माफ करब माई !

गवें गवें जाम के लमहर रोगी बनत बनारस के एह घरी आउर बाउर हाल बा। चौमोहानियन के घेर के दुरगा माई के पंडाल बनावे के काम चल रहल बा। रोशनी के झालर लगावे खातिर ढेर लोग ऊंच ऊंच बांस , बल्ली आउर रसरी के सहारे लटकत देखात बाड़ें। ओह लोगन के देखि के रोंआ सिहर उठता ….. कि भहरा के गिर न जाँय सन? एकर जबाबों मन अपनही लप्प से हेर लेता,’ बाँड बाँडो जइहें आ नौ हाथ के पगहो ले जइहें’। मर मरा गइलें त ठीक ना त भर…

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बिना बात के

तनि हई देखा फलाने ढेकाने के अंगुरी पकड़ि के चले सिखावतारें अरे! आजु ढेकाने त फलाने के नरेटी दबावतारें आ चीने लेंज के नियम बतावतारें जवना से जामल ओकरे बिरोध समय का फेरा अबले कराची में तिरंगा लहरावत रहलें ई सुनत सुनत कान पाक गइल बाकि पी ओ के ना भेंटाइल एहर कुछ लोग बीजिंग पर नजर गड़वले बा बाकि का कहीं कोरोनवा मंच कब्जियवले बा।   ई कतो पढ़े के ना मिलल एगो अमीर बाभन रहलें तबो बाभने शोषक कहालें भर भर के गरियावल जालें अइसने कुछ कइके ढेर…

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‘आखर-आखर गीत’ के आवरण के ऑनलाइन लोकार्पण सम्पन्न भइल

  भोजपुरी के लोकप्रिय रचनाकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के  तीसरकी किताबि ‘आखर-आखर गीत’ के आवरण के ऑनलाइन लोकार्पण कई दिन पाछे ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ के आभासी मंच फेसबुक आउर यूट्यूब पर लाइव कइल गइल। कार्यक्रम के शुरूआत डा. रजनी रंजन के  सरस्वती वंदना से भइल । कार्यक्रम के अध्यक्षता सर्वभाषा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अशोक लव कइलें आ  मुख्य अतिथि सुभास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक श्रीवास्तव रहलें। कार्यक्रम का सफल आ प्रभावी संचालन डा. सुमन सिंह संपन्न कइली। मुख्य वक्ता का रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डा.…

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सावनी बहार

रिमझिम पड़ेला फुहार आइल सावनी बहार छान्ही छप्पर छवावे ला आ जा पिया चूड़िया पेन्हा जा पिया ना।   चमके बिजुरी चहुंओर घन बदरा करे शोर बनल खेतवा मे लेउवा लगवा जा पिया चूड़िया पेन्हा जा पिया ना।   बन बोले-नाचे मोर बहे पुरुवा झकझोर संगे चलिके रोपनिया करवा जा पिया चूड़िया पेन्हा जा पिया ना।   मन मे बाटे बिसवास पसरी सगरो उजास आइके गउवाँ मे खुसी मनवा जा पिया चूड़िया पेन्हा जा पिया ना।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी    

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भोरे-भोरे अइहें हो सुगना

बिहँसेला अँखिया में लोर कि भोरे-भोरे अइहें हो सुगना॥   अंतहीन जतरा पर कहिए निकललें रहिया में खइका पानी ला तरसलें चलि परलें गउवाँ का ओर मजूरवा कहइहें हो सुगना।   रहिया में नइखे ओढ़ना बिछवना रतिया बितावेला अकासे छवना पिरात होई देहियाँ पोरे पोर दरदिया पचइहें हो सुगना।   संउसे बिपतिया के हम ओढ़ लेबै एही अँचरवा से आँखि पोंछ देबै पकड़ि मोरे अँचरा का छोर खूबे दुलरइहें हो सुगना॥   बिहँसेला अँखिया में लोर कि भोरे-भोरे अइहें हो सुगना॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

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सखि मोरे दुअरे अइलें बसंत दुलहा

मन के तार से छुवइलें, बसंत दुलहा सखि मोरे दुअरे अइलें, बसंत दुलहा।   खोरिया बहारी गलइचा बिछाइले ऊँचे-ऊँच पिढ़ना उनुके बइठाइले लाले फुलवा फुलइलें, बसंत दुलहा।   मेंहदी महावर हम उनुका चढ़ाइले फूल के सेजरिया हँसि के सजाइले मन के बगिया महकइलें, बसंत दुलहा।   भँवरा भँवरिया गीतिया कढ़ावेलें हुलसि-हुलसि के बजनवा बजावेलें अचके मन बेल्हमइलें, बसंत दुलहा।   आव तू हो सखिया आव तू सहेलिया मंगल गीतिया के कढ़वतु महलिया रूप-सिंधु में नहइलें, बसंत दुलहा।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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घरवा में बाटे न हरदिया, दरदिया……!!

का जमाना आ गयो भाया, मारे बरियरा रोवै न देस।  ई त लमहर आफत आइल बाटे भाई, पहिले लोग कड़ी निंदा से काम चला लेत रहलें,बाकि अचके में सुभाव काहें बदल लीहलें? शाकाहारी होखला का बादो हतना तेज झपट्टा, अचके में  बिसवास नइखे होत। अजबे हालत कर दीहलें यार, न कहते बनता आ न  सुनते | एह बेरी त बेसी थू – थू करा दीहल लोग सगरी दुनिया में। अब त रोवहूँ नइखे देत सन, अबले जेकरा आगु रो-गा के भीख मिल जात रहल ह, उ चीन्हलो से मना कर…

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मानवाधिकार मने रक्षा कवच बाक़िर केकर ….?

का जमाना आ गयो भाया, जेहर देखा ओहरे नटई फ़ारत कुछ लोग देखाइये जा तारन। माने भा मतलब कुछों होखे उनुका चिचिअइले से फुरसत नइखे लेवे के। सभे के आपन-आपन हित बाटे, केकरो अपना दोकनियों के चिंता करे के बा, त केकरो अपना जेब के चिंता बाटे। तनि हई न देखा, सभेले बेसी उहे नरियात देखात ह जेकर ई कुल्हि कइल-धइल बाटे।उनही के आंटा, उनही के घीव, कमरी ओढ़ि के झींक के पियतो बाड़ें आ दोष तवन दोसरा के लगावत बाड़े। आ क़हत का बाड़े कि इनका वोजह से हमरा…

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हारब त हूरब,जीतब त थूरब

जादू टोना, दख्खिन कोना बाति-बाति पर रोना-धोना जाइब पश्चिम आ बोलब पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   करब बहाना मारब ताना ठेंगे ऊपर रखब जमाना बेगर बात के टंगरी तूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   उपरल सोर डेहुंगी सूखल भंडारी रहलें कुल्हि भूखल अनकहले सुरुजो के घूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   इहाँ उहाँ बस उगिलब आग अनियासे छेड़ब खट राग धरम जाति के पेंगला पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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परसुराम सुमिरन

जमदग्नि सुत के सजी दरबार सखिया परसुराम जी के फिरो पुकार सखिया ॥ श्रेष्ठ रिसिन मे बाटे जेकर किरितिया बाबू के खातिर जेकर चर्चित पिरितिया उनका हिया के अँगना मे उतार सखिया ॥ कन्हिया सोहे जेकरे तिरिया धनुहिया हाथे फरुहा पुरहर शास्त्रन के रहिया उनका पउवाँ के लोर से पखार सखिया ॥ मही बिहीन अरि से कइने धरतिया लौटि फेरु आईं बाबा धूमिल थतिया अहो हर बेरी उनही के निहार सखिया ॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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