वोट के हाला महिनवन से चालू बा । राजधानी से ले के हाटे – बाजारे , चउके – चउराहे , गाँवे गिराँवे , घरे – घरे वोटे के बात होत बा । जवन काम पाँच बरिस असरे टंगाइल रहल , अब चल – चलंती के बेरा ओकर नींव दिआए लागल , उद्घाटन होखे लागल । नेता लोग के धावा – धूपी , दउड़ा – दउड़ी चालू हो गइल । जे सत्ता में बा , ओकरा सत्ता बचावे के बेचैनी बा आ जे सत्ता से दूर बा , ऊ तरह – तरह के झूठ साँच हाला करके , लोभावन वाला वादा करके कुर्सी हथिआवल चाहत बा । दुनों पक्ष के नेता जनता के दरबार में कोरनिस करे में लागल बा कि वोट ओकरे मिले । वोट मंगनचन में लागल नेता आ नेतन के चमचन से प्रसिद्ध कवि माहेश्वर तिवारी के कविता के जरिए सवाल दागे के मन होखत बा – बतावs तनी बाबू / अब का माँगे अइलs ?
बोली दिहलीं / बानी दिहलीं / कुर्सी अउर राजधानी दिहलीं /
तू अतना पाइ के काहे दुबरइलs ?
सपना हमके बहुत देखवलs / किसिम किसिम से तू भरमवलs /
सब कुछ खाइ के / न तनिको अघइलs ।
कइसे अब / बिसवास करीं हम / तोहसे कउनो इस करीं हम /
आपन कहल / तू अपने भुलइलs ।
कइल वादा त कुरसी पर बइठते फरजी से प्यादा बनल नेता लोग भुलाए लागेला आ भुलाइयो जाला – कतना त वादा भइल , / बहुते इरादा भइल ; / जन सेवा नाम पर /
फरजी से पियादा भइल । / सभे वादा गइले भुलानी (ब्रज भूषण मिश्र)
बाकिर वोटवा माँगेवालन का कवनो गतर लाज थोड़वे बा ? तरह – तरह के बात बनउअल बा , जात – पात – धरम के नाम पर जनता के बुरबक बनावे के , भुलवावे के , लोभावे के कार चालू हो जात बा । जनता के का कहे के बा , जनता त चिरईं ह , कतनो साधु बाबा समझइहें – बुझइहें , बाकिर ऊ त दाना चुगे के फेर में बहेलिया के जाल में फँसिये जाला । बाकिर होखेला का ? सबद सपन के जाल में हमनी रहब भुलात । राजनीति के साँढ़ बा सब जजात चरि जात ।। (ब्रजभूषण मिश्र)। ऊ जीत के जाई आ आपन खोली भरी, आ जनता ? ऊ त ‘ए भोला ! तू लोला ले लs सुखले शंख बजावs ।’ (रामजी सिंह मुखिया) ।
खैरात बाँट के , एक दोसरा से बेसी बाँटे के असरा धरा के , लोभ लालच दे के केहू चुनाव जीत जाला आ छूँछे जनता के जय – जयकार मनावेला । जे हारेला ऊ अपना हार के ठीकरा
जनते के माथे फोड़ेला । हमरा त बुझाला कि नेता जीतबो करेला , हरबो करेला , बाकिर जनता खाली हरबे करेला । पछ चाहे बिपच्छ पारा – पारी जनते के लूटेला , जनते पर चोट करेला –
जेकरे से वोट चोट ओकरे पर करे / धोती खूँट-खूँट लूट पारा-पारी चाहsता । (महेन्द्र शास्त्री) ।
ई वोटवा लुडो वाला खेल ह , साँप – सीढ़ी के । के कब सीढ़ी से सइ पर पहुँच जाई , आ के साँप के मुंह में घुस के नीचे लुढ़ुक जाई , कवन ठेकाना । पाशा फेंके में होशियारी चाहीं –
राजनीति के खेल बा , जइसे सीढ़ी साँप । सीढ़ी चढ़ के सई तक , लिललस साँप गराप।।
- ब्रजभूषण मिश्र