सिकुरत सिकुरत बचला मुट्ठी भर अब ना जगबा, त ओरा जइबा। पुरबुजन के नाँव हँसा जइबा॥ जे जे कांपत रहल नाँव से ओहन से अब कांपत हउवा। बीपत जब सोझा घहराइल भागत भागत हांफत हउवा॥ कतों बिलइला आ भाग परइला साँच बाति के कब पतिअइबा॥ अब … कवन डर पइसल बा भीतरी जवना से घबराइल हउवा। लालच के लत लागल तहरा बेगर बाति क घाहिल हउवा। जहाँ धरइला आ उहें छंटइला केकरा सोझा दुखड़ा गइबा॥ अब… ईरान क, का हाल छिपल बा अफगानिस्तान पुरा सफाया। दहाई में…
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जीरो माइल बा
गाँव घरे क बात करीं जनि, रिस्ता-रिस्ता घाहिल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ पुस्तैनी पेसा ना भावत कहाँ गवैया नीमन गावत गीतकार क बात करीं जनि, इहाँ जमाते जाहिल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ छोड़ि के आपन घर-गिरहस्ती बहरे हेरत फिरत हौ मस्ती मेहनत के बात करीं जनि, असकत सिरे समाइल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ ईमानदार से डर लागै मोलाजिम करतब से भागै घुसख़ोरी क बात करीं जनि उहाँ भिरी देखाइल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ जहाँ बेबस मरीज कटत हौ डागदरन में माल बटत…
Read Moreसुधि के मोटरी से कुछ-कुछ
रउवा सभे के मालूम होखबे करी कि जिनगी के जतरा लइकई से गवें गवें आगु, बढ़त, जवानी के जीयत, अधेड़पन के संवारत बुढ़ापा के काटत एक दिन अंतिम जतरा पर निकल जाला। मनई के जिनगी में ढेर पल –छिन अइसन जरूर आवेला जवना के उ जोगा के राखलों चाहेला। भा ई कहल जाव के कुछ गुजरत पल मनई के स्मृति में आपन पक्का ठेहा बना लेवेलन सन। अइसने स्मृतियन के आधार पर कवनो विषय भा बेकती पर जवन कुछ लिखल जाला, ओकरा के संस्मरण भा स्मृति आलेख कहल जाला। भा…
Read Moreअति का भला न बोलना —–
का जमाना आ गयो भाया,सभे बेगर आगा–पाछा सोच के भोंपू पर नरियाये में जरिको कोर-कसर नइखे उठा राखत। मने कतों, कबों, कुछो जबरिये फेंक रहल बा। एह ममिला में सावन से भादों दुब्बरो नइखे। सुननिहारन के कत्तई अहमके बूझ रहल बा लोग । एहनी के केहू बतावहूँ वाला नइखे कि- ‘ उ जमाना लद गइल जवना में गदहो पकौड़ी खात रहले सन। समय बदल रहल बा। सोच बदल रहल बा आ मनई उत्तर देवे क तरीको बदल रहल बाड़न। अब दोसरो लोगन के अपना काम-काज के तौर-तरीका बदले के पड़ी,…
Read Moreचैता आ चुनाव
गज़ब हाल बा भाई! एक त चइत चहचहाइल बाटे आ मन,मनई,मेहरारू संजोग वियोग के चकरी में चकरघिन्नी भइल बाड़ें, ओही में ई चुनाव के घोषणा, मने धधकत आगि में घीव डला गइल। दूनों ओर जी हजूरी के तड़का, अब उ नीमन लागे भा बाउर। जिये के दूनों के पड़ी, मन से भा बेमन से। जब लोग बाग खेती-किसानी से दूरी बनावे लागल बा, त ओहमें ई राँड रोवने नु कहाई कि अब ढोलक के थाप आ झाल के झंकार सुनात नइखे। खेती-गिरहस्थी से थाकल लोगन खातिर फगुआ आ चइता टानिक…
Read Moreचइता गीतन पर एगो दीठी
चइता, चैता भा चैती पुरवी उत्तर प्रदेश, बिहार आ झारखंड में चइत महीना में गावल जाये वाली एगो लोकगीत भा लोक शैली हवे। चइत महीना के हिन्दू पंचांग (कैलेंडर) से हिंदू लोग पहिल महीना मानल गइल ह अउर फागुन के अंतिम महीना। भगवान राम के जनम चइत महीना में भइल रहे। कहल त इहाँ ले जाला कि चइता गावे के चलन त्रेता जुग से चालू हो गइल रहल,काहें से कि चैती भा चैता में ‘हो रामा’ के टेक का संगे गावे के चलन बाटे। एह में राम जन्म, राम सीता…
Read Moreबिलारी के भागे क सिकहर
का जमाना आ गयो भाया,अजबे खुसुर-फुसुर ससर ससर के कान के भीरी आ रहल बा आ कान बा कि अपना के बचावत फिरत बा। एह घरी के खुसुर-फुसुर सुनला पर ओठ चुपे ना रह पावेलन स। ढेर थोर उकेरही लागेलन स। एह घरी के ई उकेरलका कब गर के फांस बन जाई, एह पर एह घरी कुछो कहल मोसकिल बा। रउवा सभे जानते होखब कि इहवाँ जेकर जेकर कतरनी ढेर चलत रहल ह, सभे एह घरी मौन बरती हो गइल बा। अब काहें, ई बाति हमरा से मति पूछीं, खुदही…
Read Moreकरिखा पोतइलें
कुरसी के महूरत न भेंटइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। तब नाही बुझनी माई मोर बतिया कुरसी पठवनी दोसरा के सेतिहा बनलो भाग आगी जरी गइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। बोलिला दूसर बोला जाला दूसर सभही कहेला अब घूमी ना मूसर भदरा मोरे भागे घहरइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। सभका हुलासे दुअरो अगराइल हमरा एकहू न लगन भेंटाइल लोकतंतर के डंका पिटइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
Read Moreकौड़ी के तीन
इहवाँ कइसन साज सजल हौ कइसन बनल जमीन। हाथ घवाहिल पंचर सैकिल हथियो बजावे बीन॥ आपौ के त छूटल पसीना जेल क अजबै सीन। दक्खिन वाले पीटें छाती सगरे फेल मसीन।। लालटेन क तेल ओराइल उधो सुधो गमगीन। भर दुनिया करे हथजोरिया का रसिया का चीन॥ अब्बो झाल बजावे पपुआ हव कौड़ी के तीन । के मोदी के रोकी इहवाँ केकर अतना दीन॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
Read Moreफागुन फाग मचावै
ओढ़ि बसंती चुनरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। गम गम गमके नगरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि —– फिकिर कहाँ फागुनी रंग के बनल बनावल अंग अंग के देखत झूमत डगरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि —– चढ़ल खुमार इहाँ अनंग के दरस परस आ साथ संग के मातल बहलीं बयरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि —– सहज सुनावत सभ ढंग के होरी में कब भइल तंग के बहके लागल नजरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि —– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
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