रूस युक्रेन युद्ध

धरती अकास सब जरे लगल शोला बरसावल बन्द करऽ रोकऽ बिनास कऽ महायुद्ध अब आगि लगावल बन्द करऽ। अंखियन से लोहू टपक रहल बिलखे मानवता जार-जार हरियर फुलवारी दहक रहल धधकत बा मौसम खुशगवार अबहूं से आल्हर तितलिन कऽ तूं पांख जरावल ‌ बन्द करऽ । बनला में जेके बरिस लगल हो गइल निमिष में राख-राख भटकेलन बेबस बदहवास बेघर हो-होके लाख-लाख अबहीं कुछ जिनगी बांचल बा तूं जहर बुझावल बन्द करऽ। निकली न युद्ध से शांति पाठ ना हल होई कवनो सवाल धरती परती अस हो जाई भटकी ज़िनगी…

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मामा के सपना, उनकर सुख आ बिछोह

जितेंद्र कुमार हिंदी आ भोजपुरी दूनो भाषा में कविता, कहानी, समीक्षा आ संस्मरण लिखेलन। जितेंद्र कुमार के हिंदी आ भोजपुरी के कुछ किताबो छपल बा, जेकर चर्चा लोग करत रहेला। जितेंद्र जी के भोजपुरी कहानी के एगो किताब ह ‘गुलाब के कांट’। ओह में एगो कहानी बा ‘कलिकाल’। ‘कलिकाल’ के बारे में लोक में अनेक रकम के बात चलत रहेला। कुछ लोग ‘कलयुग’ कहेला। कुछ लोग ‘कलऊ’ कहेला। जब नीति-अनीति के बात होला, झगड़ा के, झंझट के, भाई-भाई के बीच विभेद के, रसम-रेवाज के टुटला के, त लोग कहेला कि…

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मोथा आ मूंज के जिद आ धार के गजल

भोजपुरी के कवि शशि प्रेमदेव के दूगो गजल भोजपुरी के पत्रिका ‘पाती’ के अलग अलग अंक में जब पढ़लीं त ई महसूस भइल कि एह कवि के ठीक से पढ़े के चाहीं। ई कवि आज के समय के कटु सत्य के अपना गीत- गजल के विषय बना रहल बा। ऊ समय के सांच के कहे में नइखे हिचकत। सांच कहल आज कतना कठिन भ गइल बा, ई हमनी के बूझ- समुझ रहल बानी जा। हमनी के जाने के चाहीं कि हर थाना में चकुदार (चौकीदार) होलें। उनकर काम रहत रहे…

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टिकुरी से बहावल अंखिए बर रहल बा

रामजियावन दास बावला के एगो गीत राह चलते इयाद आवेला आ मन ओह गीत के गुनगुनाए लागेला। ऊ गीत ह -” हरियर बनवा कटाला हो कुछ कहलो ना जाला।” आगे के लाइन ह -” दिनवा अजब चनराला हो, कुछ कहलो ना जाला। ” हरियर बन के कटाइल एगो मामिला बा जवन रोज देखे में आवत बा। रोज हरियर गांछ -बिरिछ विकास के नांव प कटा रहल बा। बन उजड़ रहल बा। जंगल प माफिया आ कॉरपोरेट जगत के दबाव बढ़त जा रहल बा। ई सब हो रहल बा आ बावला…

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गीत

माई-बाबू से ना बढ़ि के देवता पितर हवें हो इहे हवें सोना चानी ऊ त पीतर हवें हो ! माई के अँचरा सरगवा के सुखवा बबुआ खातिर ऊ सहेली सभ दुखवा सभ तिरिथन से बढ़ि के पवित्तर हवें हो ! बाबूजी त सपनो में राखेलें आकाश में सुखवा जुटावे सभ भुखियो पियास में इहे देलें छत्तरछाया ऊ त भीतर हवें हो ! धरती से बढ़ि के ह माई के धीरज बाबूजी चाहेलें बबुआ बने हमार नीरज ईहे जिनिगी के दाता ईहे मित्तर हवें हो ! देवता ई अइसन कि कुछुओ…

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उतार गइल मुँहवा क पानी

करिया करम बीखि बानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   कतनों नचवला आपन पुतरिया लाजो न बाचल अपने दुअरिया नसला इजत खानदानी । उतार गइल मुँहवा क पानी॥   झुठिया भौकाल कतनों बनवला बदले में लाते मुक्का पवला मेटी न टाँका निसानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   साँच के बचवा साँचे जाना नीक आ नेवर अबो पहिचाना फेरु न लवटी जवानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   अब जे केहुके आँख देखइबा ओकरा सोझा खुदे सरमइबा कइसे के कटबा चानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 31/03/2022…

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गाँव आ गँवई नारी के हालत क पोढ़ लेखा-जोखा- “के हवन लछुमन मास्टर”

यथार्थ के खुरदुरा जमीन पर आम आदमी के जूझत जिनगी के जियतार बखान लीहले भोजपुरी के सुप्रसिद्ध कथाकार श्री कृष्ण कुमार जी के भोजपुरी क पहिलका उपन्यास आजु के समाज के आधी आबादी जेकर चरचा हर ओरी बा, बेटी पढ़ावों, बेटी बचाओ, के नारा लग रहल बा, “के हवन लछुमन मास्टर” के रूप मे हमनी सभे के सोझा बा । उपन्यास आपन शिल्पगत विशेषता आउर तथ्य आ कथ्य के संगे जिनगी के जवन ब्याख्या देवेला, उ जियतार होला आ समाज खाति एगो अन्हरिया मे टिमटिमात दियरी लेखा सहारा बनेला। ई…

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बाउर बातिन का बिरोध से बेसी जरूरत बा नीमन बाति के लमहर परम्परा बनावे के !

हम विषय पर आपन बात राखे का पहिले रउवा सभे के सोझा 3-4 बरिस पहिले के कुछ बात राखल चाहत बानी। 20-22 करोड़ कथित भोजपुरी भाषा भाषियन का बीच 3-4 गो पत्रिका उहो त्रमासिक भा छमाही निकलत  रहनी स। ओह समय भोजपुरी के नेही-छोही रचनाकार लोगन का सोझा भा भोजपुरी के नवहा रचनाकार लोगन के सोझा ढेर सकेता रहे। ओह घरी 3-4 गो जुनूनी लोगन का चलते भोजपुरी साहित्य सरिता के जनम भइल। एकरा पाछे एगो विचार रहे कि भोजपुरी के नवहा लिखनिहार लोगन के जगह दीहल जाव, पुरान लोगन…

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बलम परधानी लड़ाके

खा गइल बचल – खुचल पानी बलम परधानी लड़ाके। एक भइल संझिया बिहानी बलम परधानी लड़ाके।। नइहर से अइनी त दुल्हिन कहइनी भुइयां ना डेग हम दुउरे में धइनी । आज सँउसे गँउवे के रानी बलम परधानी लड़ाके…. कहेला लोग दिन तिरिया के आइल मरद – मेहरारु बराबर कहाइल। अब तु ही अगोरिहs चुल्हानी बलम परधानी लड़ाके… खा गइल बचल – खुचल पानी बलम परधानी लड़ाके… भसुरा आ देवरा बराबर बुझाला ओटवा बड़ावे ऊ संघे – संघे जाला। अगराइल पेन्ट – मरदानी बलम परधानी लड़ाके…. खा गइल बचल – खुचल…

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तमासा घुस के देखै

लख लतखोर कहाय, तमासा घुस के देखै॥ सौ सौ जुत्ते खाय, तमासा घुस के देखै॥   इनका उनुका बहकावे में नाटो क खिचड़ी पकावे में जेलस्की इतराय, तमासा घुस के देखै॥   गावत फिरत देस के गीत संहत  छोड़ि परइलें मीत बइडेनवा मुसकाय, तमासा घुस के देखै॥   बरसे लगल रसियन मिसाइल खड़हर सहर मनई बा घाहिल खूनम खून नहाय, तमासा घुस के देखै॥   मानवता के नारा कइसन नैतिकता क पहाड़ा जइसन कबौं बदल ऊ जाय, तमासा घुस के देखै॥   के बा नीक, नेवर के बा फयदा केकरा…

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