‘तीन तलक्का’ नवगीत ओम धीरज जी के भोजपुरी गीत-संग्रह ‘रेता पड़ल हिया में’ में संकलित बा। ओम जी हिंदी आ भोजपुरी में गीत लेखन में सक्रिय बाड़न। ऊ उत्तर प्रदेश शासन के वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी रहलें। सेवामुक्त होके बनारस में रह रहल बाड़न। बचपन के खेलगीत ‘ओक्का बोक्का तीन तड़ोका’ के तर्ज प रचल एह गीत में ऊ का कहल चाहत बाड़न, बूझे के जरूरत बा। ध्यान देवे के बात बा कि एह में तीन गो खेलगीत बा। शुरू में ‘ओक्का-बोक्का’ बा आ आखिर में ‘अक्कड- बक्कड़’। बीच में दोसर…
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ग़ज़ल
आ गइल बा प्रेम के दिन, दिल भइल कचनार अब, फेर जनि आपन नजरिया, नैन कर तू चार अब। खेत में सरसों फुलाइल, रंग हरदी के लगल, लाज से धरती लजाइल, हो गइल बा प्यार अब। प्रीत-चुनरी ओढ़ के जे, डूब गइली प्यार में, गीत मस्ती के पवनवा, देत बा उपहार अब। आम के मोजर सुगंधी, दे गइल चहुँ ओर में, कूक कोयल के सुनींजा, बाग में गुंजार अब। राग सगरो ‘गूँज’ गइले, नेह के अनुराग के, छा गइल देखीं गुलाबी, फाग के झंकार अब। गीता चौबे गूँज राँची…
Read Moreबोल बचवा – कुछो बोल
कुछ दिन से दादा जी बहुत याद आवत बाड़न। जब भी पुरान बात अतीत के सोचीला, ओकरा में दादा जी जरूर शामिल होखेलन। छुट्टी में जब भी शहर से दादा जी के पास जात रहनी, खूब बतकूचन होखे। हमरा से भर पेट तरह-तरह के बात पूछस। एके बतिया के घुरपेट के आगे बढ़ावत रहीं जा। गर्मी के छुट्टी एक महीना के होत रहे। दादा जी खाली बतिआवे में रहस, त दादी माँ के आपन अलग किस्सा रहत रहे। ऊ खाली खियावे बदे परेशान रहस। बबुआ ई खा ल, हऊ खा…
Read Moreलोक-परलोक के संघतिया
दुलारी देवी के सज्जन सिंह से बिआह भइला 40 बरीस खुल के ना बोल पावत रहली आ ना उनुका से नजर मिला सकत रहली। उनकर खड़ाऊँ के खटर खटर सुनऽते उनकर घूघ नाक तक आ जात रहे। सज्जन सिंह से ऊ कुछुओ बोलऽतो बतिआवत रहली कि ना कहल मुसकिले रहे। सज्जन सिंह बड़ी दम-खम वाला जमींदार के पूत रहलन।जमींदरई त माई-बाप संगही ओरा-बिला गइल रहे बाकिर ओकर असर सज्जनसिंह पर अजुओ खूब रहे। दुआर पर हरदम आसामी आ अंगना में औरतन के खेत खरिहान से आइल सामान के बटोरे-सटोरे के…
Read Moreचन्द्रेश्वर के ‘हमार गाँव’: हमरो गाँव
भोजपुरिया माटी उहो गंगा के किनार के पलल बढ़ल हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.चन्द्रेश्वर के भोजपुरी के कथेतर गद्य ‘हमार गाँव’ पढ़ के लागल कि रोजी- रोटी के तलाश में शौक भा मजबूरी में भले गाँव छूट जाला ,देह से भले दूर चल जाला बाकिर मन में गाँव मुए ना,मन से ऊ गाँवे के रहेला। माटी से जुड़ल साहित्यकार चाहे भा ना चाहे ओकर साहित्य गाँव, माटी आ खेत के सौंध महक से सनाईल रहेला। एगो विशेष बात ‘हमार गाँव’ में चन्द्रेश्वर जी खाली गाँव -घर , टोला- परोसा,खेत –…
Read Moreगोरखनाथ: धीरे धरिबा पाँव
अठवीं से लेके बरहवीं शताब्दी ले चौरासी सिद्ध लोग अपभ्रंश में कविता करत रहे ।सिद्ध लोगन के कविता में भोजपुरी शब्द आ क्रिया रूप मिलल शुरू हो गईल रहे। चौरासी सिद्धन में सबसे प्रसिद्ध रहलें सरहपा । उन कर एगो कविता देखल जां –नगर बाहर रे डोंबि तोहारि कुडिया/छोड़- छोड़ जाई सो बाभन नाड़िया /आलो डोंबि तो सम करबि मो संग /जाम मरण भाव कइसन होई/जीवन्ते भले नाहि विसेस ।‘ एमे ‘छोड़ि छोड़ि जाई’ आ ‘कइसन होई’ भोजपुरी प्रयोग हवे ।सिद्ध लोगन के कविता में एह तरे के बहुत उदाहरण…
Read Moreनदी के लाश बेहतर बा गुरूजी
बहत हर आदमी धारा में लेकिन किनारा पा सकल ना आज तक भी , सहारा अब कहां पाईं, भेटाई इशारा कर रहल इतिहास तक भी । खुदी के हाथ पर विसवास राखी ओही के आखिरी पतवार बुझी। नदी के लाश बेहतर बा गुरूजी। नदी के लाश,,,,,,,,, । नियम कानून कऊनो ना बनल ह कि कऊने रास्ता से केई जाई , उहा दरबान भी मिलीहे न तोहके कि बढ़ी के बोल दे एहरे से आईं । तोहार इमान ही बलवान ओहिजा भरल जिनगी जवन तोहसे अबुझी, नदी के लाश बेहतर…
Read Moreगीत
हो घेरलस करिया बदरिया, रोपनी के सुतार आ गईल। बहे लागल पुरवा बयरिया, हमनी के बहार आ गईल। जइसे उड़े सड़िया अचरिया, गछियन के लहार आ गईल। रोपे चलस गोरिया संवरिया, पायलन के झंकार आ गईल। झमर झमर बरसे बुनरिया, छातवो में फुहार आ गईल। कड़कड़ाए चमके बिजुरिया, लुकाएके ओहार आ गईल। गावे के गीतवा कजरिया, मनवा में हमार आ गईल। संतोष कुमार, नरकटियागंज, पश्चिमी चंपारण, बिहार।
Read Moreगीत
मन सून-सून मनसून बिना। अबले ताले कमल खिलल ना तन लागेला खून बिना। एक तऽ अदिमी अइसे जरना हिया भरल अंगार ऊपर से सूरुज दहकावे हो के माथ सवार भाव बिना सूनी कविताई खत सूना मजमून बिना। नदी मात के छाती सूखल भूखे शिशु छपटाय पेड़ लता के बाँचल ठठरी कब जाने भहराय जोजन भर उड़ि गइली चिरई भहरइली जलबून बिना। बेना लिहले बइठल के ना? हँउकत हाथ पिराय तबहूँ टपटप चुवे पसेना गगरी भरि-भरि जाय बुढ़िया दादी अटपट बोले तन अँइठाइल नून बिना। उमख उड़ावे ईत्तर जइसन नींनि आँखि…
Read Moreरहे इहाँ जब छोटकी रेल
देखल जा खूब ठेलम ठेल रहे इहाँ जब छोटकी रेल चढ़े लोग जत्था के जत्था छूटे सगरी देहि के बत्था चेन पुलिग के रहे जमाना रुके ट्रेन तब कहाँ कहाँ ना डब्बा डब्बा लोगवा धावे टिकट कहाँ केहू कटवावे कटवावे उ होई महाने बाकी सब के रामे जाने जँगला से सइकिल लटका के बइठे लोग छते पर जा के अरे बाप रे देखनी लीला चढ़ऽल रहे उ ले के पीला छतवे पर कुछ लोग पटा के चलत रहे केहू अङ्हुआ के छतवे पर के उ चढ़वैइया साइत बारे के पढ़वइया…
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