गंवईं माटी से गमकत कविता

समीक्षित पुस्तक: पीपर के पतई( भोजपुरी कविता संग्रह)

कवि के नाम – जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

प्रकाशक – नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष: 2017

पृष्ठों की संख्या -104

समीक्षक- डॉ राजेश कुमार ‘माँझी’

 

ई बात सबका मालूम बावे कि कविता मूल रूप से पाठक के भावना के उद्दात बनावेले, ओकरा सौंदर्य-बोध में सुधार ले आवेले आउर ओकरा के अपना परिवेश से जोड़ेले। कविता द्वारा पाठक में संवेदनशीलता आउर सुरूचि के भी विकास होखेला। कविता के भाव, विचार आउर शिल्प-सौंदर्य के उद्घाटन सही लय आउर प्रवाहपूर्ण ढंग से पढ़ला से ही संभव हो सकेला। एही से आवश्यक बा कि प्रस्तुत कविता-संग्रह “पीपर के पतई” के माध्यम से एकर रचनाकार श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी द्वारा जवन भाव आउर विचार रउवा लोग तक पहुंचावे के कोशिश कइल गइल बा ओकर प्राप्ति खातिर ऊपर कहल गइल बात पर ध्यान दिहल जाव।

श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के कविता में मानवीय भावना के सहज अभिव्यक्ति देखाई देत बा। कवि द्वारा अपना कविता में सरल-सहज भाषा में सुख-दुख के व्यक्त करे के सफल प्रयास कइल गइल बा। संग्रह के एगो खास बात ई बा कि एकरा में प्रेम सहित मानव जीवन के दोसर विभिन्न पक्ष संबंधी कवितन के भी पाठक लोग आनंद ले सकेला । रहल बात प्रेम संबंधित कवितन के त, एकर कवगो कारण हो सकेला। जवन असली बात बा, ऊ ई कि प्रेम मनुष्‍य के सबसे बड़हन खजाना हवे, जवना के कवगो रूप होला । प्रेम के एगो रूप प्रकृति प्रेम भी होखेला जवना के बारे में हर भाषा-बोली में प्रचूर साहित्य मिलेला । प्रकृति प्रेम के एगो सुंदर उदाहरण पाश्चात्य कवि जॉयसी किल्मर (Joyce Kilmer) के कविता में देखल जा सकेला जवना में कवि कहत बा कि एगो पेड़ से सुंदर कवनो कविता ना हो सकेला जवाना के बारे में उनकर पंक्ति बा –

I think that I shall never see

A poem lovely as a tree.

A tree whose hungry mouth is prest

Against the earth’s sweet flowing breast;

A tree that looks at God all day,

And lifts her leafy arms to pray;

उपरोक्त पंक्ति से स्पष्ट हो जात बा कि प्रकृति के विराट स्वरूप प्रेम ही हवे। प्रेम भगवान के अनुपम वरदान हवे जवन जन्म से लेके मृत्यु तक मानव में नैसर्गिक रूप से मौजूद रहेला। सच्चाई ई बा कि बचपन से शुरू भइल प्रेम प्रकृति से जुड़ला के बाद उदात्त रूप धारण कर लेबेला । प्रेम ऊ विषय हवे जवना पर महाकवि कालिदास ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ नाटक के रचना कइलें जवन अपना आप में प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान आउर पुनर्मिलन के एगो सुंदर कहानी हवे। इहो बात साँच बा कि प्रेम से संबंधित कविता खाली भारतीय भाषा में नइखे लिखल गइल, बल्कि सम्पूर्ण संसार के रचनाकार लोग ए सुंदर विषय पर आपन लेखनी चलवले बा । एकर एगो सुंदर उदाहरण पाश्चात्य कवि जॉन गे (John Gay) के कविता में देख सकत बानी रउवा सभे । जॉन गे लिखत बाड़ें –

Youth’s the season made for joys

Love is then our duty;

She alone who that employs

Well deserves her beauty.

Let’s be gay, while we may,

Beauty’s a flower despised in decay.

उपरोक्त कविता के पंक्ति ए ओर इशारा करत बा कि कवनो भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के जानल-समझल आसान ना होखेला पर ऊ व्यक्ति यदि रचनाकार होखेला त कुछ हद तक ओकरा रचना से ओकरा व्यक्तित्व के संगे-संगे समाज आउर परिवेश संबंधित ओकरा सोच के बारे में पता चलेला । त चलीं, ‘‘पीपर के पतई’’ में संकलित पैंसठगो कवितन के माध्यम से ई बात के जाने के कोशिश कइल जाव कि श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के सोच अपना घर-परिवार आउरो समाज आ परिवेश के प्रति कइसन बा ? उनकर बाहरी आ भीतरी दुनिया के जाने खातिर प्रस्तुत कविता-संग्रह में संकलित कुछ कविता के चर्चा इहाँ पर कइल जा रहल बा। अपना विवेकानुसार हम ए संग्रह के कुछ कवितन के गुण-दोष उजागर करे के कोशिश कइले बानी बाकिर प्रत्येक व्यक्ति अपना-अपना ढंग से कविता के मतलब निकालेला आ एमें केहू के केहू से कवनो शिकायत भी ना होखे के चाहीं ।

कविता के उत्पत्ति के बारे में विद्वान लोगन के कहनाम बा कि कविता के उत्पत्ति दुख के अनुभूति से होखेला। जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के कविता ‘अचके में‘ भी ए बात के प्रमाण मिलत बा जहां कवि के कहनाम बा:

“सोच के अऊंजाइल मन

क्रोध में कांपत हाथन से

लिखल चाहत रहनी दोसर

अचके में मन के पीड़ा

लिखा गइल।”

ई बात भी सर्वविदित बा कि कवनो भी कवि अपना समाज से कट के ना रह सकेला । समाज के समस्या ओकरा मन के उद्वेलित करत रहेला। आज भारतीय समाज में कवनो भी व्यक्ति खातिर बेटी के शादी करे में पसीना छूट जाला । जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के कविता ‘अब्बो ले सुपवा बोलेला’ में बेटी के शादी करे के चिंता पाठक लोग देख सकता बा:

‘हम त बानी लइकी के बाप

सोचते छाती लोटत सांप

कइसे लागी हांथे हरदी

सोचते बेरी गइनी कांप’

जिन्दगी का ह, ई आज ले केहू के सही मायने में पता ना चलल। हरेक व्यक्ति अपना-अपना हिसाब से एकरा के परिभाषित करे को कोशिश करेला। जिन्दगी अपना आप में एगो पहेली आ कि सवाल एकर खोज ए संग्रह के कवि भी ‘आन्हर मनई’ नामक कविता में कवना तरह से करत बा ऊ रउला स्वयं ही देखीं:

‘जिनगी के चाल

आउर ओकर पड़ताल में

बूझल दियरी

रिसे लागल दरद के लोर

हियरा निकारे क बतकूचन

नवटंकी लेखा लागल।’

जवना तरह से पांचों अंगुरी एक समान ना होलें ओही तरह समाज में सब आदमी एक जइसन ना होलें। केहू सहायता पाके के सहायता करे वाला व्यक्ति के उम्रभर कृतज्ञ रहेला त केहू काम निकलला के बाद पीठ मोड़ लेबेला जवना के बखूबी चित्रण ‘आस्था बदल गइल’ नामक कविता में कवना तरह आइल बा, देखीं रउवा सबसे:

‘देख न आस्था बदल गइल

कंहरत रहलन हमही उठवनी

नीमन जगहा पर बइठवनी

लागत बा तबीयत संभव गइल।’

समाज ही ना घर-परिवार में भी आज केहू के केहू पर भरोसा नइखे। प्रत्येक आदमी दोसरा आदमी के संदेह के नज़र से देखत बा। आपसी विश्वास अब चरमरा गइल बा जवना के वर्णन द्विवेदी जी ‘कइसन बहल बेयार’ में सुंदर ढंग से कइले बानी:

‘छूंछ भइल अपनन के थाती

दुबक रहल बा अब उतपाती

धनियां के हेरीं अब कहवां

जोन्ही बदले सऊनाइल बा।’

भारतीय समाज में भ्रूण हत्या के समस्या भी बहुते गंभीर बा। आए दिन भ्रूण हत्या के केस देखे-सुने के मिलेला । जयशंकर प्रसाद दिवेदी जी के कविता में भी भ्रूण हत्या के सुंदर उदाहरण देखे के मिलत बा जवना से कवि के मन बहुते व्यथित बा। ‘कनिया धन’ में कवि के कहनाम बा:

‘लागल नाहीं हाथे हरदी

कोखी बुची मराइल बाटे।

बहरे चाहे कुछुओ बोलीं

माई घरे छोहाइल बाटे।।

नारी बा नारी के दुश्मन

मन के नेह हेराइल बाटे।

हेतना पीर सहाइ कइसे

बुद्धि पहरा घहराइल बाटे।।’

सबका मालूम बा कि मधुमास के मादकता अइसन होखेला कि मन बउरा जाला ‌। मधुमास पर भारतीय कवि लोग आपन लेखनी खूब चलवले बा । मधुमास में कोयल के तान मन के बेधे लागेला जवना के वर्णन ‘केके देखाईं चुनरिया’ में कवि द्वारा बखूबी कइल गइल बा :

‘अमवा के मोजरी से कोइलर के बोलिया

चढत चइतवा में ताना देव छलिया

सम्हरे न आपन नजरिया हो राम

मन मधुआइल ‌।”

भारत में किसान लोग के समस्या बहुते गंभीर बा‌। आज भी भारत में खेती-बाड़ी बारिश पर बहुते हद तक निर्भर बा। बारिश ना भइला पर किसान के मन उदास हो जाला। एही बात के चित्रण कवि अपना कविता ‘ खग बुझै खगही के भाषा’ में सुंदर ढंग से कइले बाड़न। कवि के कहनाम बा:

‘बादर बन्हले खेतिहर कबहूं

बारिस पर सभ निरभर अबहूं

कहां मुनाफा भइल किसानी

सदियन से बा इहां निराशा।’

भारतीय समाज में किसान के समस्या सहित मेहरारू के दशा में आज भी ज्यादा बदलाव नइखे आइल। मेहरारू लोग के आज भी कमजोर समझल जाला। ई पुरुष प्रधान देश औरत लोग के अनगिनत खामी निकालत रहेगा। औरत जन्म से लेके अपना ज़िन्दगी के अंतिम सांस तक समाज के ताना-खोबसन सहत रहेले जवना बारे में ‘खोबसन’ नामक कविता में कवि के कहनाम बा:

‘पहिले बेटी

फेरु ससुरइतिन

फेरु माई से आजी तक

खोबसन में बाझल

रहेली मेहरारू।’

आज के युवा पीढ़ी अपना माई-बाबू के बिल्कुले ध्यान नइखे राखत। फैशन के आंधी अइसन आइल बा कि युवा पीढ़ी से पुश्तैनी खेती-किसानी नइखे होत जवना के उल्लेख ‘घूंटत बाप’ नामक कविता में सुंदर ढंग से आइल बा:

‘ज़िनगी के सुरुवतिए में

फैशन के बेमारी घेरले बिया

खेत खरिहान कूल्हे भुलाइल

बबरी के झारल, चश्मा चढ़ा के

लागता तोहरा सुझात नइखे।’

जवना तरह से सूरज के रोज उदय आउरो अस्त होखेला ओही तरह जवना भी प्राणी के जन्म होखेला ओकर मृत्यु भी निश्चित होखेला‌ । आदमी ए दुनिया-संसार में अकेले आवेला आउरो अकेले ही चल जाला, जवन एगो सच्चाई हवे। कवि एही वास्तविकता के वर्णन ‘चलती के बेरिया’ में करत लिख रहल बा:

‘साथ संग कुल सभसे छुट गइलें

हित मीत हमरे नीयरो न अइलें

असवों गवाइ न कजरिया। चलती के बेरिया।।’

ए सब उल्लिखित कविता के अलावा जयशंकर प्रसाद प्रसाद द्विवेदी जी अपना कविता ‘तू त रहबा यार’ में कालाधन; ‘पतोह का निबाही’ में बूढ़-पुरनिया लोग के एकाकीपन के समस्या ; ‘फाटल लुगरी’ में गरीबी आउर मेहरारू लोग के समस्या;

‘बहल गांव बिलाइल खेती’ में बुजुर्ग लोग के समस्या के रेखाचित्र खींचे में जहवां एक ओर पूरा तरह से कामयाब बाड़न ओही जगहा ‘बड़भागी भोजपुरिया’ आउर ‘भकुआइल बबुआ’ में कवि अपना मातृभाषा भोजपुरी के गुणगान कइले बाड़न आउर भोजपुरी के संविधान के अष्टम अनुसूची में स्थान ना मिला से दुखी भी बाड़न। संग्रह के बाकी सब कवितन के भाव आ विचार भी सराहनीय बा। साथ ही संग्रह के कुछ कवितन में गेयता के गुण सुंदर ढंग से आइल बा ।

ए सब बात के आधार पर हम कह सकत बानी कि ‘‘पीपर के पतई’’ के रचनाकार श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी अपना कवि कर्म में बहुत सफल बानी । ए संग्रह में संकलित कविता के भाव, विचार आउर सुंदरता के अनुभव खातिर ए रचना के जरूर पढ़ीं। ए कविता-संग्रह के रचनाकार के वाचालता, मुखरता आ शब्द के अंदर छुपल भाव के सही अनुमान तबहीं होखी जब रउवा लोग संग्रह के सब कविता एक-एक कर के पढ़ब। ए संग्रह के आधार पर हम ई कह सकत बानी कि श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के साहित्यिक भविष्य बहुत उज्ज्वल आउर सुनहरा बा।

 

-डॉ. राजेश कुमार ‘माँझी’

हिंदी अधिकारी

जामिया मिल्लिया इस्लामिया

(केंद्रीय विश्वविद्यालय)

नई दिल्ली

 

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