कतों सत्ता लोलुपता का चलते सत्ता के स्वामी लोग के करतूत, ओकरा चलते समाज के , नवहा लोगन के भा बच्चा-बुतरु सभ के बिखियाइल नजायज कइसे बा, परिभाषित नइखे कइल जा सकत। कुछ लाख लोगन का चलते डेढ़ अरब जनता के दरकिनार क के देखत सरकार अब कुरसी का छोड़ अउर कवनो बात समुझे-बुझे के तइयार नइखे देखात । सरकार के भाषा हिटलर , मुसोलिनी भा रावण आ कंस के भाषा लेखा बन चुकल बा। आपुसे में बिख के खेती करत-करावत सरकार आ सरकारी तंत्र अपना गुरूर में आन्हर हो…
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समय का संगे साँप-सीढ़ी के खेला
समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…
Read Moreचइता के साध मरि गइलें हो रामा
हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा…
Read Moreजेकर खइलन रोटी ओकरे धइलन बेटी
समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लोग होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…
Read Moreजेकर खेती ओकर मति
शीतलहर के प्रकोप में अलग अलग तरह से गरमी के पैदा करे क उताजोग हो रहल बा आ लोग ओकरा के महसूसतो बा। ओह पर चरचा के बजारो गरम हो चुकल बा। कबों कवनो बैठक त कबों कवनो खिलाड़ी गरमी के श्रोत बन रहल बाड़ें। समइयो एक्के आँख से देखउवल के चल रहल बा। चाल चरित्र के बात करे वाला लोगवो एक्के आँख से देखे क आदती हो चुकल बा। उ लोग देखते भर नइखे बलुक फीरी में धमकियो दे रहल बा उहो भोंपू लगा के । मुख पोथी के…
Read Moreयुद्ध के भट्ठी पर सिरजना के लेप
विध्वंस आ सिरजन एह सृष्टि रूपी सिक्का के दू गो पहलू लेखा बा। एक के दोसरा अलगा राख़ के देखल मोसकिल ह। मने अलगा-अलगा राखल भा देखल संभव नइखे। अब जवन कुछ संभवे नइखे,ओह पर कवनो बतकही बेमानी बा। बाक़िर एह घरी त पत्थर पर दूब्बा उगावे के पुरजोर परयास हो रहल बा। परयास देखउकी भर के बा भा साँचों ओकर छाया जमीन पर उतर रहल बा, ई त समय के ऊपर छोडल जा सकेला। एह छोड़लको पर लोगन के नजरिया अलग-अलग हो सकेले,बाक़िर दोसर कवनो रासतो त नइखे। दुनिया…
Read Moreसुधि के मोटरी से कुछ-कुछ
रउवा सभे के मालूम होखबे करी कि जिनगी के जतरा लइकई से गवें गवें आगु, बढ़त, जवानी के जीयत, अधेड़पन के संवारत बुढ़ापा के काटत एक दिन अंतिम जतरा पर निकल जाला। मनई के जिनगी में ढेर पल –छिन अइसन जरूर आवेला जवना के उ जोगा के राखलों चाहेला। भा ई कहल जाव के कुछ गुजरत पल मनई के स्मृति में आपन पक्का ठेहा बना लेवेलन सन। अइसने स्मृतियन के आधार पर कवनो विषय भा बेकती पर जवन कुछ लिखल जाला, ओकरा के संस्मरण भा स्मृति आलेख कहल जाला। भा…
Read Moreचैता आ चुनाव
गज़ब हाल बा भाई! एक त चइत चहचहाइल बाटे आ मन,मनई,मेहरारू संजोग वियोग के चकरी में चकरघिन्नी भइल बाड़ें, ओही में ई चुनाव के घोषणा, मने धधकत आगि में घीव डला गइल। दूनों ओर जी हजूरी के तड़का, अब उ नीमन लागे भा बाउर। जिये के दूनों के पड़ी, मन से भा बेमन से। जब लोग बाग खेती-किसानी से दूरी बनावे लागल बा, त ओहमें ई राँड रोवने नु कहाई कि अब ढोलक के थाप आ झाल के झंकार सुनात नइखे। खेती-गिरहस्थी से थाकल लोगन खातिर फगुआ आ चइता टानिक…
Read Moreफागुन के गोइयाँ, बसंत अगुवानी में
पुरनकी पतई झरे लगनी सन मने नवकी फुनुगी के अवनई के डुगडुगी बज गइल। अब डुगडुगी के अवाज सुनाइल कि ना, ई बिचारे जोग बात बाटे।बातिन के बिचारे खातिर समय होखे के चाही, सुने–देखे में त इहे आवता कि केहुओ के भीरी समय नइखे। सभे कतों ना कतों अझुराइल बा। अझुरहट सकारात्मक बाटे कि ना, एकरा के छोड़ीं । बसंत पंचमी त आ के जाइयो चुकल बाक़िर कतों बसंती गीत आ फगुआ के ढ़ोल, झाल, मजीरा के अवाज सुनाइल ना। सुनाई देही त कहवाँ से, जब कतों फगुआ गवात होत,…
Read Moreआँखिन देखी —
गंवे गंवे भोजपुरी साहित्य के पठनीयता के मिथक टूट रहल बा,अइसन हम ना बजार कहि रहल बा। एकरा पाछे मुख्य कारण उपलब्धता आ विश्वसनीयता के मानल जा सकेला। डिजिटल युग एहमें अहम भूमिका निभा रहल बा। भोजपुरी के पुस्तक पहिलहूँ प्रकाशित होत रहनी स आ अजुवो प्रकाशित हो रहल बानी स। एह दिसाई साहित्यांगन आ सर्वभाषा प्रकाशन एगो मजगूत बड़ेर लेखा सोझा बाड़ें। पुस्तक मेला, जगह-जगह लागे वाला स्टाल भाषा के नेही-छोही लोगन के संगही दोसरो भाषा भासी लोगन के सोझा भोजपुरी के किताबन के उपलब्धता सुगमता से सुलभ करा…
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