साहित्य में आरक्षण भा सम्मान के आरक्षण

सहित के अवधारणा कवनो साहित्य के सबसे बड़ पूंजी होले। एह भाव आ सुभाव का संगे साहित्य में आपन सब कुछ न्योछावर करत साहित्यकार लो सिरजना करेला। समय ओह सिरजना के मूल्यांकनों करेला आ समय समय पर ओह साहित्यकार लोगन के सनमानों करेला। भोजपुरी साहित्य सरिता के ई संपादकीय लिखत बेर मन अतना हुलासित बा कि ओकरा शब्दन में बान्हल संभव नइखे लागत। 2013 के बाद 2021 में साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान (गैर मान्यता प्राप्त) भोजपुरी भाषा के दू गो समर्पित लोगन के ‘भाषा सम्मान’ देवे के घोसना भइल…

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आन्हर गुरु, बहिर चेला

समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…

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आपन बात

भोजपुरी साहित्य सरिता क इ अंक आप लोगन के सौंपत के बहुत हर्ष होत बा। सबसे बड़ी खुशी क इ बात ह कि ई अवसर कार्तिक महिना के बा । कउनो राष्ट्र देश के सांस्कृतिक वैभव क परिचायक उहवां के लोक साहित्य होखेला। जवने से उहवां के संस्कार परंपरा जीवन आदर्श उत्सव विषाद नायक नायिका रितु गीत विवाह गीत भजन राजनीतिक सामाजिक धार्मिक गीतन के बोल में समाहित रहेला। वइसे तो हर देश के आपन एक परम्परा होखेला लेकिन हमरे देश के बात निराला बा। इहवा “कोस -कोस पर बदलें…

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