गंगा महिमा

गंगा के महिमा दुनिया में, सबसे बड़ा अनमोल हगंगा में जे डूबकी लगावे,पाप ओकर सब गोल हगंगा के महिमा…….. मोक्ष देवे के खातिर गंगा, लेले  बारी अवतारपर परदूषण से दुखी बारी, देख तनी विचारअमरित जस गंगा जल में,कचरा के मिलत घोल हगंगा के महिमा…….. धरती पर जब अइली मईया,मोक्ष के खुलल दुआरभागिरथ के सब पुरखन के, तब रहे भइल उद्धारगंगा के जे मईया ना बुझे, बुझ उ बकलोल हगंगा के महिमा…….. रीति रिवाज के नाम पे गंगा, मैली हो गइल बारीआज बाट जोहत बारी लाल के,आके हमके संवारीभागिरथ फेर से आव धरा पर,मईया…

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रोवतारी माई

सखी सहेली खड़ा,बाड़ी कतार में, रोवतारी माई , धके अकवार में। नईहर छोड़ी जब, ससुरा में जाली, फेड़ से लागे जस ,टूट गइल डाली। बरसो के रिश्ता, तोड़ी एक बार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। सुसुकी-सुसुकी माई,लोर बहावेली, बेरी,बेरी बेटी जरी,घूमी के आवेली। भरे ना जियरा ,मिले से एक बार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। हो तारू बेटी आज, हमसे पराया, जा तारू जहाँ तू, करिह हो छाया। खुशीया भरल रहे, घर संसार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। दीपक तिवारी श्रीकरपुर,सिवान

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ए बदरी

सुखि गइलें पोखरा आ जर गइलें टपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । बनरा के पेट पीठ एक भइलें घानी । कहा काहें होत बाटे राम मनमानी । गोरुअन के बेटवा क पेटवा ह खपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । संझवा बिहनवा में कमवा न सपरी । होते दुपहरिया भुजाई जालीं मछरी । नदिया में अगिया लगाई देलु जबरी , ए बदरी ।…

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समइये गुरु ह समइये ह चेला

समइये गुरु ह समइये ह चेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । लहर जाला झंडा केहु के अकासे केहु हाथ मल के रहेला उदासे समइये घुमावेला सुख दुख के मेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । बिना मंगले देबेला बड़का खजाना मंगला पर मिले न चाउर के दाना कहां केहु के कुछो वश में रहेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । आदमी के कुक्कुर नियन दुरदुरावे समइये ह कुक्कुर के आदमी बनावे समय पर समइये परीक्षा भी लेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । करम आ…

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गीत

हो घेरलस करिया बदरिया, रोपनी के सुतार आ गईल। बहे लागल पुरवा बयरिया, हमनी के बहार आ गईल। जइसे उड़े सड़िया अचरिया, गछियन के लहार आ गईल। रोपे चलस गोरिया संवरिया, पायलन के झंकार आ गईल। झमर झमर बरसे बुनरिया, छातवो में फुहार आ गईल। कड़कड़ाए चमके बिजुरिया, लुकाएके ओहार आ गईल। गावे के गीतवा कजरिया, मनवा में हमार आ गईल। संतोष कुमार, नरकटियागंज, पश्चिमी चंपारण, बिहार।

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गीत

मन सून-सून मनसून बिना। अबले ताले कमल खिलल ना तन लागेला खून बिना। एक तऽ अदिमी अइसे जरना हिया भरल अंगार ऊपर से सूरुज दहकावे हो के माथ सवार भाव बिना सूनी कविताई खत सूना मजमून बिना। नदी मात के छाती सूखल भूखे शिशु छपटाय पेड़ लता के बाँचल ठठरी कब जाने भहराय जोजन भर उड़ि गइली चिरई भहरइली जलबून बिना। बेना लिहले बइठल के ना? हँउकत हाथ पिराय तबहूँ टपटप चुवे पसेना गगरी भरि-भरि जाय बुढ़िया दादी अटपट बोले तन अँइठाइल नून बिना। उमख उड़ावे ईत्तर जइसन नींनि आँखि…

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बनउवा रूप तहरा

दहके पलास फूल जिया डहकावे हो। बनउवा रूप तहरा हमरा ना भावे हो॥   सोरहो सिंगार ओढ़ि ललखर चुनरिया गाँव नगर होत आइल सइयाँ दुअरिया गोरिया के नखरा जिया ललचावे हो। बनउवा रूप—–   घर अँगनइया में धप-धप अँजोरिया टटके सजल बाटे ललकी सेजरिया गजरा गुलाबी गोरी जिया बहकावे हो॥  बनउवा रूप—–   रूसियो के  फूलल नाहके कोहनाइल पजरा पहुँचि गोरी नियरा  ना आइल उपरल हिया में सूल जिया दहकावे हो॥ बनउवा रूप—–   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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बरम बाबा

राउर महिमा रउरे जानी हम ना जानी मरम बाबा का का गाईं बरम बाबा॥   रउरे किरपा सोनरा के घर पसरल मजगर उजियारी पूजन अरचन करि करिके दीहलस कुलवा तारी।   जियत जिनगी करम करत मानि आपन धरम  बाबा। का का गाईं बरम बाबा॥   पहिले दिनवाँ कटत रहे जइसे तइसे,बाँची पतरा तहरे दीठि से पूरन भइल मुंसी से मालिक के जतरा   आँखि खुलल सनमान बढ़ल नइखे कवनों भरम बाबा। का का गाईं बरम बाबा॥   सरधा जेकर बा तहरा में किरपा ओपर बरसावेला ओकरे किरती के अँगना अँजोरिया…

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गीत

मुदित मगन मन देखे बलजोरी , खेलतारे राम राजा सिया संग होरी।   नगर अयोध्या झूमे झूमे त्रिभुवन हो , झूमे कैलाश शिव शक्ति के गन हो । राधा मगन कान्हा गोकुला के गोरी , खेलतारे राम राजा सिया संग होरी ।   ब्रह्मा जी झुमे लेके नारद के संग हो , विणा बजावे माई शारदा मगन हो । विष्णु मगन बनी लचकत छोरी , खेलतारे राम राजा सिया संग होरी ॥   उडे गुलाल बा रगांईल अंगे अंग हो , धरती रंगाईल बा रंगाईल गगन हो । साधु संयासी…

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कुल्हि हमरे चाही

हमही त बानी असली राही कुल्हि हमरे चाही।   हमही से उद्गम हमरे में संगम धमकी से करब हम उगाही कुल्हि हमरे चाही।   हमरे से भाषा हमरे से आशा छपि के देखाइब खरखाही कुल्हि हमरे चाही।   हमही चउमासा बुझीं न तमासा खम खम गिरिहें गवाही कुल्हि हमरे चाही।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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