गीत

सुखि गइलें पोखरा आ जर गइलें टपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । बनरा के पेट पीठ एक भइलें घानी । कहा काहें होत बाटे राम मनमानी । गोरुअन के बेटवा क पेटवा ह खपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । संझवा बिहनवा में कमवा न सपरी । होते दुपहरिया भुजाई जालीं मछरी । नदिया में अगिया लगाई देलु जबरी , ए बदरी ।…

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मध दुपहरिया

सप सप चले ले लुअरिया हो सखि ! मध दुपहरिया। कइसे बचाईं जवरिया हो सखि ! मध दुपहरिया॥   एकहू बाग बगइचो ना बाचल नदी नार पोखर नइखे सवाचल बन्हओ क टुटल कमरिया हो। सखि ! मध दुपहरिया॥   हरियर बनवा सपन होई गइलें सहर आ गउवाँ प्रदूषित भइलें गरमी के बढ़ल कहरिया हो। सखि ! मध दुपहरिया॥   चिरई चुरमुन के असरा बिलाइल बिरवा के  सँगे कियरियो सुखाइल घरवो में डाहे लवरिया हो । सखि ! मध दुपहरिया॥     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 5/6/2022

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रूस युक्रेन युद्ध

धरती अकास सब जरे लगल शोला बरसावल बन्द करऽ रोकऽ बिनास कऽ महायुद्ध अब आगि लगावल बन्द करऽ। अंखियन से लोहू टपक रहल बिलखे मानवता जार-जार हरियर फुलवारी दहक रहल धधकत बा मौसम खुशगवार अबहूं से आल्हर तितलिन कऽ तूं पांख जरावल ‌ बन्द करऽ । बनला में जेके बरिस लगल हो गइल निमिष में राख-राख भटकेलन बेबस बदहवास बेघर हो-होके लाख-लाख अबहीं कुछ जिनगी बांचल बा तूं जहर बुझावल बन्द करऽ। निकली न युद्ध से शांति पाठ ना हल होई कवनो सवाल धरती परती अस हो जाई भटकी ज़िनगी…

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गीत

माई-बाबू से ना बढ़ि के देवता पितर हवें हो इहे हवें सोना चानी ऊ त पीतर हवें हो ! माई के अँचरा सरगवा के सुखवा बबुआ खातिर ऊ सहेली सभ दुखवा सभ तिरिथन से बढ़ि के पवित्तर हवें हो ! बाबूजी त सपनो में राखेलें आकाश में सुखवा जुटावे सभ भुखियो पियास में इहे देलें छत्तरछाया ऊ त भीतर हवें हो ! धरती से बढ़ि के ह माई के धीरज बाबूजी चाहेलें बबुआ बने हमार नीरज ईहे जिनिगी के दाता ईहे मित्तर हवें हो ! देवता ई अइसन कि कुछुओ…

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उतार गइल मुँहवा क पानी

करिया करम बीखि बानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   कतनों नचवला आपन पुतरिया लाजो न बाचल अपने दुअरिया नसला इजत खानदानी । उतार गइल मुँहवा क पानी॥   झुठिया भौकाल कतनों बनवला बदले में लाते मुक्का पवला मेटी न टाँका निसानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   साँच के बचवा साँचे जाना नीक आ नेवर अबो पहिचाना फेरु न लवटी जवानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥   अब जे केहुके आँख देखइबा ओकरा सोझा खुदे सरमइबा कइसे के कटबा चानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 31/03/2022…

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बलम परधानी लड़ाके

खा गइल बचल – खुचल पानी बलम परधानी लड़ाके। एक भइल संझिया बिहानी बलम परधानी लड़ाके।। नइहर से अइनी त दुल्हिन कहइनी भुइयां ना डेग हम दुउरे में धइनी । आज सँउसे गँउवे के रानी बलम परधानी लड़ाके…. कहेला लोग दिन तिरिया के आइल मरद – मेहरारु बराबर कहाइल। अब तु ही अगोरिहs चुल्हानी बलम परधानी लड़ाके… खा गइल बचल – खुचल पानी बलम परधानी लड़ाके… भसुरा आ देवरा बराबर बुझाला ओटवा बड़ावे ऊ संघे – संघे जाला। अगराइल पेन्ट – मरदानी बलम परधानी लड़ाके…. खा गइल बचल – खुचल…

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गाईं कइसन लोरी

आगि लागल बा मन में बोताईं कहां, सुतल हियरा के फेरु से जगाईं कहां।   कुछ कहला प छन दे छनकि जाले उ, सांच बतिया के लोरी गवाईं कहां।   उ पवले का पद भूलि जा तारे हद, अइसन दरद प मल्हम लगाईं कहां।   देवे के उपदेश उन्हुका आदत परल, हिम्मत रउवे बताईं कि पाईं कहां।   देखीं जेकरा के फफकल उताने भइल, भाव के भरल ई खटिया बिछाईं कहां।   करी कतनो हम आस मिले केहु ना खास, दिल में उगल अंजोरिया देखाईं कहां।   पवनी जेकरा के…

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बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो

ठुनुक़त घरवाँ अंगनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो बिहँसत माई के परनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   मुँहवा लपेटले मखनवाँ बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो उचकि उतारत अयनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   हुलसत गरवा लगावेली अरे हो भरले लोरवा नयनवाँ , बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।   रोआँ पुलकि जिया हरसेला अरे हो कुंहुकेला मन अस मयनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो।।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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वसंत अइले नियरा

हरसेला हहरत हियरा हो रामा, वसंत अइले नियरा।। मन में मदन, तन ले ला अंगड़ाई, अलसी के फूल देख आलस पराई, पीपर-पात लागल तेज सरसे, अमवा मोजरीया से मकरंद बरसे, पिहू-पिहू गावेला पपीहरा हो रामा, वसंत अइले नियरा।। मटरा के छिमिया के बढ़ल रखवारी, गेहूँआ के पाँव भइल बलीया से भारी, नखरा नजर आवे नजरी के कोर में, मन करे हमहूँ बन्हाई प्रेम-डोर में, जोहेला जोगिनीया जियरा हो रामा, वसंत अइले नियरा।। पिया से पिरितिया के रीतिया निभाएब, कवनो बिपत आयी तबो मुस्कुराएब, पोरे-पोर रंग लेब नेहिया के रंग में,…

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भोर हो गइल

खोल द दुआर, भोर हो गइल। किरिन उतर आइल, आ खिड़की के फाँक से धीरे से झाँक गइल, जइसे कुछ आँक गइल, भीतर से बन्द बा केंवाड़ी त बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल, आँगन के हरसिंगार, दुउरा के महुआ जस, चू-चू के माटी पर अलपना सजा गइल, ललमुनियाँ चहक उठल, बंसी के तान थोर हो गइल।। रोज के उठवना जस, ऊठ, अब जाग त किरिन-किरिन जूड़ा में खोंस ल, झुनुक-झुनुक साँकल से पुरवाई बोलल जे, पायल में पोसल ; अँचरा से महुआ के गंध झरल हरसिंगार गंध…

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