बदल रहल सामाजिक मूल्यन के बीच बेकतीगत महत्वाकांक्षा खातिर संघर्ष के आईना:”जुगेसर”

‘जुगेसर’ जइसन कि उपन्यास के नाम बा,युग+ईश्वर =योगेश्वर के आम बोलचाल में भोजपुरी के सब्द के अर्थ स्पष्ट कर रहल बा यानी युगेश्वर ‘जुगेसर’ के रूप में भोजपुरी में स्वीकृत आ प्रयुक्त सब्द बा। ई कहे में हमरा इचको ना संकोच हो रहल बाटे कि उपन्यासकार श्री हरेंद्र कुमार ‘जुगेसर ‘सब्द के चुनाव कर के कहीं-न-कहीं समाज में आगे चलेवाला जुग प्रवर्तक के रूप में बदल रहल जनजीवन आउर सोच-विचार के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उदाहरण के रूप में धरातल पर ले आ के रखे के अक्षुण्ण प्रयास बा।एह नाम से…

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गीत

रूठल रूठल बदरवा मनाई कइसे। गाई रगिया मल्हरवा सुनाई कइसे ।।   उत्तर में बदरा हाथ जोड़ी लिहले, पछुवा बेयरिया गजब कई दिहले, भारी गरमी से जियरा जियाई कइसे ।।रूठल…..   आजु रथ जतरा में रथवा खिंचाइल, कुछ कुछ बदरिया अकासे रहल छाइल, इचिको बरसल ना बदरा नहाई कइसे ।।रूठल…..   रउवा त ठीक भइली पीही कढवा, लुहिया सहत पूरा बीतल अषढ़वा, अब जिनगी के रथवा खिंचाई कइसे ।।रूठल……   बाबा जगन्नाथ भेजी पूरब से पनियां, ‘लाल’ रोवे घरवा रोवत बानी धनियां, राउर भगतन के दुखड़ा बताई कइसे ।।रूठल……  …

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बदरिया बरसे

आइल बा बरसात संवरिया बदरिया बरसे गाँवे गाँव।   धानन के खेतन में बाजे रुन झुन पाँवें पाँव। बदरिया बरसे…   झूमत झुरकल बा पुरवइया कउवो कांवे कांव। बदरिया बरसे…   बंसवरिया में बंसुरी के धुन चर मर छाँवे छाँव। बदरिया बरसे…   पीपर पात मगन मन डोले बदरो धूप आ छाँव। बदरिया बरसे…   साँझ सुहानी मनवा मोहे चुरमुन चांवे चांव। बदरिया बरसे…   मूल रचना- हीरा लाल द्विवेदी भोजपुरी भावानुवाद – जे पी द्विवेदी    

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बात बनउवल

दुनियाँ में हम सबसे अउवल कविता हउवे बात बनउवल।   गढ़ीं भले कवनों परिभाषा मंच ओर तिकवत भरि आशा गोल गिरोह भइया दद्दा साँझ खानि के पूरे अध्धा। कबों कबों त मूड़ फोरउवल। कविता हउवे…..   कवि के कविता, कविता के कवि उनुके खाति कबों उपमा रवि अब त ज़ोर जोगाड़ू बाटै पग पूजी  के चानी काटै। कबों कबों के गाल बजउवल। कविता हउवे…..   कुछ के चक्कर भारी चक्कर ज्ञान कला के लूटत जमकर बोअल जोतल खेती अनके बेगर लाज खड़ा बा तनके कबों कबों के टांग खिंचउवल। कविता…

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गीत

बिख उगे घमवा अषाढ़ महीनवां में, बरखा के आस नाहीं सुरुज धिकाइल बा। पोखरी तलइया में नीर नाहीं नदी सूखि, त्राहिमाम सगरो धरतिया सुखाइल बा। झन-झन झिंगुरा झनकि दुपहरिया में, पेड़वा क पतवा मुरुझि लरुआइल बा। दुबुकल चिरइया खतोंगवा में छांह खोजि, बचवन के सँगवा पियासल पटाइल बा। धनि-धनि बदरा ना लउके सपनवों में, पपीहा वियोग जरें गर रून्हिआइल बा। केकरा अंजोरवा तूं अइबा बदरवा हो, जुगुनू के बत्तिया पसेनवा बुताइल बा। हेरें असमनवां में चान के अंजोरिया हो, खेतिया किसनिया के बेला इहे आइल बा। मेझुका मिलन बाट जोहेलीं…

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एगो पौराणिक उपन्यास ‘तारक’

            सद्य प्रकाशित आदरणीय अग्रज ‘मार्कन्डेय शारदेय’ जी के पौराणिक उपन्यास सर्वभाषा प्रकाशन से भोजपुरी साहित्य जगत के सोझा आइल ह। ई कृति शारदेय जी के जीवंत लेखनी से प्रत्याभूत त बड़ले बा, संगही उहाँ के एह कृति के भोजपुरी के पुरोधा पाण्डेय कपिल जी के समर्पित कइले बानी। जब कवनों पौराणिक कथा कहानी के उपन्यास विधा में पिरोवल जाला, त उ सोभाविक विस्तार लेत कबों यथार्थ के धरातल आ कबों काल्पनिक धरातल पर समभाव से आगु बढ़त देखाला। एह घरी के हिन्दू समाज के सभेले कमजोर नस मने ‘अपने…

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भोजपुरी भाषा आ साहित्य : एक नजर

जवना माध्यम से अपना विचार के लेन-देन होला, उहे भाषा ह। भारत में पैशाची,संस्कृत , पाली, प्राकृत आ अपभ्रंश के संगे-संगे चलत भोजपुरी हजारन बरिस पुरान भासा हS। प्राकृत आ अपभ्रंश से 12 वीं सदी आवत-आवत असमिया,बंगला,उड़िया, मैथिली,मगही,आ भोजपुरी के अलगा-अलगा रूप निखरल। – उनइसवीं सदी का अंतिम चरन में भाषा के भोजपुरी नाँव मिलल। – 1789 ई0 में काशी के राजा चेत सिंह के सिपाहियन के बोली के भोजपुरी  नाँव से उल्लेख भइल बाटे। – सन् 1868 ई0 में जान बीम्स आपन एगो लेख ‘रायल एसियाटिक  सोसाइटी’ में पढ़ले…

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एक सुझाव गीत

धरती के सिंगार बिरना आवा सजावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के बचावा हो।। हरे हरे पेड़ होइहैं फैली हरियाली, हरषी सिवान देखि पूरब के लाली, उसर के नाम अब जग से मिटावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के…… सुंदर समाज बनी शुद्ध होई पानी, ताजी हवा से मिली मन के रवानी, एसी में सोवल जे बा उनके जगावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के …… ओजोन चादर में छेद भइलैं भारी, कहियो ज फाटी चादर फैली बीमारी, “लाल” के बिचार भइया टोगें गठियावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के…….…

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पूरबी

पियवा के सुधिया सतावे भरि रतिया साँवर गोरिया रे। तलफत सेजरिया पर जाय।   सेही सेजरिया सपनवाँ ना भावे साँवर गोरिया रे। सोचि सोचि बतिया लोराय।   कवने कारन पिया छोड़लें बेगनवाँ साँवर गोरिया रे। क़िसमत के कोसी पछताय।   जेपी के कहना बा ठाना ठनगनवाँ साँवर गोरिया रे। आपन पियवा लेहु न बोलाय।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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गुलबिया हो

ना हमरा से नेह छोह ना रउरा से प्यार बा। फेरु गुलबिया हो, केकरा लग्गे सरकार बा।   बुद्धू बकसवा में बइठ टर्राने केकरा खातिर पूछेलें फलाने केकरा साथ संगत के उनुका दरकार बा। गुलबिया हो……   केकरे ओठवा के नमी झुराइल बाति के सुनगुन से के बउराइल केहो छान-पगहा लिहले करत गोहार बा । गुलबिया हो……   अचके में आजु मार पड़ल अइसे करके भितरघउवा सुसुकीं कइसे अइसन दरद जवन कहलो बेकार बा। गुलबिया हो……   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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