बदल रहल सामाजिक मूल्यन के बीच बेकतीगत महत्वाकांक्षा खातिर संघर्ष के आईना:”जुगेसर”

‘जुगेसर’ जइसन कि उपन्यास के नाम बा,युग+ईश्वर =योगेश्वर के आम बोलचाल में भोजपुरी के सब्द के अर्थ स्पष्ट कर रहल बा यानी युगेश्वर ‘जुगेसर’ के रूप में भोजपुरी में स्वीकृत आ प्रयुक्त सब्द बा। ई कहे में हमरा इचको ना संकोच हो रहल बाटे कि उपन्यासकार श्री हरेंद्र कुमार ‘जुगेसर ‘सब्द के चुनाव कर के कहीं-न-कहीं समाज में आगे चलेवाला जुग प्रवर्तक के रूप में बदल रहल जनजीवन आउर सोच-विचार के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उदाहरण के रूप में धरातल पर ले आ के रखे के अक्षुण्ण प्रयास बा।एह नाम से उपन्यास के नायक, कथानक आउर परिदृश्य के प्रतीकात्मक झलक उपलब्ध करावल गइल बा।एह अर्थ में उपन्यासकार नामकरण सहित तत्कालीन समय में चल रहल आम जनजीवन के प्रभाव से भविष्य के सामाजिक रूपरेखा खींचे में एगो सीमा तक सफल सिद्ध हो रहल बाड़न।

जुगेसर भोजपुरिहा माटी में जनमल जिनगी के उर्वरक क्षमता से भरल मजबूत मस्तिष्क आ शरीर के साँच प्रतिनिधि के रूप में उभर के आइल बाड़न।आर्थिक चाहे सामाजिक रूप से बहुत लमहर चर्चित परिवार के प्रतिनिधि ना भइला का बादो आपन निम्न-मध्यवर्गीय उतजोग के क्षमता सहित संघर्ष करत छात्र-जीवन के पराकाष्ठा का ओर ले जायेवाला सिद्ध होत बाड़न। परिवार के सदस्य आ पास-पड़ोस के लोगन के परदेस के माटी में रह के आमदनी के साथे बढ़न्ती के प्रवृति से ई बात सहज लाग रहल बा कि जुगेसरो पढ़-लिख के कवनो ऊँच पद पर बइठ के बड़हन आदमी जइसन समाज में नाम रोशन करे के चाह राखत बाड़न।उनकर परिवार आ समाजो के इहे इच्छा रहे।उपन्यास के कथा में एह उपलब्धि खातिर प्रयास, ओकर सार्थकता आऊर सफलता में नया तरह के बुनावट सहित कथा-प्रवाह आकर्षक रूप से परोसल गइला से एगो नया तरह के संवेदना के स्वरूप उपलब्ध हो रहल बा जे सही मायना में उपन्यास में सफल चित्रण आऊर उद्देश्यपरकता पर सफलता के मोहर लगा रहल बा।

लरिकाईं से शिक्षा का प्रति समर्पित आ संघर्षशील रहल जुगेसर सेयान भइला पर पटना विश्वविद्यालय, पटना में उच्चतर शिक्षा खातिर पहुंच गइलन जहवाँ उनका ई जल्दिए समझ में आ गइल कि ज्ञान के साथे-साथे बाहरी पहुँचो एह जमाना के एगो बड़का निर्धारक तत्व बा।शिक्षा खातिर समरपन में ऊ आपन परिवार-समाज के दुःख-सुख,परब-तेवहार आ मेल-जोल सगरे भुला कर के आगे बढ़ रहल बाड़न।जुगेसर ओह माई-बाप के ईयाद तेयाग देत बाड़न जेह लोग आपन पूत के बरकत खातिर सुबह-साँझ उमेद पर जिनगी काट रहल बाड़न। एह क्रम में दुखद ई रहल कि जुगेसर मरे घरी आपन माई के दरसन ना करे पवलन आ हुनका पश्चाताप के सिवा कछुओ हासिल ना भइल।इहाँ ई सवाल आ सकत बा कि ओह जमाना में संचार आ यातायात के एतना समृद्ध साधन ना रहे।लेखको जुगेसर के मन में उठत कचोट के उभारे के प्रयास कर ताड़न बाकिर आधुनिकता चकाचौंध के असर आगे के संदर्भ में परिलक्षित भइल बा।आपन परिवार आ समाज से बिलगाव के बेवहार के उपन्यासकार एतहीं बीजारोपण दिखा रहल बाड़न। मन में केतना बेर माई-बाप से भेंट करे के इच्छा भइला के बादो आपन बेवसाय के प्रति समर्पण आ बेकतीगत उपलब्धि पर धेयान केन्द्रित करे प्रवृत्ति,जे आधुनिक शहरीकरण के मुख्य दोष के रूप में बा,इनका बेवहार में झलकत बा।जिनगी सफल करे के प्रयास में जुगेसर जब जन्म-भुईं से नेह-छोह छोड़ के पत्नी सहित एक पल में गाँव छोड़त बाड़न तब ई एगो बड़का समाजशास्त्रीय परिघटना के बेशक सीमित बरनन होखे बाकिर लेखकीय दृष्टिकोण से कमजोर निशाना नइखे।ई घटना के सामाजिक आ पारिवारिक संरचना के परिघटन सहित पारंपरिक जीवन के विघटन के रूप में लिहल जाए त उपन्यास के जोगदान कम नइखे आँकल जा सकत।

जवान मन के कालांतर में पढ़ाई आ डिग्री से फुर्सत भइला पर शारीरिक माँग के अनुरूप भटकाव के पटाक्षेप प्रेम-प्रसंग में परिवर्तित हो के शिक्षित समाज में अन्तर्जातीय प्रेम-विवाह के रूप परिघटन के एगो उदाहरण जुगेसरो बाड़न। इहाँ ई दीगर बात बा कि शिक्षा के फलस्वरूप रूढ़िगत बंधन से मुक्त होखे के परंपरा शुरू भइल जे वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में कमोबेश स्वीकृत रूप से चल रहल बा।ऊ कवनो परिवार जे आपन संतान के भारी दान-दहेज के साथे जातिगत बियाह

के परिकल्पना में डूबल रहल ऊ आपन खून में चारित्रिक गिरावट के लांछन के साथे प्रेम बियाह अस्वीकृत कर के आपन पारंपरिक प्रतिष्ठा के बचावे में लागल रहल। एह संदर्भ में एगो तुलनात्मक उदाहरणो आइल बा।जुगेसर का प्रेम बियाह के अस्वीकरन के खामियाजा भोगे के पड़ल जबकि भारी मात्रा में दान-दहेज के साथे आइल बहुरिया के साथे वरीय साथी प्रोफेसर के घुट-घुट के जिये के साथे शराब के आदि हो जाए के पड़ल। जुगेसर दहेज से बेहतर आपन शिक्षित साथी खुद चुन के बदलत समाज का ओर चलत बाड़न। इहाँ ई जरूर अखरता कि अपने मकान मालिक के बेटी ,जे इनकर शिष्या बाड़िन,से बियाह पूर्व शारीरिक संबंध हो जात बा।ई उत्तर-आधुनिकता के स्वाद दे रहल बा जेकर मंजूरी पश्चिम का सभ्यता में संभव लागत बा।वस्तुतः उपन्यास समकालीन समाज में आवत बदलाव आऊर भविष्य के ओर के दिशा के ऊभारे के एगो चित्रणो बा।

तेज-तर्रार आदमी अवसर के ढंग से उपयोग करेला।व्याख्याता के नोकरी खातिर जुगेसर आपन वरीय मित्र के प्रयोग कइलन आऊर अवसर अइला पर आपन पत्नी पूजा के उच्च विद्यालय में शिक्षिका बनावे खातिर पद आ पैरवी के अनुचित लाभ ले के आगे बढ़त बाड़न। अवसर के लाभ खातिर मनई के पतन के एगो उदाहरण जुगेसरो बन के आवत बाड़न।राजनीति के शिक्षा के साथ कुव्यवस्था के गठजोड़ के खेल पर दृश्य उभारत लेखक देह-दर्शना स्त्री के मेल से संगीत नृत्य के कार्यक्रम के माध्यम से व्याप्त चारित्रिक दोष के उभारे के प्रयास कइल गइल बा।एह क्रम में लेखक के बांग्ला भाखा के ज्ञान के परिचय मिल रहल बा।

एह सबके अलावे माई के देहावसान,ससूर के बियाह से पहिले मृत्यु के बाद सास के पीड़ित जिनगी में सहयोग, आदि दुखमय जिनगी में परीक्षा दे रहल जुगेसर आगे बढ़त त बाड़न बाकिर आपन पिता के घर वापसी के इंतजार के शायद उनका पर असर ना रहल। एह कठिन जिम्मेवारी के निबाह में उनकर आपन स्वास्थ्य साथ ना दिहलक आऊर कमे उमिर में चल बसला पर उनकर पत्नी आपन माई आ ससूर सहित परिवार के प्रति फर्ज के बागडोर संभाल लेत बाड़िन ।भारतीय समाज में नारी का समय के साथे जूझे के एगो आपन आंतरिक क्षमता बा जेकर परिचय ऊ दे रहल बाड़िन।जे पतोहू जवानी के आपन दिनन में ससूर सेवा से विलग बाड़िन ऊ समय अवते सारा विपत्ति झेल के जिए के ससूर के साथ ले के जिए के शुरूआत करत बाड़िन।इहाँ भारतीय परंपरागत परिवार के सौहार्द्र के गुण आ आवश्यकता नजर आवत बा।

अब एगो सवाल इहो बा कि जुगेसर के जिनगी केतना सफल चाहे असफल रहल?भोजपुरिहा समाज में विश्व-स्तर के नागरिक बन जाये वाला भोजपुरियनो पर ई सवाल उठत बा कि बेकतीगत जिनगी में केहू केतनो सफल हो जाए बाकिर ऊ आपन जन्म-भुईं के समाज, परिवार आ परिवेश में का जोगदान दे रहल बाड़न चर्चा अनुकरणीय चाहे आदर्श होखे?एह उपन्यास के माध्यम से लेखक परंपरागत जीवन आ आधुनिक जीवन के बीच समरसता,सौहार्द्र आऊर बिकासवादी कार्य के समीक्षा करे के प्रवृत्ति के साथे कई तरह के सवाल उठा रहल बाड़न आ नवका जमाना के जुगेसर के तलाश पर जोर दे रहल बाड़न।

उपन्यास के भाखा सहज,सरल आ स्पष्ट भइला के साथे कम सब्दन के प्रयोग का माध्यम से सम्पूर्ण कथानक उपस्थापित कर रहल बा।एह उपन्यास में प्रकृति-चित्रण, संवाद आ सिंगारपरक दृश्यन के अभाव खटकत बा बाकिर जुगेसर के ज्ञान के माध्यम से शिक्षण कार्य में रसायन शास्त्रीय पदावली के उपयोग से ई बात सामने आवत बा कि उपन्यास के भाखा आ वर्ण्य-विन्दु में पश्चिम के लेखन कला के झलक भी बा।कभी-कभार इहो लागत बा कि लेखक के बेकतीगत जिनगी आ अनभूति के गहन असर उभर के आ रहल बा।एह सबके अलावे कथा-प्रवाह के साथे सब्द संयोजन लेखक के समृद्ध कथावाचक होखे के परिचय देत बा जेकरा चलते हर पाठक एक साँस में पूरा उपन्यास के पढ़ के दम लेवे के चाही। निश्चित तौर पर एह दुखांत पटकथा में एक के बाद एक दृश्यन के समायोजन सफल आ सशक्त बा।उपन्यास के अंत में प्रेमचंद के ‘गोदान’में जइसे समय आऊर समाज से जूझत धनिया आपन पति होरी के मरे घरी’गोदान’ के सपना येन-केन-प्रकारेण पूरा करके समाज के बीच अकूत शक्ति से भरल भारतीय नारी-पात्र होखे के परिचय देत बाड़िन ओसहीं जुगेसर के पत्नी आधुनिक सामाजिक परिवेश में आपन दम पर परिवार के समाज के बीच सम्हार के आगे बढ़े के संबल दिखावत बाड़िन। एगो संघर्षरत स्तंभ के रूप में परंपरा आ आधुनिक परिचलन के आपन एके अंचरा में समेट के चले के ताकत आऊर बुद्धि के परिचय देवे के प्रयास कर रहल बाड़िन।

अंत में,हम डा॰केदार नाथ सिंह से सहमती व्यक्त कर रहल बानी कि “एह उपन्यास में पाठक के संवेदना जगावे आ झकझोरे के ताकत बा।अंतर्जातीय बियाह  से ले के शिक्षा आ राजनीति के क्षेत्र के संकट एह उपन्यास में देखल जा सकत बा।”लेखक श्री हरेंद्र कुमार आपन औपन्यासिक कृति ‘जुगेसर ‘से भोजपुरी के न खाली समृद्ध कर रहल बाड़न बलुक भोजपुरी के लेखक, पाठक आ समाज के कलम के माध्यम से मार्गदर्शन दे रहल बाड़न। एह खातिर उनका के बारंबार बधाई सहित उनकर नवका कृति के इन्तजार बा।

 

-@ कौशल मुहब्बतपुरी

ग्राम-मुहब्बतपुर,

भाया-देवरिया कोठी ,

जिला-मुजफ्फरपुर, बिहार

पिनकोड-843120

चलभाष-9934918535

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