भोजपुरी गीतन में होली वर्णन

  भोजपुरिया धरती उत्सवधर्मी  धरती ह। भोजपुरिया लोकजीवन मुख्य रूप से खेती-किसानी पर आधारित बाटे ना, त मेहनत मजदूरी पर। भोजपुरिया लोकजीवन के हर एक परब त्योहार कृषि से जुड़ल बाटे। एह त्योहारन में होली-फगुआ के त कहहीं के का बा?घर के कोठिला में घान-चाउर भरल रहेला, बघार में गेहूँ गदरात रहेला,आम-महुआ मोजरात रहेला आ सरसो पिअर रंग फुलाए लागेला,त समझीं बसंत आ गइल बा। किसान-मजदूर देख-देख हरखित होला आ बसंत पंचमी से शुरू होखे वाला होरी के उत्सव अबीर खेल के शुरू करेला आ लगभग चालीस दिन तक एह…

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भुलरू बाबा के रहस्य

गाँव में एकहि गो नाव सभकरा बतकही पर चढ़ल रहे, उ रहे भुलरू बाबा के नेकी आ दान धरम । लोग बाग कहत रहले कि ऊ साधारण मनई ना, देवता के रूप हउवन। पाँच गो भाई में तिसरका, आ चालीस बरिस के हो गइले बाकिर बिआहो ना कइले आ ऊपर से विद्वान आ दानी। गांव में बाबा के बाबू जी स्कूल खोलले रहले। बाद में पक्का बनल आ सरकार से मान्यता भी मिल गइल। प्रिंसिपल आ सीनियर मास्टर खुदे भुलरू बाबा रहले। भुलरु बाबा के जिनगी स्कूल के लइका-बच्चा से…

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फगुआ के लोक-दर्शन : राग से विराग तक

फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला। मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।” बसंत के राजसी छटा खाली मौसम के बदलाव ना, बलुक विज्ञान से लेके मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आ आध्यात्मिकता तक के गहिर ताना-बाना में गूँथल बा। फगुआ–होली भारत के समेकित जीवन-अनुभव के रंग-बिरंग उत्सव ह, जेकरा…

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जब से बहल बयारि फगुन के।

अमराई में कहईं कोइलि बोल गइल ह। मोजर गंध हिया के बान्हन खोल गइल ह। उसठा होंठ कसाँइन लागे आँखिन चढ़ल खुमार सगुन के।   कवन निगोरा टेसू बन में आग लगावल? कोना आँतर में मुरझाइल राग जगावल। पनख रहल मनगुपुते डारी अँखुवन से गँउजार तरुन के।   कुइँ दल खिलल भँवर मदमातल, घूप थिराइल। तलई के पानी में केकर रूप हिराइल? बउराहिन जलमछरी जोहे पता न कउँची खाक-बिहुन के।   रतियो कुछ गर्हुआइल जइसन, चैन उपाटल। ना सुख सपन सिराइल तबले, नीन उचाटल। बन पाँखी के तान तान से,…

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अपनापा

फगुनहट के सुगंध गाँव में उतर चुकल रहे। महुआ टपकत रहे आ हवा में भींजल मिठास घुलल रहे। रामदास के घर के आँगन में चूल्हा दहकत रहे। कड़ाही में पुआ फूल-फूल के उठत रहे जवना के रामदास के कनिया आँचल सम्हारत उलट-पुलट करत रहली। रामदास के पत्नी सीता खूब गोर,हँसमुख आ मेहनती रहली जेकरा कारण सबके मन में उनकर खास जगह बन गइल रहे। रामदास, सादा मन के किसान रहले पर होली उनकर खास परब रहे। पुआ छानत कनिया के दुआर के ओहँगन पर खड़ा होके मुस्कुरा के देखत रहलन…

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आयल जगावे फगुनवा

जागा जवान अरे जागा किसान आयल जगावे फगुनवा, रंग बिरंगा है नेहिया के बान आयल जगावे फगुनवा। सुगना जगावे कोयलिया जगावे गेहुंआ के बाली पे नाच दिखावे, भौरा जगावे ला गावे हो गान आयल जगावे फगुनवा।   वीरों का मौसम है, वीरों का चोला, देखि वसन्ती जिया मोरा डोला। जय बोला जवान, जय बोला किसान, आयल जगावे फगुनवा। जागा जवान अरे जागा किसान आयल जगावे फगुनवा। रंग बिरंगा है नेहिया के बान आयल जगावे फगुनवा।   उमाशंकर शुक्ल दर्पण ग्राम -पोस्ट पक्खनपुर बिछैला जिला अम्बेडकरनगर, उत्तरप्रदेश पिन 224125 दूरभाष 8882168961

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