मसान- राग

आगे बाबूजी लगनीं पीछे हम

छोटका भाई सबसे आगे

जोर-जोर से घड़ीघंट बजावत

चिल्लात चलत रहुए-

“राम नाम सत है ।”

राधामोहन के हाथ में

छोटकी टाँगी रहुए

कहत रहुअन-

“चाचाजी जी एक सव एकवाँ

नम्मर पर बानीं

सएकड़ा त फागुये राय पर

लाग गइल रहे हमार ।”

बड़ गजब मनई हउवन

राधामोहन ठाकुरो!

गाँव के कवनों जाति

छोट-बड़ सबका में

मसाने दउड़ जालें

बोखारो रहेला तबो

कवनों बहाना ना बनावस

केहू किहाँ मउवत सुनिहें

झट दउड़ जइहें ।

परदूमन भाई बोललें-

“अच्छा चलीं नरब चाचा

राधामोहन जी बाड़ें

त कवनों चिन्ता नइखे

अइसन चिता सजावेलें

कि केतनों पहलवानी देह होखे

दू घंटा में भसम हो जाहीं के बा।”

बेटा-पोता लोग के कान्ह पर चढ़ल

रंथी पर हिचकोला खात

काकाजी पहुँच गइनीं

गाँव के बहरी शिवाला पर

जहँवा पहिलहीं भरथा डराइवर के

चला दिआइल रहे जीप साथे ।

राधामोहन चालू हो गइलें शिवाले से

कान्हा पर से उतार रंथी

जीप पर धराइल

चाचाजी चउरा-चउरा के बन्हइनीं

राधामोहन कहलें

“तनीं तेजी रहो तेजी

बाद में रऊँद आउर बिखाइन हो जाई

रेत पर बड़ी दिक्कत होखे लागी

पुरुवो ससुरी नंगे नाचत बिया।”

घाटे पहुँच के जल्दी से चुनि-चुनि

सूखल-सूखल चइली किनाइल

धूप त गावहीं लिआ गइल रहे

राधामोहन चिता सजवलें

बाकिर सायिद कुछ कसर रह गइल

नरब चाचा भड़कावे खातिर पूछ बइठलें-

” आज तो तूहूँ फेलिया गया जी राधामोहन!

चाचा जी बड़ी देर लगा दिए

आज तोहरो कारीगरी काम नहीं आया

चाचा जी के गोड़वा तs

चिता से बहरी तनिका लटकले रह गया ।”

राधामोहन बोललें –

“बइठल अंगरेजी मत छाँटs

नरब माहटर तनीं

इहाँ स्टूडेन्टे सभे नइखे बइठल तहार

ना बुझाव त

तनिका चुपो रहल जाला ।

चाचा जी के आदत रहल ह

सभका से गोड़ लगवावत रहे के

पाँव- पुजाई खूब असूलत रहलें हँ –

गुरुमुख करिके ,

एही से गोड़वा

लटका देले बाड़न बहरी

कि चलते-चलत कवनों

चेला चढ़ा दीही कुछऊ।”

राधामोहन के ई बात सुनिके

रेत पर पेटाढ़ी के अँटिया पर

बइठल बाबूजी के झर-झर बहत

लोरो मुसुकिया उठल ।

नरब चाचा कुछऊ दोसर कढ़ावस

एकरा पहिलहीं

राधामोहन फेर दोसर सफाई देबे लगलें-

” चाचा जी के गवनई खूब भावत रहल हs

देखले नइखs बनरसिया लौंडा से

महेन्द्र मिसिर के पूरुबी

बगौरा गढ़ के मैनेजर कैलाश बाबू संगे

‘झूलन’ में बइठ के सावन में

केतना मनभर सुनत रहले हँ चाचाजी ,

‘अँगना में कींच-काँच दुअरा पर पानी

खाला -ऊँचा गोड़ पड़ी चढ़ल बा जवानी’

सुनते खिल जात रहले हँ चाचाजी ।”

राधामोहन फेर चिल्लाये लगलें

“रे भरथा !तें ना मनबे

बन कर ना रे सार!

टेपवा बन कर जलदी

जब ले ई मनोज तिवरिया पिहिकत रही नू

चाचाजी जरिहें ना

आ हमनीं बालुये

फाँकत रह जाएब।

बंद कर बंद कर टेपवा इयार

ना त सिसवन बजरिया के

हलुअइया के पुड़ियो-जिलेबिया

सइँठा-सिकुटा जाई

सेरइला पर का मजा आई

कुल्ही जाना कुलकुलाते रह जइबs।।”

 

■डॉ सुनील कुमार पाठक

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