शीतलहर के प्रकोप में अलग अलग तरह से गरमी के पैदा करे क उताजोग हो रहल बा आ लोग ओकरा के महसूसतो बा। ओह पर चरचा के बजारो गरम हो चुकल बा। कबों कवनो बैठक त कबों कवनो खिलाड़ी गरमी के श्रोत बन रहल बाड़ें। समइयो एक्के आँख से देखउवल के चल रहल बा। चाल चरित्र के बात करे वाला लोगवो एक्के आँख से देखे क आदती हो चुकल बा। उ लोग देखते भर नइखे बलुक फीरी में धमकियो दे रहल बा उहो भोंपू लगा के । मुख पोथी के बात त पुछीं मति, उहाँ त लमहर लमहर विचारकन के चैकड़ी जम के एकर जाम छलका रहल बा। मुसकिया के पीही भा मुँह बिजुका के सोमरस के पान त करही के बा, नाही त देस के बर-बेवस्था हिले डुले लागेले। ई बतिया त कोरोना काल में सभे के बुझा गइल रहे। ढेर थोर गरमी त एसआईआर से पसरले रहल ह, लखनऊ के बैठकियो से ओकरा ताप में अउर बढ़ोत्तरी हो गइल। अबले बैठकी का चलते बड़की छोटकी कुल्हि सेना आपन आपन असलहा के धार तेज क के लागले रहल ह कि जाने केने से किरकेट के बयार बह गइल। अब किरकेट के बयार ह कि कुछ अउर एकर लेखा जोखा करत रहीं सभे। एहमें जयचंद आ बिभिसनो आ गइलें, दाल भात में मुसरचंद लेखा। बुद्धू बकसवा पर त बड़का बड़का ज्ञानी लोग ज्ञान गंगा बहावे ला जुट गइल बा। देखनिहार लोग के मन होखे भा मति होखे, देखही के पड़ी।
अइसना में साहित्यो आपन गति मति अपना हिसाब से चलिये रहल बा। इहवों एक्के आँख के खेला बा। आपन आपन मेला बा । आपन आपन देखवइया सुनवइया बा । कहवाँ केकर मान मर्दन हो जाई आ केकरा सिरे सेहरा बन्हा जाई, एकर कवनो मानक नइखे। मानक हइयो बा त अपना अपना परिभाषा का हिसाब से। तबो लिखनिहार लोग के कलम चल रहल बा। साहित्य लिखा रहल बा। पढ़ल केतना जा रहल बा, ई रउवा सभे जानते बानी। सन् 2025 में 60-65 गो अलग अलग विधा में भोजपुरी के पोथी छप चुकल बा,साहित्य जगत का सोझा परोसल जा चुकल बा। एगो संतोष के बाति त मानले जा सकत बा। काहें से कि एहमें से 5-7 के छोड़ दीहल जाव त बकिया लेखक लोग के जेबवे पर पड़ल बा।
मंच,माला, माइक पर त 2014 से भोजपुरी के आठवीं अनुसूची ला कहा रहल बा। सुने वाला लोग वाह वाह कर रहल बा बाकिर जमीन पर हाल जस के तस बा। जंतर मंतर के बात त जइसे लोगन के ना देखाई देला, वइसहीं सरकारो के ना लउके। कुछ लोग देखबो करेला त अलगा रंग के चसमा लगा के देखेला । अब रउवा का कहब, इहवाँ त जेकर खेती ओकर मति वाल हाल बा। बाकिर भोजपुरिया लोग के आपन हठ बा, उ लोग जवना काम में लाग जाला, लागले रहेला, जबले ओह काम के परिणाम तक न चहुंपा देस। तबे नु गिरमिटिया से गौरमेंट तक के जतरा पूरा होखेला। मने हरला के काम नइखे, लागल रहला के काम बा। डूबत सुरूज के पूजे वाला लोग के पता रहेला कि बिहान होखबे करी। एह नवके बरिस में एही उमेद से आगु बढ़ला का भरोस मन में राखि के भोजपुरी साहित्य सरिता परिवार रउवा सभे के नवके बरिस के बधाई आ शुभकामना दे रहल बा। जय भोजपुरी ।
- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
सम्पादक, भोजपुरी साहित्य सरिता