बतावा बुढ़ऊ

काहें काशी पर मोहइला बतावा बुढ़ऊ। काहें आदि देव कहइला बतावा बुढ़ऊ।   जाने के त सभ जानेला हउवा बड़का दानी भगतन खातिर कई जाला, बढ़-चढ़ के मनमानी काहें असुरन पर लोभइला बतावा बुढ़ऊ।   जेकर अरजी तहरे लग्गे दुख ओकर भागेला दाही-दुसमन भूत-प्रेत, पानी सबही माँगेला काहें दसानन से लुटइला बतावा बुढ़ऊ।   हम निरधन तहरा सोझा,हमके राह देखावा मझधार में बूड़त नइया, ओके पार लगावा काहें हम पर ना छोहइला बतावा बुढ़ऊ।   कैलास के बासी हउवा, मृग छाला पहिरेला जंगल झाड़ का बतलाईं, पहड़ो में रहि लेला।…

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कजरी

भर सावन मोहे तरसइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। कवना सउतिन में अझुरइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   खेतवा फाटे अस फटे बेवइया बेहन सूखत जइसे मुदइया काहें असवों नाहीं अइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   कइसे जीहें चिरई-चुरमुन बबुआ चलिहें कइसे ढुनमुन ई बुझियो ना सरमइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   मचल बाटे हाहाकार अवता लेता सभे उबार कवना बातिन से कोहनइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।   तोहू भइला जस विकास तूरला किसानन के आस जनता फेरा में फंसइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना।  …

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बनउवा रूप तहरा

दहके पलास फूल जिया डहकावे हो। बनउवा रूप तहरा हमरा ना भावे हो॥   सोरहो सिंगार ओढ़ि ललखर चुनरिया गाँव नगर होत आइल सइयाँ दुअरिया गोरिया के नखरा जिया ललचावे हो। बनउवा रूप—–   घर अँगनइया में धप-धप अँजोरिया टटके सजल बाटे ललकी सेजरिया गजरा गुलाबी गोरी जिया बहकावे हो॥  बनउवा रूप—–   रूसियो के  फूलल नाहके कोहनाइल पजरा पहुँचि गोरी नियरा  ना आइल उपरल हिया में सूल जिया दहकावे हो॥ बनउवा रूप—–   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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बरम बाबा

राउर महिमा रउरे जानी हम ना जानी मरम बाबा का का गाईं बरम बाबा॥   रउरे किरपा सोनरा के घर पसरल मजगर उजियारी पूजन अरचन करि करिके दीहलस कुलवा तारी।   जियत जिनगी करम करत मानि आपन धरम  बाबा। का का गाईं बरम बाबा॥   पहिले दिनवाँ कटत रहे जइसे तइसे,बाँची पतरा तहरे दीठि से पूरन भइल मुंसी से मालिक के जतरा   आँखि खुलल सनमान बढ़ल नइखे कवनों भरम बाबा। का का गाईं बरम बाबा॥   सरधा जेकर बा तहरा में किरपा ओपर बरसावेला ओकरे किरती के अँगना अँजोरिया…

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कुल्हि हमरे चाही

हमही त बानी असली राही कुल्हि हमरे चाही।   हमही से उद्गम हमरे में संगम धमकी से करब हम उगाही कुल्हि हमरे चाही।   हमरे से भाषा हमरे से आशा छपि के देखाइब खरखाही कुल्हि हमरे चाही।   हमही चउमासा बुझीं न तमासा खम खम गिरिहें गवाही कुल्हि हमरे चाही।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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मध दुपहरिया

सप सप चले ले लुअरिया हो सखि ! मध दुपहरिया। कइसे बचाईं जवरिया हो सखि ! मध दुपहरिया॥   एकहू बाग बगइचो ना बाचल नदी नार पोखर नइखे सवाचल बन्हओ क टुटल कमरिया हो। सखि ! मध दुपहरिया॥   हरियर बनवा सपन होई गइलें सहर आ गउवाँ प्रदूषित भइलें गरमी के बढ़ल कहरिया हो। सखि ! मध दुपहरिया॥   चिरई चुरमुन के असरा बिलाइल बिरवा के  सँगे कियरियो सुखाइल घरवो में डाहे लवरिया हो । सखि ! मध दुपहरिया॥     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 5/6/2022

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उतार गइल मुँहवा क पानी

करिया करम बीखि बानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   कतनों नचवला आपन पुतरिया लाजो न बाचल अपने दुअरिया नसला इजत खानदानी । उतार गइल मुँहवा क पानी॥   झुठिया भौकाल कतनों बनवला बदले में लाते मुक्का पवला मेटी न टाँका निसानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   साँच के बचवा साँचे जाना नीक आ नेवर अबो पहिचाना फेरु न लवटी जवानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   अब जे केहुके आँख देखइबा ओकरा सोझा खुदे सरमइबा कइसे के कटबा चानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 31/03/2022…

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बाउर बातिन का बिरोध से बेसी जरूरत बा नीमन बाति के लमहर परम्परा बनावे के !

हम विषय पर आपन बात राखे का पहिले रउवा सभे के सोझा 3-4 बरिस पहिले के कुछ बात राखल चाहत बानी। 20-22 करोड़ कथित भोजपुरी भाषा भाषियन का बीच 3-4 गो पत्रिका उहो त्रमासिक भा छमाही निकलत  रहनी स। ओह समय भोजपुरी के नेही-छोही रचनाकार लोगन का सोझा भा भोजपुरी के नवहा रचनाकार लोगन के सोझा ढेर सकेता रहे। ओह घरी 3-4 गो जुनूनी लोगन का चलते भोजपुरी साहित्य सरिता के जनम भइल। एकरा पाछे एगो विचार रहे कि भोजपुरी के नवहा लिखनिहार लोगन के जगह दीहल जाव, पुरान लोगन…

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तमासा घुस के देखै

लख लतखोर कहाय, तमासा घुस के देखै॥ सौ सौ जुत्ते खाय, तमासा घुस के देखै॥   इनका उनुका बहकावे में नाटो क खिचड़ी पकावे में जेलस्की इतराय, तमासा घुस के देखै॥   गावत फिरत देस के गीत संहत  छोड़ि परइलें मीत बइडेनवा मुसकाय, तमासा घुस के देखै॥   बरसे लगल रसियन मिसाइल खड़हर सहर मनई बा घाहिल खूनम खून नहाय, तमासा घुस के देखै॥   मानवता के नारा कइसन नैतिकता क पहाड़ा जइसन कबौं बदल ऊ जाय, तमासा घुस के देखै॥   के बा नीक, नेवर के बा फयदा केकरा…

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बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो

ठुनुक़त घरवाँ अंगनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो बिहँसत माई के परनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   मुँहवा लपेटले मखनवाँ बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो उचकि उतारत अयनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   हुलसत गरवा लगावेली अरे हो भरले लोरवा नयनवाँ , बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   रोआँ पुलकि जिया हरसेला अरे हो कुंहुकेला मन अस मयनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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