भोजपुरी लोक संस्कृति बिहार,उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल आ झारखंड के कई हिस्सन में पसरल एगो समरिध आ पुरान जीवन शैली ह। भोजपुरी लोक संस्कृति एगो लमहर पइसार वाली संस्कृति ह, जवन ओह क्षेत्र के रहनिहार लोगन के जिनगी के हर कोना-अँतरा में ससरि के बइठल बा। ई संस्कृति मनई के जिनगी जिये के कला का संगे सुघर आ अनुसासित बनावेले। एह क्षेत्र में अलग-अलग परंपरा आ रीति-रेवाजन के विधि-विधान जिनगी के जिये खातिर जरूरी साधन बनि चुकल बा। मनई के जिनगी खातिर घर, महल, किला, गाँवन के बनावट-बुनावट, भोजन, शिक्षा, साज-सज्जा, पहिरावा आ ब्योसाय जइसे खेती-किसानी, पशु पालन आ सासन बेवस्था सभे में भोजपुरिया लोक संस्कृति के झलक देखाई देला। भोजपुरी लोक परम्परन में चउक चन्दा, साँझा पराती, जलुआ, जातीय परंपरा, सिंदूर, नाग-पूजा, शीतला माई, घरौंदा, कोठिला, कपड़ा-लता से बनल खेलौना, गहना-गुरिया , पान-पत्ता, पचकोसी मेला, चैता, गंवई रंगमंच आदि के खास अथान बाटे। एह सगरी बातन के एक बात – एकरा समुझे खातिर इहाँ के लोकगीत सबसे कारगर माध्यम बाटे।
भोजपुरी समाज भोजपुरी भाषा में ब्योहार करेला। भोजपुरिया समाज अपने रीति-रेवाजन के जी भर के जिएला, बरतेला या ओहमें भरपूर सउनाइलो रहेला। इहे उ भोजपुरिया लोक संस्कृति ह, जवन सदियन से बलखात अल्हड़ नदी लेखा बहत चलल चल आ रहल बा। भोजपुरिया लोकगीत जन मानस के अंतस से निकलल एकदम निरइठ मानसिकता, भावुकता से भरल, सरस सोच के देखावे वाला भोजपुरी समाज के पहचान ह। मने देखल जाव त लोकगीत में ओह समाज के लोगन के आपन बयान, अपने सुख-दुख के बयान, अपने इच्छा या चाहत के बयान होला। ई लोकगीत अपना में गाँव-घर, सहर-बजार, सास-ननद, मरद-मेहरारू, खेत-खरिहान, देवर-भउजाई, गोतिया-दयाद, परजा-पवनी सभे के संहरियाय के आगु बढ़त रहेला। जवने लेखा लोक के आपन लय या गति होले, ओही लेखा लोकगीतन में ओकर झाँक देखाला।
कृष्ण देव उपाध्याय जी अपने पुस्तक ‘लोक साहित्य के भूमिका’ में लोक के परिभाषित करत कहले बानी, “आधुनिक सभ्यता से दूर अपने प्राकृतिक परिवेश में निवास करेवाली अतिशिष्ट आ असंस्कृत जनता के लोक कहल जाला। लोक के आचार-विचार आ जीवन शैली परंपरा से नियंत्रित होले।” आ लोकगीत के लेके कृष्ण देव उपाध्याय जी कहत बानी, “लोकगीत साहित्यिक श्रेणी के गीत ना ह, बाकिर ओहमें साहित्यिकता के अभाव नइखे। काहें कि ओकर संरचना शिष्ट साहित्य से प्रभावित होत रहल ह। मानव मन एक्के ह, उ चाहे लोक के रचना करे भा शिष्ट के, ओकरा में संवेदना हर स्तर पर मिली। एही से कहल गइल बा कि ‘गीत मनुष्य के सोभाव ह’।”
भोजपुरी लोकगीतन के एह रूप-सरूप के भोजपुरी संस्कृति के आत्मा कहल जाला। सोहर, कजरी, बिरहा, चैता, फगुआ, झूमर, खेलौना, बारहमासा, विवाह गीत, श्रम गीत, ऋतुगीत आ निर्गुन जइसन गीत जिनगी के हर अवसर पर गावल जाला। एह गीतन में प्रेम, विरह, भक्ति, प्रकृति, सामाजिक संबंधन आ संवेदना के सुघर चित्रण मिलेला।
परब-त्योहार भोजपुरिया लोक संस्कृति के पहचान ह। छठ पूजा, होली, दिवाली, रामनवमी, नाग पंचमी, तीज, जिउतिया, सकरात बड़ सरधा का संगे मनावल जाला, जवना के ओह अवसर पर गावे जाये वाली गीतन में देखल जा सके ला। भोजपुरी लोकगीतन में नीक-जबून के लेके एगो हिगरावे वाली दीठी लोक संस्कृति के रेखाचित्र उकेरत देखाई देले। लोक संस्कृति के सरबस बखान लोकगीतन के हकीकत बा। ई त सभेके मालूम बा कि आदमी अपना भीतरी या बाहरी संसार में परिष्कार करत रहेला। परिमार्जन आ विकास के ई समूची रीति संस्कृति के अंग बा, जवना के झलक भोजपुरी लोकगीतन में सहज उपलब्ध बा। एकरा चलते पढ़निहार, गवनिहार आ सुनेवाला लोग भाव विभोर हो जाला।
डॉ. सुमन सिंह लोकगीतन के परिभाषित करत ‘आखर आखर गीत’ के भूमिका में कहले बानी कि “बूढ़-ठूँठ होत गाँव-घर में जब-जब केहू आपन भुलाइल-बिसरल लर-जर खोजे जाई त कई-कई गो पुरान-धुरान गीत कवनों कोने-अँतरे में तलफत पाई। जनम से लेके मरन तक गवाइल इ कुल परम्परागत नेति-नेम भर ना ह बलुक एगो महीन नेह-नाता ह, आजी-बाबा, फुआ, माई के मद्धिम सुर में गावल-कढ़ावल। अइसन कुल जाने केतना गीतन में आपन नेह-छोह जतावल-बतावल केतना कुल पीढ़ी जियली-जुड़इलीं। गिरहस्ती संचत-सम्हारत लइकन के लायक आ लइकिन के बियाह पर भर-भर हिक रोवलीं। लइकिन खातिर रोवलीं त रोइबे कइलीं बाकिर लइकन खातिर ढेर रोवलीं। काहें से कि बबुआ पढ़े खातिर बहरा चल गइलें।”
धीरे-धीरे गाँव के दरिद्दर छुवे लागल। लोगन के भाव-सुभाव में, मान-मरजाद में आ बात-ब्योहार में दरिद्दर पइस गइल। गवें-गवें गीत बिलाये लगनी सन। परम्परा के लोप होखे लागल। भाषा अछूत लागे लागल काहे से कि एहमें रोजी-रोटी के संभावना दूर-दूर तक ना देखात रहे। जवन अबो ओतने साँच बा, जेतना तब रहे। अतीत के जीयत आ वर्तमान के जोगावे के पहल के रूप में एहके देखs, समुझs आ बचावे के कवायद मानल जरूरी ह। नाहीं त रीति-रेवाज, धरम-संस्कार आ जीवन शैली के बिलात देर ना लागी।
बाकी का कहल जाव? आँखिन में करियठ नीन के बसेरा बा। मीत उद्गम से ओझल बा। रूप-सरूप नोनाह भीतर अस भुरकुस आ छरियाह भ गइल बा। इंजोरिया से भेंट त सपने के अधीन बा। नजर पर मतलबी परत चढ़ गइल बा। साफ बात बा कि सिद्धांत आ प्रयोग में कवनों ताल-मेल नइखे। जथारथ बदरूप बा, माने के पड़ी बाकिर सपना देखल ना छोड़ल जा सके। एहू अलम के टूटले का बाँची? ई सोच आजुके स्थिति-परिस्थिति के देखि गैरवाजिब नया बुझाले। एह सबका कारण इहो ना कि गाँवई संस्कृति में सहर के घुसपैठ, तेकरे से उपजल बिखराव, किसान आ मजदूर के बिथा, पलायन, मेहरारून के जिनगी, गरीबी आ जहालत का चलते जामल बिछोह बा। पढ़ल-लिखल नवहा लोगन के देखिके जवन सोझा देखा रहल बा, ओहके देखला का बाद अइसन सोच लाजिमी ह।
एही से कहल गइल बा कि जइसे मनई के अपने प्राणवायु के संइचल-जोगावल जरूरी होला, ओतने भाषा से जुड़ल, सउनाइल लोकगीतन के संरक्षण आ संवर्धन जरूरी बाटे। काहें से कि भोजपुरी एगो भाषा भर नइखे, बलुक ई एगो संस्कृति ह, एगो संस्कार ह, जवना के प्राणवायु भोजपुरी लोकगीत बाड़ी सन। लोकगीतन के सँजोवल, जोगावल मने भोजपुरी लोक संस्कृति के जोगावल ह।
भोजपुरी लोक संस्कृति के पइसार के बिस्तार पर दीठी डालल जाव त ई बिहार के सारन(छपरा), सिवान,गोपालगंज , भोजपुर (आरा),रोहतास (सासाराम), कैमूर (भभुआ), पूर्वी चंपारण (मोतीहारी), पश्चिमी चंपारण (बेतिया), झारखंड में डाल्टेनगंज,पलामू, गढ़वा, राची आ जमशेदपुर के कुछ हिस्सा, उत्तर प्रदेश में बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, देवरिया , मिर्जापुर , वाराणसी,भदोही,आजमगढ़ , मऊ नाथ भंजन, चंदौली, महाराजगंज ,बस्ती,सिद्धार्थ नगर तक एकर प्रभाव बाटे। एकरा इतर नेपाल के तराई,मारीसस, सूरीनाम , फ़िजी, गुयाना, युगांडा जइसन देसन में भोजपुरिया संस्कृति सुरक्षित बाटे। भोजपुरी अंचल के परम्परन के बेवहारिक आधार आ सामाजिक अवधारणा के जड़ जमीन में पेवस्त बाटे।
भोजपुरी लोक संस्कृति के जाने-समुझे खातिर कुछ खास बातन पर दीठी डालल जरूरी बा- गहना गुरिया आ पहिरावा, केस सृंगार, मनोरंजन के साधन, तीज-त्योहार, लोक कला , वास्तु कला , मूर्ति कला , साहित्य आ संगीत , भोजन , चित्रकला , सामाजिक बेवस्था, धर्म , पारिवारिक संरचना, आर्थिक जीवन , लोक विश्वास , जीवन मूल्य आ राजनीति ।
गहना-गुरिया आ पहिरावा:
गहना-गुरिया के मेहरारू लोग के धन कहल जाला। भोजपुरिया मेहरारून में कंठा, हैकल, हँसुली, मटरमाला, हार, चंद्रहार, तुलसी हार, नवलखा हार, मंगलसूत्र, काड़ा, छाड़ा, नथिया, टीका, सिरवन्नी, झूमका, बाली, टप, झाला, कंगन, चूड़ी, बरबूटा, बाजूबंद, अंगूठी, हथहरा, गोड़हरा, कमरबंद, करधनी, पेटी, पायल, पैजनी, लरी, अँगूठी, नथुनी, कनफूल, मनोरी, नकबुल्ली, चमेल, जेहल, छाप शंकर, फुलिया, गुमेद, पंचरतन, झांझ, गोड़ शंकर, फेरा, बरबूटा, छुछिया, बाजू, झबिया ,बिजाइट, बेरवा, तिरकोन, तीनपतिया, बड़हरा पहिरे के चलन बा।
भोजपुरी क्षेत्र का बियाह में मरद लोग धोती, कुर्ता आ साफा से सिर पर पगड़ी बान्हेला। बर (दुलहा) के जामा-जोरा खास पहिरावा रहे। रेशम के पातर महीन पगड़ी के मुरेठा कहल जाला । नवहा लोग मलमल के टोपी भा दुपलिया पहिरेला । जाड़ा के दिन में कनटोप लगवले लोग मिल जाई। गमछा- गमछी आ अंगोछा राखे क खास परम्परा बा। गरीब लोग मोटिया (सूती ),मरकीन, मिरजई, खादी के कुर्ता, लुंगी, पैजामा आ खड़ाऊँ, कठनई, चप्पल, चमरौधा जूता पहिरेला।
मेहरारू लोगन में पियरी पहिरे के ललक तीज तेवहार भा बियाह में जरूर भेंटा जाई। भोजपुरी समाज पियर रंग के शुभ रंग मानेला। कनिया के बियाह में एगो खास पहिरावा दियात रहे,जवना के अँचरी, मनोरी कहल जात रहे। अँचरी एगो खास तरह के ओहार रहे जवन सोना भा चाँदी के तार के कढ़ाई के काम रहे। खूब वोजनदार होत रहे। इहे हाल मनोरी के रहे। अँचरी, मनोरी के वोजन से पलिवार के समरिध होखला के पता चलत रहे। तार गोटा लागल नयनसुख भा कुसुमी रंग के लूगा, गंधकी, बसंती, सोनहुली लूगा (साड़ी) सभे के बियाह, गवना के खास अंग रहे। लइकी सभ बियाह के पहिले सलवार, फराक पहिरेली। भोजपुरिया लोग साड़ी के लूगा, पुरान साड़ी के लुगरी कहेला। ढेर गरीब मेहरारू लोग कई बेर पेवन लागल लूगा पहिरत देखा जाई। छोट बच्चन के अबो गाँती बान्हे के परम्परा बा।
भोजपुरी क्षेत्र के महिला लोग में केस (बाल) बना के राखे क प्रचलन बा। मेहरारू लोग केस बनावे ला ककही, कंघा के प्रयोग करेली। केस में फीता आ चोटी का संगे बुकवा लगावे के चलन बा। बिहउती मेहरारू लोग सेंदुर, एंगुर , टिकुली साटेली । गोदना में अपना मरद के नाव गोदवावे के पुराण समय में चलन रहे बाक़िर अब नट लोग मेहरारू लोग गोदना गोदवावेला। गोदना के सिंगार के एगो अंग मानल जाला।
खान-पान :
भोजपुरी भाषी क्षेत्र जइसे पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश), पश्चिमी बिहार (भोजपुर, सारण, सीवान गोपालगंज आदि) आ झारखंड के कुछ हिस्सा परंपरागत रूप से अपना माटी से जुड़ल, सरल आ पौष्टिक भोजन खातिर मशहूर रहल बाटे। सत्तू, लिट्टी-चोखा, ठेकुआ, चावल-दाल, पंचफोरन वाली तरकारी , मक्का-ज्वार से बनल रोटी आ उहाँ के माटी में पैदा होखे वाली तरकारी (लउवा, कोहड़ा, नेनुआ, सरपुतिया) एह क्षेत्र के खान-पान के पहचान बाटे।अगर भोजपुरिया क्षेत्र में प्रचलित खान-पान के बात कइल जाव त दाल-भात, तरकारी, अचार, चोखा, खट्टी-मीठी चटनी, कलौंजी,कतरा, बजका, साग, मोछी,बरी, फुलौरा, कढ़ी, परेह,मकुनी,भउरी,बलमुआ लिट्टी, खीर, तसमई, बखीर,सेवई, पूरी , कचौरी,भुजिया,दालपुरी, दालपीठा, गोजा पीठा, रसियाव, रेकवंच, भरुआ, पुरपुरी आ दूध-दही हर समाज में ढेर-थोर रोजमर्रा के जिनगी आ तीज-त्योहार का समय ब्योहार में रहल। आमाघद के चाउर के पीड़िया परब पर खास मांग होत रहल बा। साठा धान से चिउड़ा आ लाई बनावल जात रहल बा । साठा के चाउर के महातिम के का कहल जाव । हर बियाह में चुमावन गीत एह बाति के तसदीक करि रहल बा-
“साठी के चउरा हलरी दुबि हो,
चुमही चलेली कवन रामा धियरी
मथवा चुमिय चूमी दिहली अशीष हो,
जिया हो कवन दुलरु लाख बरिस हो।”
एही लेखा तिन्ना / तेनी के चाउर के खास महातिम बा , एकरा के झरनवा धान के चाउरो कहल जाला। बरत में लोग एह चाउर के भात खाइल शुभ मानेला।
भोजपुरी क्षेत्र के मिठाई में टिकरी, अनरसा, लेड़ुआ, लड्डू ,लकड़ा, खाझा, माठ, खझुली, फेनी, ख़ुरमा, गुड़ही दहिरउरी, जिलेबी, इमिरती, बरफी, पेड़ा, गुलाब जामुन , तिलवा, ढूंढा, सोंठौरा, ढूँढी, पियाव, लवंगलता के प्रचलन चलल चलि आ रहल बा।
संदर्भ ग्रंथ :
- कृष्णदेवउपाध्याय : भोजपुरी लोकगीत, भाग 1
- आखर आखर गीत – जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
- कृष्णदेवउपाध्याय -लोक साहित्य के भूमिका, साहित्य भवन, इलाहाबाद,
- संतोष पटेल : भोजपुरी लोक संस्कृति (जोगीरा)
- भोजपुरी लोकगीत में करुण रस- दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह
- कुछ चिंतन कुछ सुध- केशव मोहन पांडेय
- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
संपादक
भोजपुरी साहित्य सरिता