पौधा

कब अब बिहान होई, खुशी में परान होई। जउन पौधा लागल बा, सहिओ जवान होई।। के पानी दी ,के खाद दी, के वहके वरदान दी। चार दिन जियते, फिर उहे उजाड़ होई ।। लगाव त लगाव पेड़, घरे अउर दलान में। जहां रहे सबकर नजर, होश और ख्याल में ।। पानी दिह, खाद दिह, गोरुओ न चर पाए । जउन लागल बा आज , काल्हिहो तक बढ़ पाए ।। बाप-दादा के लगावल पेड़, कुल हम काट देहली। लइकन के लगावल पौधा, उनहू के छांट देहली।। गलती के सुधार द, सांस…

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दामोदराचारी मिश्रा जी के 4 गो अनूदित कविता

एमाण्डा लवलेस अमरीकी महिला कवयित्री हई। इनकरा गुडरिड्स पोएट ऑफ द ईयर खातिर नामित कईल गईल रहे। ईहाँ के वूमेन आर सम काइंड ऑफ मैजिक सीरीज के लेखिका हइ। एमाण्डा के कुछ कविता के भोजपुरी अनुवाद उपलब्ध बा। मूल कविता के हिंदी में अनुवाद राजेश  चन्द्र के बाटे। श्री राजेश चन्द्र के हिंदी अनुवाद से एकरा के भोजपुरी में कईल बा मार द ओह दानवन के ——————- होशियार रहिहs ओह लइकन से जवन बोलेलs सन हमेशा आधा साँच काहे से कि ओकनी के हमेशा रहिहs सन प्यार में आधा तहरा…

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गोबर के महादे’

बड़ी रे रकटना से गढ़ल महादे’ गोईं, बइठे देवल चढ़ि धइके गहिर ध्यान। पान-फूल अछतो प पलक न खोले बौरा, आरजू मिन्नत कइ जियरा बा हलकान। अपने गरज लागे छोड़ेले न पैंयाँ दैया, हमरी गरज पर नाधि देले चउगान। साँसति में लागे भोला, फँफरा में बड़बोला- “चल री बछेरी मोरी काँटे-कुशे धाने-धान।” दिनेश पाण्डेय, पटना।

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बड़ा-बड़ा फेरा बा

बड़ा-बड़ा फेरा बा भारी झमेला बा तिलक त लेबे के मन नइखे समधी जी दहेज के पेंच लगावे के सरधा एकदम नइखे समधी जी बाकी हई ……. नाच ह बाजा ह खजुली ह खाजा ह साज ह समैना ह बीजे ह बैना ह गांव ह जवार ह गोतिया देयाद ह हीत ह हीतारथ ह सभके सवारथ ह हरिस ह कलसा ह गउरी गनेसा ह पुजा ह पतरा ह देवतन के असरा ह गहना ह गुरिया ह पवनी पनहरिया ह सूट ह साड़ी ह डोली ह गाड़ी ह कोकड़वर ह बुकवा…

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हिन्दी कै

सुर-ताल आ चाल बदल के ठाँव बतावें हिन्दी कै॥ सत्तर सांतर बत्तीस बेंवत भाव बतावें हिन्दी कै ॥   जे जे जान लगवलस एहमे सभके मान जगवलस एहमे ओकरै छाती दाल दरै के दाँव बतावें हिन्दी कै ॥   सबके माल मलाई आपन मीटिंग सिटिंग संगे ज्ञापन लोक राग भाषा बोली कै नाँव बतावें हिन्दी कै ॥   बूढ़-पुरनियन के करनी पर चाटन-बाटन सब चरनी पर भूसा संगे खरी सउन के गाँव बतावें हिन्दी कै ॥   पीयत घीव ओढ़िके चदरी बेमौसम हौ फाटल बदरी बनिहें भाफ करम कै पानी…

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एगो चिरैयाँ

एगो चिरैयाँ कतिना उचैंयाँ उड़ि गैल रे अङ्गना ओसरवा मुँडेरवा सूने बखरी के जोगछेम अब कौनि गूने झिलमिल अँखियाँ सोनल पँखियाँ टूटि गैल रे बदइल दुनिया के गजबे आवाजे फूटति किरिनिया के सुर कौनि साजे निठुर अहेरिया लागलि डिठरिया परा गैल रे #सुखमा-सुराज# दिनेश पाण्डेय

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घोघो रानी , कतना पानी ?

  घोघो रानी , कतना पानी ?बबुआ अब तs डूबत बानी । डूब गइल बाटे धनखेती ।पानी दिहलस गरदन रेती ।गाछ – बिरिछिया डूब गइल बा , चारु ओरिया पानी-पानी । बबुआ अब ….. डूबल अगुवारा – पिछुवारा ।धुसले बा पानी के धारा ।पानी-पानी कर देले बा , छप्पर के छुअले बा पानी । बबुआ अब …. लागत बा जिनिगी ना बॉची ।पानी पर कबले ई नाची ।भुखे-पिआसे कबले जीहीं ,कबले जोहीं दाना-पानी । बबुआ अब …. आसमान उड़त चिल्हगाड़ी ।झॉकत बाड़ें पारा-पारी ।खलिहा मदद मिलल भरोसा ,झॉक-झुँक लवटे रजधानी । बबुआ…

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हमहूं लूटीं तेहू लूट

हमहूं लूटीं तेहू लूट। दूनो पहिने मंहग सूट। उपर वाले के भी खियाव। अपने पीअ आ उनके पियाव। अईसे जो कईले जईब त रिश्ता हरदम रही अटूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अंगरेजन के हवे सिखावल। आ हमनी के ई अपनावल। शासन अगर करे के बा त जनता मे डरले जा फूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अगर करे केहू कंप्लेन। साहब के द तू सैम्पेन। उनसे मिल-जुल मौज उड़ाव साथे उनके ल दूई घूंट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। आदिकाल से चली आईल बा। केहू न येसे बच पाईल बा। केहू के…

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साँवरी गधबेर

उखम थोरिक, हवा गुमसुम, साँवरी गधबेर। ओरमाइल घन बदरवा, गइल हऽ मुँहफेर। अबहिएँ कुछ देर। पलक पर पानी न छलकल, ना सिराइल ह अगन। देहि के तिसना अतिरपित, का कहीं कतिना तपन? चारि फूही के उमेदे, नयन तरई हेर। साध रहि गइलसि अपूरन, सघन भइल अन्हेर। नीनि रहलसि घेर। साँस में चम्पा कटेरी, गंध के गहिरी चुभन। मन-मिरिग तिरते रहल हऽ आँखि में अनगिन सपन। ओठ तरुआ हलक सूखल, जीभ अधरनि फेर। अकसगंगा धार पातर, निरभ राति उबेर- खेल रहलि अहेर। डाढ़ि में अँखुवा न फूटल, पात पर ना फुरफुरी।…

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बिछावे जाल मछेरा रे

बिछावे जाल मछेरा रे सभके छीने बसेरा रे कहे हम भाग्य विधाता ह ईं सभ के जीवन दाता ह ईं सरग में सभका के पहुँचाइब हमहीं भारत माता ह ईं बढ़ावे रोज अंधेरा रे चकमक चकमक सगरो करे जोति नयन के चुपके हरे देखावे सपना रोज नया ई पेट सँघतियन के ई भरे भगावे दूर सबेरा रे कैद में सुरुज अउरी चान करे के बा ओकर अभियान बजावे ढोल ढमाका खूब नाप देलस धरती असमान उगावे खूब लमेरा रे करीं का कांटक सोचे रोज करेलन हथियारन के खोज बाँची मीन…

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