भोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा

भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि “लोकप्रिय गीतन” के उभरेला  ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से कहीं जादे व्यापक बा। भोजपुरी ना त खाली “मौसमी” गीतन के भासा ह, न खाली मनोरंजन के साधन; ई संघर्ष, करुणा, त्याग, समर्पण, श्रम, वियोग अउर मुक्ति के जियत-जागत सांस्कृतिक दस्तावेज ह।

त्याग अउर समर्पण के परंपरा के देखीं त भोजपुरी क्षेत्र के लोकजीवन में ई तत्व रग-रगे म बसल बा। किसान सुखाड़, बाढ़, अकाल से जूझेला, तबो धरती से नाता ना तोड़ेला—ई त्याग ह। मजदूर परदेस जाला, परिवार छोड़ देला—ई समर्पण ह। लोकगीतन में “पिया परदेस गइले” के पीर खाली वियोग ना, बलुक कर्तव्य के स्वीकारोक्ति ह। एह भाव में भोजपुरी समाज के नैतिक रीढ़ लउकेला।

भोजपुरी चेतना के निर्माण में बुद्ध के करुणा के धारा गहिराई से समाइल बा। करुणा, मैत्री, समता अउरी अहिंसा—ई मूल्य भोजपुरी लोकसंस्कार में घुलल-मिलल बाड़े। गाँव के साझा श्रम, दुख-सुख में भागीदारी, जाति-वर्ग से ऊपर उठ के संकट में साथ देवे के परंपरा—ई सब बौद्ध करुणा के लोकानुभव ह। भोजपुरी समाज में “सबके दुख अपना दुख” मानल—ई दार्शनिक भाव लोकजीवन में व्यवहार बन के जीवित बा।

मेहरारू (स्त्री) मुक्ति के सवाल पर नजर डालीं त भिखारी ठाकुर के नाटक भोजपुरी समाज के आत्मालोचन के तगड़ा दस्तावेज हवें। बेटी बेचवा, बिदेसिया, गबरघिंचोर, गंगा स्नान, भा विधवा विलाप भा पिया निसइल नियर कृतियन में मेहरारू के पीर, वियोग, शोषण अउर प्रतिरोध के स्वर उभरेला। ई नाटक खाली मनोरंजन ना रहलें, समाज सुधार के आंदोलन रहलें। भिखारी ठाकुर मेहरारू के वस्तु ना, चेतन अस्तित्व मानलें—ई भोजपुरी आधुनिकता के क्रांतिकारी डहर ह। राहुल सांकृत्यायन जी के नाटक, मेहरारू के दुर्दशा भा जोंक जइसन तत्कालीन समाज में औरतन के हालत आ सामंती समाज द्वारा गरीब मजूरन में शोषण के दास्तान ह।

भोजपुरी के आध्यात्मिक चेतना में कबीर के बानी आजुओ जीवित बा। कबीर के निडर बानी हमेशा से पाखंड-विरोध, जाति-विरोध, भीतरी साधना—भोजपुरी लोकमानस में गूंजेले। “साँच कहे त मारन धावे”—ई अनुभव भोजपुरी जनजीवन में आजुओ प्रासंगिक बा। कबीर के प्रभाव से भोजपुरी में भक्ति अउरी सामाजिक आलोचना साथे-साथे आगू बढ़ल। उनकर यूटोपिया अमरदेसवा आजो एगो समता मूलक समाज के सूत्र दे रहल बा।  एह परंपरा के विस्तार रैदास के “बेगमपुरा” के सपना में लउकेला—एगो अइसन समाज जहाँ दुख, टैक्स (कर), भेदभाव ना होखे। ई भोजपुरी समाज के बराबरी पर टिकल दार्शनिक सपना के रूप ह।

श्रमगीत भोजपुरी संस्कृति के सबसे मानवी धरोहर हवें। खेत में रोपनी, कटनी, मड़ाई; ईंट-भट्ठा, नाव खेवल, घर बनावल—हर जगह गीत श्रम के पीर के कम करेले। एह गीतन में श्रम के मान-सम्मान बा, सामूहिकता बा, जीवन के दार्शनिक स्वीकार बा। श्रमगीत बतावेले कि भोजपुरी समाज में कामे पूजा ह, श्रमे अस्मिता ह।

बेटी के वियोग भोजपुरी लोकसंस्कृति के सबसे मर्मस्पर्शी अध्याय ह। “बिदाई गीत” में माई-बाप के करेजा फाटे लागेला। बेटी के बिदाई खाली पारिवारिक घटना ना, सांस्कृतिक करुणा के अद्भुत अभिव्यक्ति ह। एह गीतन में मेहरारू के दशा, परिवार के भावनात्मक बुनावट अउर समाज के संवेदनशीलता, तीनू के दरसन होखेला।

नेपाल के मधेस क्षेत्र के दरद भोजपुरी अनुभव-संसार के हिस्सा ह। सीमा, नागरिकता, पहचान, उपेक्षा—ई सभ सवाल मधेसी समाज झेलेला। भोजपुरी भाषा एह पीर के आवाज देवेले। राजनीतिक हाशियाकरण अउर सांस्कृतिक संघर्ष के अभिव्यक्ति साहित्य अउरी गीत दुनो में देखल जा सकेला।

दुनिया भर के गिरमिटिया इतिहास में भोजपुरी के वैश्विक पीर दरज बा। जब मजदूर अनुबंध (गिरमिट) पर फिजी, मॉरिशस, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद भेजल गइले, त उहे भाषा, गीत, अउर याद साथे ले गइले। ऊ पीर, गुलामी, विस्थापन सभ भोजपुरी अभिव्यक्ति में सुरक्षित बा। आजुओ गिरमिटिया गीतन में “घर वापसी के आस” गूंजेले।

भिखारी ठाकुर के देशज आधुनिकता खास महत्व राखेले। उ परंपरा के भीतर रह के आधुनिक सवाल उठावेले—प्रवासन, मेहरारू के अधिकार, जाति, दारू, गरीबी। ई लोकभाषा में आधुनिक विमर्श के शुरुआत ह। इहे से भोजपुरी आधुनिकता बहरी से आइल ना, बलुक देशज कहावेले।

आधुनिक विचारधारा में भोजपुरी तेजी से पैठ बनावत बिया। शिक्षा, पत्रकारिता, सिनेमा, रंगमंच, डिजिटल लेखन—हर क्षेत्र में नई पीढ़ी भोजपुरी में समकालीन मुद्दा उठावत बिया—पहचान, भाषा के अधिकार, प्रवासन, स्त्री प्रश्न, पर्यावरण, लोकतंत्र। समकालीन चेतना के स्तर पर भोजपुरी अब प्रतिरोध के भाषा बनत बिया। भाषा के संवैधानिक मान्यता, शिक्षा में अस्थान, प्रशासनिक उपयोग—ई माँग अब जनआंदोलन के रूप लेवत बा।

दक्षिण एशिया में भोजपुरी के ग्राफ तेजी से बढ़ रहल बा। भारत, नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, खाड़ी देश, यूरोप, अमेरिका—हर जगह भोजपुरी भाषी समुदाय मौजूद बा। प्रवासन भोजपुरी के सीमित ना, बलुक वैश्विक बना देले बा। एह विस्तार के मतलब खाली बाजार ना, बलुक सांस्कृतिक पुनर्स्थापन ह। भाषा अब पहचान, राजनीति, अर्थव्यवस्था अउर शिक्षा सभ में भूमिका निभावत बिया।

अंत में, भोजपुरी के खाली ‘लोकप्रिय गीतन’ ले सीमित मानल ओकर सभ्यता के अपमान होई। एह भाषा में बुद्ध के करुणा बा, कबीर के निडरता बा, रैदास के समता के सपना बा, भिखारी ठाकुर के सामाजिक आधुनिकता बा, श्रम के मान बा, प्रवासी के पीर बा, बेटी के वियोग बा, मधेस के संघर्ष बा। भोजपुरी दरअसल लोकजीवन के जियत-जागत अभिलेख ह—जहाँ बीतल समय, आजु अउरी आवे वाला कल तीनों बात करेले। ई भाषा मनोरंजन से आगू बढ़ के मनुष्यता के व्यापक कहानी रचेले। इहे से भोजपुरी के असली पहचान ओकरा के संवेदना, संघर्ष अउरी समता के भाषा के रूप में स्थापित कइला में बा।

 

  • डॉ. संतोष पटेल, भोजपुरी अध्येता

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