‘अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन’ के दिल्ली इकाई के गठन भइल

दिल्ली। ‘अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन’ भोजपुरी साहित्य के संवर्धन-संरक्षण के क्षेत्र में काम करे वाली सबसे पुरान संस्था ह। एह संस्था से अनेक वरिष्ठ साहित्यकार लोग जुड़ रहल बा। एह संस्था के 21 वां अधिवेशन पिछला 26-27 फरवरी के बिहार के मोतिहारी में भइल। अधिवेशन सम्मेलन के नया कार्यकारिणी के गठन भइल आ ओही में प्रतिज्ञा पढ़ल गइल कि एकर विस्तार देश के अलग-अलग राज्यो में कइल जाई। ओहि सिलसिला में दिल्ली इकाई के संयोजक केशव मोहन पाण्डेय के बनावल गइल। पिछले दिन दिल्ली इकाई के गठन भइल ह।…

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सुनीं ना अरज मोरे भइया हो

भोजपुरी कविता प जब बात होई त भोजपुर के भोजपुरी कविता प जरूर बात होई भा होखे के चाहीं। भोजपुर के जमीन भोजपुरी कविता खातिर काफी उपज के जमीन ह। भोजपुर के भोजपुरी कविता के एगो महत्वपूर्ण पक्ष ह ओकर जनधर्मी मिजाज। सत्ता से असहमति आ जन आ जन आंदोलन से सीधा संवाद। रमाकांत द्विवेदी रमता, विजेंद्र अनिल, दुर्गेंद्र अकारी एही जमीन के खास कवि हवें। कृष्ण कुमार निर्मोही के नांव भी एह जमीन से जुड़ल बा। एह बीचे जितेंद्र कुमार के भी कविता सोसल मीडिया प लगातार पढ़े के…

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मय सिवान के चोली-चूनर धानी लेके

ए. बी.हॉस्टल, कमच्छा, वाराणसी में रहत समय अकसरहां सांझ के कवनो ना कवनो टॉपिक प चरचा छिड़िए जात रहे। सारंग भाई (स्व. सुरेंद्र कुमार सारंग) एह चरचा के सूत्रधार होत रहलें। एही तरे एक दिन चरचा होये लागल भोजपुरी के कवि जगदीश पंथी के एगो गीत प। ऊ गीत रहे- ‘रुनुक झुनुक बाजे पायल तोहरे पंउवा/ बड़ा नीक लागे ननद तोहरे गंउवा।’ सारंग भाई ऊ गीत सुनवलें आ ओकर तारीफ कइलें। सारंग खुद बढ़िया गीत लिखत रहलें। जगदीश पंथी के नांव पहिल बेर हम ओहिजे सुनलें रहीं। गीत में गांव…

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मंतोरना फुआ

बुचिया के छुट्टी ना मिलल एहि से मंतोरना फुआ के अकेले जाए के पड़ल।एसे पहिले जब कहीँ जायेके होखे त केहू न केहू उनके संगे रहे।एदा पारी फुआ एकदम अकेले रहलीं बाकी गांवें जाये क एतना खुसी रहे कि उनके तनिको चिंता न रहे। आराम से गोड़ फइलवले पूरा सीट छेंकले रहलीं। “दादी जरा साइड होइए…।” फुआ देखलीं एगो बीस-बाइस साल क लइका उनके सामने खड़ा ह। “ना ई हमार सीट ह।हई देखा टिकस…बुचिया कहले रहलीं कि जबले टेशन ना आई तबले सीट छोरीह जीन।” “हाँ,लेकिन बीच वाली बर्थ मेरी…

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बेकहला

” ए बचवा हई मोबईलवा पर का दिनवा भर टिपिर-टिपिर करत रहेला।कवनो काम -धंधा ना ह का तोहरे लग्गे आंय।” बेकहला बोलत-बड़बड़ात बचवा के गोड़तारी आके करिहांय धय के निहुर गइलीं। ” तू आपन काम करा न , काहें हमरे फेर में पड़ल रहे लू।अबही जा इँहा से हमार दिमाग जिन खा। ” आछा-आछा हमरे छन भर खड़ा रहले से तोहार दिमाग जर-बर जात ह।अइसन दिमाग के त हम बढ़नी बहारी ला।जा ए बचवा बूढ़ -पुरनिया से जे अइसे बोली ओके भगवान देखिहन।” “काहें, आज सबेरे से केहू भेटायला ना…

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गंगा महिमा

गंगा के महिमा दुनिया में, सबसे बड़ा अनमोल हगंगा में जे डूबकी लगावे,पाप ओकर सब गोल हगंगा के महिमा…….. मोक्ष देवे के खातिर गंगा, लेले  बारी अवतारपर परदूषण से दुखी बारी, देख तनी विचारअमरित जस गंगा जल में,कचरा के मिलत घोल हगंगा के महिमा…….. धरती पर जब अइली मईया,मोक्ष के खुलल दुआरभागिरथ के सब पुरखन के, तब रहे भइल उद्धारगंगा के जे मईया ना बुझे, बुझ उ बकलोल हगंगा के महिमा…….. रीति रिवाज के नाम पे गंगा, मैली हो गइल बारीआज बाट जोहत बारी लाल के,आके हमके संवारीभागिरथ फेर से आव धरा पर,मईया…

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रोवतारी माई

सखी सहेली खड़ा,बाड़ी कतार में, रोवतारी माई , धके अकवार में। नईहर छोड़ी जब, ससुरा में जाली, फेड़ से लागे जस ,टूट गइल डाली। बरसो के रिश्ता, तोड़ी एक बार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। सुसुकी-सुसुकी माई,लोर बहावेली, बेरी,बेरी बेटी जरी,घूमी के आवेली। भरे ना जियरा ,मिले से एक बार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। हो तारू बेटी आज, हमसे पराया, जा तारू जहाँ तू, करिह हो छाया। खुशीया भरल रहे, घर संसार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। दीपक तिवारी श्रीकरपुर,सिवान

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ए बदरी

सुखि गइलें पोखरा आ जर गइलें टपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । बनरा के पेट पीठ एक भइलें घानी । कहा काहें होत बाटे राम मनमानी । गोरुअन के बेटवा क पेटवा ह खपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । संझवा बिहनवा में कमवा न सपरी । होते दुपहरिया भुजाई जालीं मछरी । नदिया में अगिया लगाई देलु जबरी , ए बदरी ।…

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समइये गुरु ह समइये ह चेला

समइये गुरु ह समइये ह चेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । लहर जाला झंडा केहु के अकासे केहु हाथ मल के रहेला उदासे समइये घुमावेला सुख दुख के मेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । बिना मंगले देबेला बड़का खजाना मंगला पर मिले न चाउर के दाना कहां केहु के कुछो वश में रहेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । आदमी के कुक्कुर नियन दुरदुरावे समइये ह कुक्कुर के आदमी बनावे समय पर समइये परीक्षा भी लेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । करम आ…

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धनवा-मुलुक जनि बिआह हो रामा

भोजपुरी कविता में महिला कवि लोग के उपस्थिति आ ओह लोग के कविता पर विचार, आज के तारीख में एगो गंभीर आ चुनौतीपूर्ण काम बा। एह पर अब टाल-मटोल वाला रवैया ठीक ना मानल जाई। भोजपुरी के लोकगीत वाला पक्ष हमरा नजर में जरूर बा। लोकगीत के अधिकांश महिला लोग के रचना ह, भले केहू के नांव ओह में होखे भा ना होखे। एहिजा लोकगीतन के चरचा हमार मकसद नइखे। भोजपुरी कविता के जवन उपलब्ध भा अनुपलब्ध बिखरल इतिहास बा, ओह के गहन-गंभीर अध्ययन के जरिए ही एह विषय प…

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