फागुन के गोइयाँ, बसंत अगुवानी में

पुरनकी पतई झरे लगनी सन मने नवकी फुनुगी के अवनई के डुगडुगी बज गइल। अब डुगडुगी के अवाज सुनाइल कि ना, ई बिचारे जोग बात बाटे।बातिन के बिचारे खातिर समय होखे के चाही, सुने–देखे में त इहे आवता कि केहुओ के भीरी समय नइखे। सभे कतों ना कतों अझुराइल बा। अझुरहट सकारात्मक बाटे कि ना, एकरा के छोड़ीं । बसंत पंचमी त आ के जाइयो चुकल बाक़िर कतों बसंती गीत आ फगुआ के ढ़ोल, झाल, मजीरा के अवाज सुनाइल ना। सुनाई देही त कहवाँ से, जब कतों फगुआ गवात होत,…

Read More

हमार भउजी !

हमार भउजी शहर से आइल रही, गांव के रीत-रिवाज ना जानत रही. सब कुछ उनका खातिर नया रहे. एक से एक सवाल करटी रही. गांव के लइकी उनका के पटनहिया भउजी कहत रही सन. भउजी खाये-पीये के बड़ी सवखीन रही. भोजपुरी में अइसन अदिमी के खबूचड कहल जाला. भउजी ना जानत रही कि अनाज कइसे उपजे ला. फागुन के महीना रहे, होरहा-कचरी के दिन. आजी कहली की कनेऊआं के कचरी खियाव लोग, का जाने खइले बिया कि ना ! बनिहार एक पंजा कचरी लेया के अंगना में पटक देलस . भउजी देखली त चिहा के कहली कि के त चना के फेंड उखाड़ के…

Read More

गाछि ना बिरिछ आ सुझेला हरियरी

पहिले चलीं जा गाँव घूम आईंजा।खेत – बधार के छोड़ीं महाराज घरे – दुआरे, आरे – पगारे, नदी – नाला के किनारे, मंदिर के अंगनइया, ताल – तलैया – नहर के पीड़ प,सड़कि के दूनों ओरि, कहे के माने जेने नजर दउराईं गाछि – बिरिछ, बाग – बगइचा लउकत रहे गँउवा में, धान- गेहूं- बूंट- खेसारी से भरल हरियर खेतन के त छोडीं। हरियरी के माने ई होला।गाँव से सटलको टोला ना लउकत रहे बगइचन के कारण।गँउवा आजुवो ओहिजे बा बाकिर गाछि – बिरिछ – बगइचा गायब। रसोइयो में साग…

Read More

जनावर

अंडा बेचे वाली मनोरमा पहिले अंडा ना बेचत रही. उ एगो घरेलू महिला रही, जे अपना मरद भूलन आ बेटी आरती के साथे खूब बढ़िया से आत्मसम्मान के जिनिगी जीअत रही. बाकिर उनका शांत जीवन मे कोल माफिया कल्लुआ कवनों शैतान के माफिक घुस गइल आ उनुकरा हरा-भरा घर संसार के तहस नहस करके रख दिहलस. कोयलांचल में लाखों रुपिया ठेका में कमाई करे वाला परिवार के कल्लुआ फूटपाथ पर लाके पटक दिहलस. मनोरमा के परिवार एक-एक दाना खातिर मोहताज हो गइल. एगो अइसनों समय आइल, जब मनोरमा सड़क पर अंडा बेचे खातिर मजबूर हो गइली.…

Read More

आपन भाषा, आपन सम्मान

“अरे सुनतानी देर होता, जाइना स्टेशन, ना त गाड़ी आ जाई,” कमला देवी कहली। “काहे हल्ला कइले बारू, जात त बानी, बुझाता की तहार बबुआ घर देखलही नईखन, गाड़ी से उतर जइहन त भूला जइहन,” रामेश्वर जी तंज कसलन। “हम उ सब नइखी जानत, रउआ जाई जल्दी,” खिसिया के कमला देवी कहली। “तहार बबुआ इंजीनियरिंग के पढ़ाई पढ़तारन, पचीस साल के हो गईल बारन अउर तू त ऐतना चिंता करतारू की जेगनी अभी गोदी में बारन,” रामेश्वर जी हंसते हुए कहले। “अरे रउआ का जानेम माई के ममता, अब जाइ…

Read More

मतदान त अधिकार हउवे

भइया जगला के हवे दरकार मतदान त अधिकार हउवै॥2॥   अफवाहन के दूर हटा के आपन बुद्दि विवेक जगा के तहरा वोटS बनाई सरकार , मतदान त अधिकार हउवै॥ 2॥  भइया…   छोड़ के सगरे काम चलS के लोकतंत्र के धाम चलS के जइते होखी परब गुलजार, मतदान त अधिकार हउवै॥ 2॥ भइया…   हित-मीत सबसे बतिया के आस-पड़ोस सभै गोलिया के देखिहा वोटवा न हो बैपार, मतदान त अधिकार हउवै॥ 2॥ भइया…   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Read More