भोजपुरी लोक संस्कृति : खान-पान आ परिधान

भोजपुरी लोक संस्कृति बिहार,उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल आ झारखंड के कई हिस्सन में पसरल एगो समरिध आ पुरान जीवन शैली ह। भोजपुरी लोक संस्कृति एगो लमहर पइसार वाली संस्कृति ह, जवन ओह क्षेत्र के रहनिहार लोगन के जिनगी के हर कोना-अँतरा में ससरि के बइठल बा। ई संस्कृति मनई के जिनगी जिये के कला का संगे सुघर आ अनुसासित बनावेले। एह क्षेत्र में अलग-अलग परंपरा आ रीति-रेवाजन के विधि-विधान जिनगी के जिये खातिर जरूरी साधन बनि चुकल बा। मनई के जिनगी खातिर घर, महल, किला, गाँवन के बनावट-बुनावट, भोजन, शिक्षा,…

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समय के आरोह-अवरोह के बीच समाज

कतों सत्ता लोलुपता का चलते सत्ता के स्वामी लोग के करतूत, ओकरा चलते समाज के , नवहा लोगन के भा बच्चा-बुतरु सभ के  बिखियाइल नजायज कइसे बा, परिभाषित नइखे कइल जा सकत। कुछ लाख लोगन का चलते डेढ़ अरब जनता के दरकिनार क के देखत सरकार अब कुरसी का छोड़ अउर कवनो बात समुझे-बुझे के तइयार नइखे देखात । सरकार के भाषा हिटलर , मुसोलिनी भा रावण आ कंस के भाषा लेखा बन चुकल बा। आपुसे में बिख के खेती करत-करावत सरकार आ सरकारी तंत्र अपना गुरूर में आन्हर हो…

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भोजपुरी साहित्य के काल विभाजन

कवनो भाषा के परिचय के मतलब होला ओकरा उत्पत्ति से लेके वर्तमान तक के क्रम बद्ध गतिविधि के विस्तार पूर्वक जानल भा जानकारी प्राप्त कइल। भोजपुरी हिन्द आर्यन  भाषा परिवार के एगो सशक्त भाषा ह,जवना के उत्पत्ति मागधी,प्राकृत आ ओकरा अपभ्रंश से भइल मानल जाला। आजु भोजपुरी के सर्वमान्य लिपि देवनागरी लिपि बा। पहिले से शुरू कके आज ले गौरवशाली भोजपुरियन के चित्त, चिंतन ,चेतना में हो रहल परिवर्तन , परिमार्जन के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में समसामयिक बदलाव के दस्तावेजीकरण  के भोजपुरी साहित्य के इतिहास कहल जा सकेला । साहित्य…

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कजरी

1 अइलें नाही तोहरो बिरनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी। आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी सवनवाँ आई गइलें ननदी।   गोतिनी मोरी चलेले अतिराइल अपने पियवा के रंग में रंगाइल कि सून लागे हमरा भवनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी।   भोरहीं सिवाने सुनाले कजरिया रहिया निहारत तोहरी गुजरिया कि मानि लेता हमरा कहनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी।   बिरहा के मारल तोहरी सजनियाँ रतिया सेजिया आवे नाही निनियाँ कि लोरे सउनाइल नयनवाँ हो, सवनवाँ आई गइलें ननदी।   आई गइलें ननदी हो, आई गइलें ननदी सवनवाँ…

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बड़का रंगदार के

का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर डाल देले बा। जहवाँ भिडियो देखिके मउसम विज्ञानी के संघतिया लोग के बकारे नइखे फूटत। उहवें उहाँ के गोतिया लोग चवनिया मुसुकी काटि-काटि के माजा मार रहल बा। एक-दोसरा से भुसुरा-भुसुरा के मउसम विज्ञानी के…

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समय का संगे साँप-सीढ़ी के खेला

समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…

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इहवाँ हमनी के सरकार

लिखल, पढ़ल, सोचल, बोलल मानल जाई तकरार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   हमरे से हौ नून तेल आ हमरे से कानून चाहे रहा तू केरल बबुआ चाहे देहरादून   अगड़ा, पिछड़ा, दलित के खेला सब हमरे ब्योपार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   कबों खातिर एस सी एस टी,कबों के बा यू जी सी बचा-खुचा आरक्षण से, घलुआ बाटे खबर नबीसी   बिना जांच-पड़ताल के बबुआ सुखले खइबा मार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥   झगड़ो केहू कतौ भले, खतरा तहनी के सिरे किल्लत के उठी…

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चइता के साध मरि गइलें हो रामा

हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत  महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा…

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तेल के खेल

समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत…

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उचरत हरिनन्दी के पीर के बहाने से

हरिनन्दी भा हरनंदी अब ई नाम बिलम गइल बा। विरले लोग होई जेकरा के ई नाम के महातम मालुम होई। अंग्रेजन के दिहल अपभ्रंश नाम हिंडन से सबके परिचय बा। ई उहे हरिनन्दी नदी हई जे सहारनपुर के पास से निकल के आ चार सौ किलोमीटर चल के गौतमबुद्ध नगर माने नोएडा के पास यमुना से भेंट करेली। बाकि एह नदी पर जइसे राहू के साया होखे, आपन जनम स्थान से निकलते कईगो शहर के मैला आ कल-कारखाना के गाद अपना माथे ढोवे लागेली। देह गल के जइसे ठठरी हो…

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