सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन ।।
मारीसस में “गिरमिटिया” पीड़ा, संघर्ष आ अस्मिता के जवन इतिहास हौ, उ ओकरा के गीत, कविता आ भावनात्मक अभिव्यक्ति में ढाल के अमर कर देहलन ।।
“गिरमिटिया आत्मा के आवाज़ रहलन ब्रजेंद्र मधुकर भगत”
हिंद महासागर में एगो मोती जइसन द्वीप हौ – मारीसस – जहवाँ भारत के माटी से मजूरी बदे गइल हजारन गिरमिटिया मजदूर आपन खून पसीना से एगो नई दुनिया बसवलन । ऊ पीड़ा, ऊ विरह, ऊ संघर्ष – सभे कुछ जीवंत हो जाला जब हम ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के कविता लोक के पढ़िलां,सुनीलां ।
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के रचनालोक में सिरिफ सबद ही ना, बल्लुक एगो भावुक इतिहास बोलेला । ओनके हर गीत में पानी के जहाज़, कुली घाट के घोर सन्नाटा, ईंखन के खेतन में बहत खून पसीना आ जीऊ में पलत भारत के इयाद समाइल हौ । उ गिरमिटिया सभ्यता के परसिद्ध इतिहासकार भी रहलें आ संवेदना से भरल गवैया भी ।ओह जमाना में जब गिरमिटिया मजदूर लोगन के आवाज कहीं सुनाई ना देत रहल, तब ब्रजेंद्र मधुकर भगत के कलम ओह आवाज़ के पहचान बन गयल । उ लिखलें ना, बल्कि जीयलें – हर पीड़ा, हर आंसू, हर उम्मीद के ।
ओनके कवितावन में मातृभूमि के ममता, परदेश के पीड़ा आ संघर्ष के गरिमा एक साथ झलकेला ।
चंद बानगी देखीं –
“हम ना झुकब कबहूं, चाहे जुलुम होवे हजार,
माटी के सपूत हईं, राखब देस के लाज अपार …
”माई के अंचरा, माटी के सुगंध,
सपना में आजो आवे, बसल बा ओहि गंध…”
“मातृभूमि छूटल बिछुड़ल देस हमार, अंँखिया में नीर भरल,
सागर पार आ अइनी, किस्मत हमार फूटल…”
”दिन भर काटीं गन्ना, रात में नींद ना आवे,
मालिक के डाँट सुनी, करेजा रो-रो जावे…”
“हम भले भारत देस से दूर बानी, लेकिन आत्मा से भारत हमार भीतर आजुवो जिंदा हौ ।”
इ सभे गीतन के आजुवो जबहुं कवनो भारतीय आ परवासी भारतीय सुनेला त जीयरा लोर भर जावेला ।
ओनके गीतन में भारत के राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त जी के अइसन झलक दिखेला कि ओनके मारीसस देस के मैथिलीशरण गुप्त कहल जाला आ मारीसस के राष्ट्र कवि के दरजा ओनहे मिलल हौ ।
भोजपुरी आ हिंदी दुनों में ओनके रचना लोक परसिद्ध रहल ।ऊ अंग्रेजी,क्रियोली आ फ्रेंच भासा के भी विद्वान रहलन आ मारीसस के प्रतिष्ठित समाचार पत्र मारीसस टाइम्स में नियमित लेखन करत रहलन। ओनकर भोजपुरी, हिंदी के रचना रोमन लिपि में रहत रहल ।काहें से मारीसस में देवनागरी लिपि समझे वाला लोग तब ना रहलन, अपवाद छोड़ के ।
🎶 गिरमिटिया गीतन के झलक –
राष्ट्र कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के गीतन में खासतौर पे गिरमिटिया जिनगी के जथार्थ देखे के मिलेला । कुछ प्रमुख भावधारा आ नमूना लखीं –
- बिरह आ पीड़ा –
“कलकत्ता से छूटल नाव, अंखियांँ में नीर भरल,
माई के अंचरा छूटल, दिलवा होअत अधीर जरल…”
👉 एह गीत में घर-परिवार छोड़ के परदेस जावे के दुःख दरद गहराई से उभरेला ।
- संघर्ष आ श्रम(मेहनत मजदूरी)-
“ईंख के खेत में हमार खून पसीना बहेला,
धरती पे हमार मेहनत मजूरी के फूल
खिलेला…”
👉 मजदूर जीवन के कठिनाई आ श्रम के महिमा के चित्रण ।
- पहचान आ अस्मिता –
“हम भारत के संतान हईं, भुलाए ना जाई आपन जड़ के सुगंध,
परदेस में भी जीवित हौ, आपन माटी के सोनाहट भरल गंध …”
👉 आपन जड़ से जुड़ल गौरव के भाव केहू के भी भावुक कर देई ।
- आस आ नवका निर्माण –
“नव बिहान आई, दुःख के बदरी छंट जाई,
मेहनत के रंग से, नई दुनिया फेर बस जाई…”
रचना लोक –
ओनके कुछ सृजित पुस्तकन के नाम
अइसन रहे –
मधुपर्क,
मधुकलश,
मधुबहार,
मधुलिका,
वीरगाथा,
रागिनी,
रस रंग,
रणभेरी,
बंदेमातरम,
स्वतंत्रता का सुप्रभात,
मधु गुंजार (या गुंजन)
अमर संदेश,
एक कहानी कुली की (लमहर कविता, जेहमें प्रवासन आ गिरमिटिया जीवन के चित्रण हौ ) ।
एकर अलावां तमाम अन्य किताबन में भी एनके रचना लोक समाहित हौ ।इ सभे साहित्यिक लोक के अनमोल वैश्विक धरोहर भी हौ ।
🌼 सार संक्षेप –
मारीसस के राष्ट्र कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के साहित्य जगत फकत कविता ना, बल्लुक एगो जीवित दस्तावेज हौ – गिरमिटिया इतिहास के, भारतीय अस्मिता के, आ मानव धैर्य के । ओनके रचना लोक से हम जानीलां कि पीड़ा के बीचो-बीच भी संस्कृति के दीयना आ उम्मीद कइसे जलावल जाला ।
उ मारीसस में भोजपुरी भासा,हिंदी आ भारतीय संस्कृति के अइसन जाज्वल्यमान दीपक आ संवाहक रहलन, जवन आजुओ उजाला देहत हौ ।
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत मारीसस के चंद अइसन रचनाकारन में गिनल जावेलन, जेनकर साहित्य सिरजन गिरमिटिया इतिहास, भोजपुरी अस्मिता आ भारतीय सांस्कृतिक चेतना के एक साथ अभिव्यक्त करे वाला जीवंत दस्तावेज बन गयल हौ । ओनके लेखन में कविता, गीत, लोकधर्मी अभिव्यक्ति आ सांस्कृतिक पुनर्जागरण—सभे एक साथ बहेला ।
✍️ रचनात्मक स्वरूप आ विधा –
- गिरमिटिया काव्य-धारा-
मधुकर भगत के सभसे प्रमुख पहचान ओनके गिरमिटिया गीत आ आजादी के कविता हईं । ई रचना Indentured Labour System के दर्दनाक इतिहास के मानवीय स्वर देहत बाड़ीं ।
जहाज़ जातरा (कलकत्ता से मारीसस तक के),
कुली घाट के त्रासदी,
ईंख खेतन में खटनी खटाई,
ज्वालामुखी पहाड़ी के तुर समतल करल आ खेती जोग्य बनावल,
परदेस में पहचान के संघर्ष जातरा ।
ई सभे ओनके काव्य जगत के मुख्य बिसय रहलन ।जे मन के छू लेवें ।
- भोजपुरी लोकधर्मी गीत –
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत भोजपुरी के माटी से गहिर जुड़ल रहलन । ओनके गीतन में कजरी, बिरहा, सोहर, फगुआ जइसन लोकछंदन के प्रभाव साफ दिखेला ।
भासा सहज, भाव गहन आ
लोकजीवन के सजीव चित्रण,
सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षक रुप में ओनके अतुलनीय जोगदान हौ ।
ऊ मारीसस में भोजपुरी के जीवित रखे में बहोत सकारात्मक जोगदान देहले रहलन ।
- देसपरेम आ सांस्कृतिक चेतना-
ओनकर कई रचना भारतीय मूल के लोगन में आपन जड़ से जुड़ल रहे के प्रेरणा देवेला ।
भारत के प्रति परेम, आ मारीसस में नई पहचान के निर्माण—ई द्वंद्व
ओनके लेखन के खासियत रहे ।
- मानवीय संवेदना आ तत्वज्ञान –
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत खाली इतिहास ना लिखलें, बल्कि मनई के भीतर के पीड़ा, संघर्ष आ आस के तात्विक रूप में भी देखेलन ।
जीवन के अस्थिरता,
श्रम के गरिमा,
जिनगानी के संघर्ष में सौंदर्यबोध भी ओनकर गीतन में दिखेला ।
📚 प्रमुख रचनात्मक पहलु –
🌿 1. सरलता में गहराई
ओनकर भासा कठिन ना, लेकिन भाव बहुत गहिर । आम आदमी के बोली में असाधारण अनुभूति रहे ।
🌿 2. इतिहास आ भावना के संगम
गिरमिटिया जीवन के तथ्य आ भावना—दुनो के नीमन संतुलन रहे ।
ना सूखल इतिहास, ना खाली भावुकता रहे—बल्लुक सजीव जिनगी के कटु अनुभव रहे ।
🌿 3. संगीतात्मकता-
गीतन में लय, ताल आ गेयता—जवन ओनके रचना के जन-जन तक पहुँचावे में बहुत सहायक बनल ।
🌿4.देस लोक से संसार लोक तक-
स्थानीय भोजपुरी जीवन से उठ के ओनकर रचना मानवता के व्यापक संदर्भ तक पहुँच गयल आ जगव्यापी हो गयल रहे ।
🎶 प्रमुख गिरमिटिया गीतन के भावात्मक मंथन –
- “कलकत्ता से छूटल जहाज” (प्रवास के करुण गाथा)
ई तरह के गीतन में गिरमिटिया मजदूरन के सभसे पहिला अनुभव—बियोग—दिखेला ।
👉 भाव-
घर-परिवार से बिछोह के पीड़ा, जवन आजीवन टीस बन के रह जाला ।
- “कुली घाट के सन्नाटा” (जथार्थ से सामना)
जब मजदूर लोग मारीसस पहुँचलन, त ओनके सामने कठोर सच्चाई खड़ी हो गयल । ओहिंजा के अजनबी जमीन,कठोर नियम,अपमानजनक बेवहार आ दुसर धरम संस्कृति ।
👉 भाव-
आस टूटे के पीड़ा, लेकिन जीवे के जिद भी ।आपन धरम संस्कृति बचावे के जुनून भी ।
- “गन्ना के खेत” (श्रम गीतन के महाकाव्य)
ई गीत श्रम के भी पूजा बना देहल ।
👉 भाव –
दुःख के बीचो-बीच मेहनत मजदूरी करत गरिमा राखल आ आत्मसम्मान के रक्षा करल ।
- “परदेस में भारत” (पहचान के गीत)
ब्रजेंद्र मधुकर भगत के कई गीतन में आपन पुरखन के देस भारत के इयाद जिंदा रखल गयल हौ ।
गीतन में परब-तेवहार, भाषा, परंपरा,माई-बाप के इयाद आदि भरपूर दिखेला ।
👉 भाव-
देहिया परदेस में, आत्मा भारत में ।
✍️ गीतन के खासियत –
🌿 1. लोकधर्मी लय-
ओनकर गीत कजरी, बिरहा, फगुआ के लय में बहेला—जवन सुनते ही करेजा में सोझे उतर जाला।
🌿 2. चित्रात्मकता –
“अंखिया में नीर”,
“पसीना के धार”,
“समुंदर के लहर”,
ई सभे परतीक बिंब लोगन के आँख के सामने एगो अद्भुत छबि खड़ा कर देवेला ।जेहमें सभें भींज जाला ।
🌿 3. संवादात्मक ढ़ंग –
कई गीतन में लागेला जइसे कवि सीधा पाठक या आपन माई से बात करत होखस ।ई सभे मन के झकझोर देवेला ।
🌿 4. सरल बकिया मार्मिक भासा
कठिन सबद ना—सोझा हिया से निकलल भासा ।
जेहसे हर वर्ग के लोग जुड़ जाला ।
🌼 समापन –
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के रचना लोक केवल साहित्य ना, बल्लुक इतिहास के धड़कन हौ । ओनके गीतन में गिरमिटिया जीवन रोवेला, गावेला,हंसेला आ आखिरकार जीतेला ।
🎶 ब्रजेंद्र मधुकर भगत के प्रमुख गिरमिटिया गीतन के भावात्मक समीक्षा –
- “कलकत्ता से छूटल जहाज” (प्रवास के करुण गाथा)
ई तरह के गीतन में गिरमिटिया मजदूरन के सबसे पहिला अनुभव—दु:ख दरद बियोग—दिखेला ।
- “कुली घाट के सन्नाटा” (जथार्थ से सामना)-
भारत से जब सन् 1834 में जब मजदूर लोग एग्रीमेंट पे गिरमिटिया बनके मारीसस पहुँचलन, त ओनके सामने कठोर सच्चाई खड़ा हो गइल रहे । पहचान के संकट ।तब हनुमान चालीसा आ रामायन के गुटका आ भोजपुरी भासा ओनके धरम करम आ संस्कृति के एकमात्र सहारा रहे आपन धरोहर गीतन के साथ ।
- “गन्ना के खेत” (श्रम के महाकाव्य)
ई गीत श्रम के भी पूजा बना देला ।
- “परदेस में भारत” (पहचान के गीत)
राष्ट्रकवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के कई गीतन में भारत के स्मृति भरपूर जिंदा हौ ।
सनातनी परब तेवहार, भासा, परंपरा
संस्कार आ संस्कृति सरुप में ।
🎶 सृजन के प्रभाव-
राष्ट्र कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के रचना जगत के प्रभाव कई स्तर पे देखल जा सकेला—
मारीसस में भोजपुरी भासा के पुनर्जीवन, संरक्षण आ पुनः जागरण
करल,गिरमिटिया इतिहास के कुल्हि साहित्यिक पहचान के सहेजल ।
नयकी पीढ़ी में सांस्कृतिक चेतना के अलख जगावल ।
प्रवासी भारतीय साहित्य जगत के अउर समृद्ध करल ।
🌼 समापन-
ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत के साहित्यिक सृजन एगो सेतु हउअन—अतीत आ वर्तमान के बीच, भारत आ मारीसस के बीच, पीड़ा आ उम्मीद के बीच ।
ओनकर रचना लोक आजुवो ई सिखावेला कि जड़ से जुड़ल रहल ही असली पहचान हौ ।उहे आपन पुरखन के देस हिंदूस्तान हौ ।।
ओनके जन्म सन् 1916 में आ निधन सन् 2003 में भयल रहे ।
✍️डॉ.अपूर्व नारायण तिवारी ‘बनारसी बाबू’©सर्वाधिकार सुरक्षित
(लेखक ख्यात अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार,पत्रकार, संपादक, बुद्धिजीवी आ विश्व भोजपुरी संघ के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव हउअन )
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