साहित्य में आरक्षण भा सम्मान के आरक्षण

सहित के अवधारणा कवनो साहित्य के सबसे बड़ पूंजी होले। एह भाव आ सुभाव का संगे साहित्य में आपन सब कुछ न्योछावर करत साहित्यकार लो सिरजना करेला। समय ओह सिरजना के मूल्यांकनों करेला आ समय समय पर ओह साहित्यकार लोगन के सनमानों करेला। भोजपुरी साहित्य सरिता के ई संपादकीय लिखत बेर मन अतना हुलासित बा कि ओकरा शब्दन में बान्हल संभव नइखे लागत। 2013 के बाद 2021 में साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान (गैर मान्यता प्राप्त) भोजपुरी भाषा के दू गो समर्पित लोगन के ‘भाषा सम्मान’ देवे के घोसना भइल…

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आन्हर गुरु, बहिर चेला

समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…

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एगो रोमांचक यात्रा

जतरा के अनुभव सभके गुगुदावेला , दुख सुख , नीमन – बाउर कूल्हि के सनीमा लेखा मानस पटल पर उकेर जाला । कुछ  कुछ अइसने एहसास लेवे खाति बाबा नागार्जुन के “अथातों घुमक्कड़ जिज्ञासा” के अनुकरण हमरो से भइल । गाजियाबाद से मुंबई के यात्रा अकेले शुरू भइल । पहिलका पड़ाव अकोला रहे , जहवाँ हमार एगो हितई बाटे । एक दिन के विश्राम कइला के बाद अपने एगो अजीज प्रिय अनुज राम प्रकाश मिश्रा जी के संगे अकोला से मुंबई के जतरा शुरू भइल । अगिला दिने उहाँ एगो…

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अवघड़ आउर एगो रात

रहल होई १९८६-१९८७ के साल , जब हमारा के एगो अइसन घटना से दु –चार होखे के परल , जवना के बारे बतावल चाहे सुनवला भर से कूल्हि रोयाँ भर भरा उठेला । मन आउर दिमाग दुनों अचकचा जाला । आँखी के समने सलीमा के रील मातिन कुल्हि चीजु घुम जाला । इहों बुझे मे कि सांचहुं अइसन कुछो भइल रहे , कि खाली एगो कवनों सपना भर रहे । दिमाग पर ज़ोर डाले के परेला । लेकिन उ घटना खाली सपने रहत नु त आजु ले हमरा के ना…

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बुढ़िया माई

१९७९ – १९८० के साल रहल होई , जब बुढ़िया माई आपन भरल पुरल परिवार छोड़ के सरग सिधार गइनी । एगो लमहर इयादन के फेहरिस्त अपने पीछे छोड़ गइनी , जवना के अगर केहु कबों पलटे लागी त ओही मे भुला जाई । साचों मे बुढ़िया माई सनेह, तियाग आउर सतीत्व के अइसन मूरत रहनी , जेकर लेखा ओघरी गाँव जवार मे केहु दोसर ना रहुए । जात धरम से परे उ दया के साक्षात देवी रहनी । सबका खाति उनका मन मे सनेह रहे , आउर छोट बच्चन…

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अन्हरिया मे हलचल भइल

भोरहीं उग्गल किरिनियाँ के भाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   तारीख पचीस आ पूस महिनवाँ माई भारती क रहे शुभ दिनवाँ लीहलें अजुवे मदन अटल राग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   छनकल केहरो केहू के मनवाँ भइलें हुलास उमगल अंगनवाँ चंहकल गोइड़ा के हरियर बाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   मदन जरवने काशी ज्ञान दियरी पोखरण विस्फोट, पहिनी पियरी दहकल दुनिया मे भारत के आग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   भोरहीं उग्गल किरिनियाँ के भाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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अहम् के आन्हर सोवारथ में सउनाइल

का जमाना आ गयो भाया, आन्हरन के जनसंख्या में बढ़न्ति त सुरसा लेखा हो रहल बा। लइकइयाँ में सुनले रहनी कि सावन के आन्हर होलें आ आन्हर होते ओहन के कुल्हि हरियरे हरियर लउके लागेला। मने वर्णांधता के सिकार हो जालें सन। बुझता कुछ-कुछ ओइसने अहम् के आन्हरनो के होला।सावन के आन्हर अउर अहम् के आन्हरन में एगो लमहर अंतर होला। अहम् के आन्हरन के खाली अपने सूझेला, आपन छोड़ि कुछ अउर ना सूझेला। ई बूझीं कि अहम् के आन्हर अगर सोवारथ में सउनाइल होखे त ओकर हाल ढेर बाउर…

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अक्कल दाढ़

भरल दुपहरी,छुटल कचहरी अचके काहें टुटल सिकहरी बबुआ दुअरे बाड़न ठाढ़। निकसल नाही अक्कल दाढ़॥   जेकर नावें  छुटत पसीना थथमल काहें चाकर सीना देखS दुसमन रहल दहाड़। निकसल नाही अक्कल दाढ़॥   रावत कब दुसमन के भावत उनुका तिनगी नाच नचावत घात भइल ले घर के आड़। निकसल नाही अक्कल दाढ़॥   भित्तरघात भइल होखे जे आपन उहाँ जुड़ल होखे जे घर के होखे, भेज तिहाड़। निकसल नाही अक्कल दाढ़॥   सेना के  जे दिहल चुनौती उनुकर सगरे पुरल मनौती बहरे उनुका, सोर उखाड़। निकसल नाही अक्कल दाढ़॥  …

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अँधेर पुर नगरी….!

का जमाना आ गयो भाया,सगरी चिजुइया एक्के भाव बेचाये लगनी स। लागता कुल धन साढ़े बाइसे पसेरी बा का। कादो मतिये मराइल बाटे भा आँखिन पर गुलाबी कागज के परदा टंगा गइल बा,जवना का चलते नीमन भा बाउर कुल्हि एकही लेखा सूझत बाटे। मने रेशम में पैबंद उहो गुदरी के। मने कुछो आ कहीं। मलिकार के कहलका के आड़ लेके आँखि पर गुलाबी पट्टी सटला से फुरसते नइखे भेंटत। मलिकार कहले बाड़े, ठीक बा, बाक़िर समय आ जगह का हिसाब से कुछो कहल आ कइल जाला। अपना लालच में मलिकारो…

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कुल्हि हमरे चाही

हमही त बानी असली राही कुल्हि हमरे चाही।   हमही से उद्गम हमरे में संगम धमकी से करब हम उगाही कुल्हि हमरे चाही।   हमरे से भाषा हमरे से आशा छपि के देखाइब खरखाही कुल्हि हमरे चाही।   हमही चउमासा बुझीं न तमासा खम खम गिरिहें गवाही कुल्हि हमरे चाही।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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