो मिलेला। भोजपुरी भाषा में जवन लोकगीत मिलेलीं, ओहमें संस्कार गीतन के बहुलता बा। संस्कार गीतन में स्त्री समाज के हाव-भाव, बिरह-हुलास आ मनोभाव के सगरे चित्र भेंटा जाला। एह किताबि में गारी गीतन का संगे संस्कार गीतनो के संकलन कइल गइल बा। जवन देवी गीत से शुरू होके जनमोत्सव के गीत (सोहर, खेलवना), मुंडन आ जनेव के गीत का संगे , बेटा आ बेटी बियाह के गीत आ कनिया देखाई के गीतो एह संकलन में बाड़ी सन। किताबि के अंतिम अध्याय में भोजपुरी कहाउतनो के संकलन अर्थ का संगे कइल गइल बाटे। एह किताबि के सभेले खास विशेषता ई बाटे कि गीतन में आइल कठिन शबदन के अर्थ का संगही गीतन के भवार्थों दीहल गइल बा। किताबि के भाषा हिन्दी बा, जवना के उद्देश्य अपना भाषा के संगही हिन्दी भाषा भासियनो के भोजपुरिया संस्कार आ संस्कृति से परिचित करावे के भाव लेखक के मन में रहल होखी। अपने एह भाव के लेखक अपने आमुख में दीहलो बाड़न।

सभेले सुखद बाति लेखक डॉ शंकर मुनि राय अपना एह किताबि के अपना जीवन संगिनी के समर्पित कइले बानी आ ओकर कारनो बतवले बानी।भोजपुरिया समाज के आधी आबादी जे पीढ़ी दर पीढ़ी एह संस्कार गीतन जोगवले आ रहल बा, ओह खातिर ओह समाज के प्रतिनिधि के एह किताबि के समरपन मन के हुलसित करे वाला बा। भोजपुरी के शबदन के अर्थ नवहा पढ़निहार लोगन के समुझे में ढेर मदत करी, अइसन हमरो बिसवास बा।

144 पेज के एह किताबि में पाँच गो अध्याय बाटे। पहिलका अध्याय किताबि के माथेला पर केन्द्रित बाटे। जवना के प्रकाशन सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली से भइल बा। सर्वभाषा प्रकाशन अपने गुणवत्ता के खातिर दिनो-दिन एगो नामचीन प्रकाशन बनल जा रहल बा। एहु किताबि का संगे प्रकाशन भरपूर न्याय कइले बा। अइसन कुल्हि किताबि माई भाषा भोजपुरी के भंडार भर रहल बाड़ी सन। डॉ शंकर मुनि राय जी के श्रम सराहे जोग बाटे। ई कृति पढ़निहार लोगन के मन के त भइबे करी संगही कई गो भ्रमों के दूर करे में सहजोगी बनी । एह अनुपम कृति ला लेखक के अनघा बधाई आ ढेर ढेर शुभकामना!

 

पुस्तक भोजपुरी संस्कार गीत – अइसन गारी के गारी जनि जानी

लेखक – डॉ शंकर मुनि राय

मूल्य- रु 250/- मात्र

प्रकाशन- सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

भोजपुरी साहित्य सरिता

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