सुघर भूमि भारत

जहवाँ माई अँगने सुगना दुलारत सुघर भूमि भारत।   तीन ओरियाँ सिंधु, एक ओर ह हिमालय कन-कन में राम, गाँव-गाँव में शिवालय उहवें के ऊंच भाल दुनियाँ निहारत सुघर भूमि भारत।   मसजिद अजान, गुरुद्वारे गुरु बानी चर्च में बा प्रार्थना, बनता कहानी दुसुमन के दीठी पठावेला गारत सुघर भूमि भारत।   भोरहीं से पवना के जहवाँ मलय राग उहवें भेंटाला कामिनी के बिरह आग सुघरई के कामदेव उहें उघारत सुघर भूमि भारत।   गंगा जमुना नर्मदा अपने रवानी उर्वर भूमि खातिर खूब देलीं पानी अन्न उपजाई धरा सभे के…

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डा अमिता दुबे सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान –2023 से सम्मानित

प्रो रामदरश मिश्र उनके कृतित्व के भूरि – भूरि सराहना कइलें। • नई दिल्ली, 11 सितंबर, 2023. हिंदी के सुपरिचित कवयित्री कथाकार आलोचक डा अमिता दुबे के सर्वभाषा ट्रस्ट का ओर से सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित कइल गइल। ई सम्मान ट्रस्ट का ओर से प्रोफेसर रामदरश मिश्र अपना आवास पर भइल एगो सादा समारोह में प्रदान कइलें। डा अमिता दुबे के उहाँ के शॉल से विभूषित करत सम्मान प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र भेंट कइलें।एह अवसर पर हिंदी के समालोचक कवि डा ओम निश्चल, सुपरिचित लेखिका आ दिल्ली…

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अगिन बरिसे

सावनों में दंवके सिवनवाँ अँगनवाँ मोरे, अगिन बरिसे। नीलहा अकसवा के बदरा रिगावे दिनवाँ में देहियाँ के लवरि जरावे सुसकेला खेतवा किसनवाँ अँगनवां ——– बिंयड़ा में धनवा क बियओ झुराइल पहिले जे रोपल,रोपलो मरुआइल बिरथा बा असवों रोपनवाँ अँगनवां————- कइसे कहीं अब हुंड़रा के धवरल रसते में गोजर बिच्छी के पँवरल फुँफकारे किरवा क फनवाँ अँगनवां ——–   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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लोकउकितन में खेती के बात

भारतीय सभ्यता में जीव के उत्पत्ति, बढ़वार आ विलयके सिलसिला में अन्न के अहमियत के पहचान असलियत के अनुभव के आधार प बा । तैत्तिरीयोपनिषद्(आनन्दवल्ली, दूसरा अनुवाक्) के कथन ह कि पृथिवी के आसरे जतिना जीव बाड़न ऊ अन्ने से पैदा होले, जीएले आ अंत में ओही में बिला जाले- “अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीं श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः ।”अन्नके उपज में बढ़ोतरी खेती के बेहतर प्रबंध के जरियहीं संभव ह ए से भारतीय सभ्यता में खेती के बहुत अधिक प्रमुखता दीहल गइल ।…

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जिनिगी गांव के : रोज जीए-मूवे वाला सुभाव के

–भगवती प्रसाद द्विवेदी   बाबू! रउआं परदेसी हईं नू? जरूर देश भा सूबा के राजधानी में राउर दउलतखाना होई। बइठीं हमरा एह टुटही खटिया पर भा ओह मचान पर। कहीं, हम अपने के का सेवा करीं?–हम भला राउर का खातिरदारी कऽ सकेलीं साहेब! पहिले हाथ-मुंह धोईं आ लीहीं हई गुर के भेली,साथ में एक लोटा इनार के शीतल जल। जे हमरा दुआर-दरवाजा प आवेला, बस हम इहे सभका खातिर लेके हाथ जोड़िके हाजिर रहेलीं। हं,अब रउआं इतमीनान से बतिआईं।   रउरा देह पर हई उज्जर धप्-धप् खादी के लिबास। कान्ह…

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खेती-बारी : बेद से लबेद तक

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल भारत एगो खेती-बारी करेवाला देश हटे। भारत का आबादी के एगो बड़हन हिस्सा आपन गुजारा खेती से करेला। एही से भारत में खेती-बारी के भोजन का देवता के दरजा दिहल जाला। साँच त ई बा कि भारत में रामायण आ महाभारत का पहिलहीं से खेती के काम हो रहल बा। लोग खेत जोतत रहे आ ओहमें अनाज, सब्जी आदि के खेती करत रहे। कुछ लोग खेती का सङे-सङे गाइयो  पालत रहलन। देखल जाउ त आजुओ भारत के अधिकांश परब खेतिए बारी से जुड़ल बा। संसार के…

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भोजपुरी के किसानी कविता

भोजपुरी के  किसानी कविता पर लिखे के शुरुआत कहाँ से होखी-ई तय कइल बहुत कठिन नइखे।भोजपुरी के आदिकवि जब कबीर के मान लिहल गइल बा त उनकर सबसे प्रचलित पाँति के धेयान राखलो जरूरी बा ।ऊ लिखले बाड़ें-“मसि कागद छूयो नहीं कलम गह्यो नहिं हाथ।” मतलब भोजपुरी के आदिकवि कलमजीवी ना रहलें।ऊ कुदालजीवी रहलें।हसुआ-हथौड़ाजीवी रहलें।झीनी-झीनी  चदरिया बीनेवाला बुनकर रहलें।मेहनत आ श्रमे उनकर पूँजी रहे जेकरा जरिये ऊ आपन जीवन-बसर करत रहलें। भोजपुरी में रोपनी-सोहनी के लोकगीतन से लेके आउरो सब संस्कार गीतन में श्रम के महिमा के बखान बा।रोपनी गीतन…

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खेतिहर अजुवो जस के तस बा —-

‘खेती बाढ़S अपने करमे’, ‘आगे खेती आगे-आगे, पाछे खेती भागे जोगे’ जइसन कतने कहाउतन से भोजपुरिया लोक गह गह बाटे। बाक़िर कतों न कतों ई कुल्हि कहाउत कई गो बातिन के खुलासा करे क समरथ रखले बाड़ी स। पहिल बात ई कि भोजपुरिया समाज के अर्थव्यवस्था के रीढ़ खेती-किसानी आ पशुपालने रहल बा। कवनो दौर के भोजपुरी लोक साहित्य होखे भा भोजपुरी भाषा साहित्य संत आ कवि लोग खेती-बारी पर जनता के जगावे आ उनुका तकलीफ बतावे में कबों कोताही नइखे कइले। बाबा कबीर के समय से भोजपुरी कविताई में…

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गीत

झऊँसत बा देंहि सगरो झऊँसत बा मनवाँ करीं त का करीं। जरे धरती असमनवाँ सजनवा का करीं ।। गुम सुम भइल नाहीं बहेला पवनवाँ। छितरी प छितरी छूटे उग बुग मनवाँ।। बेनिया डोलावत चुनुकल हाथे के कङनवाँ सजनवा का करीं ।। दिनवाँ कटेला कइसो कटे नाहीं रतिया। अन्हारे धुन्हारे होला बहुते ससतिया।। छतवा तवेला अउसे घरवा अङनवाँ सजनवा का करीं।। धान के बेहन सूखल, खेत ना जोताइल। होला धूरिबावग लोग बाटे अगुताइल।। परल छितराह बहुते मिलें नाहीं जनवाँ सजनवा का करीं।। माया शर्मा, पंचदेवरी, गोपालगंज (बिहार)

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कजरी

अबके बाँव न जाई सावन साँवरिया बदरिया भले कतिनो बरिसे।   चाहे झिर झिर परिहें बूनी भीजे डहुंगी तर के चूनी सजना जाई उहवें देखि भरि नजरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   चाहे कउंचे साँवर गोरी इचिको तके न हमरे ओरी अइबै ओढ़ावे बदै धानी चुनरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   भउजी टुप टुप ताना मरिहें भलहीं कोसिस निफल करिहें अबके मिली उनुके सुनइबै कजरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   भले कंठ रही अनबोलले रयनि बैरिन पट के खोलले अबके साजन गोरी भेटी अंकवरिया । बदरिया भले कतिनो बरिसे।  …

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