कुंडी क रहस्य

” देखा , ले त चलत हईं सिवसंकर भइया के इंहा बाकिर कुछ एने -ओने हो जाई त हमके दोस मत दिहा।समझ गइला ना ! अपने कपार क अलाय-बलाय हमरे पर मत पटकीहा।” परताप एह अंदाज़ में बतिया कढ़वलन कि मनोज क पहिलहीं से संकित जीव में थरहरी दउड़ गइल।घबरा के पुछलन – ” काहें डेरवावत हउवा भाय।सिवसंकर सर क एतना बड़ाई सुनले हईं कि बिना मिलले रह ना जात ह।बनारस आके बिना उनकर चरन स्पर्श कइले लवट जाइब त हमार आत्मा के कल ना पड़ी।” मनोज क बेकली देखके परताप मुस्किया दिहलन –
” ऊ कुल त ठीक ह बाकिर जहाँ ऊ रहेलन उँहा एगो अइसन आत्मा निवास करेले कि ओसे मिलते बड़-बड़ लोगन के कपकपी छूट जाला।”
” काहें डेरवावत हउवा भइया।हम भूत -परेत में हम बिसवास ना करीला। “
भीतर से डेरात बाकिर बाहर से बहादुर बनत मनोज कहलन।
” भूतो -परेत से जबर आत्मा हे ऊ।भूत -परेत क त कवनों न कवनों ईलाज ह बाकिर ओकर कवनों ईलाज ना ह।बिस्व क कुल बैद -हक़ीम फेल।” परताप मन ही मन मुस्कियात रहलन।
” अचम्भो ! जब भूत परेत ना ह त का कवनों जादू-टोना ह ? ” मनोज बिसम्य से भरल पुछलन।
” ना हो ।जादू टोना क त काट ह बाकिर ओह फांस क कवनों काट ना ह।बचल जरूरी ह।बहुते जरूरी ।देखा हम चेता देत हईं। बाद में हमके नत कहिहा कि चेतवली हं ना।बूझल ? “
” काहें डेरवावत हउवा भाय। अइसन कवन बाधा -बिघ्न ह ? हम बड़-बड़ आफत-बीपत से जूझल हईं।हमके अब कवनों फरक ना पड़ेला।” मनोज क बनल बेफिक्री देख के परताप क खल-मन खुशी से गदबद हो गइल रहे बाकिर ऊ चेहरा क भाव तनिको बदले ना देत रहलन।दुनिया भर क चिंता फिकिर ले आवत मुखमुद्रा के बनावत- बिगाड़त कहलन -” चला चलते न हउवा।बड़ -बड़ लोग के कपार खराब हो गइल ।अब तोहरे न देखे के ह।”
” अच्छा ! त तू कइसे साबुत बच गइला ? तोहके ना लागल आत्मा -वात्मा ?” मनोज के आवाज़ में घुलल सिधाई भइया के गुदगुदावत रहे।
” हमार बात छोड़ा।हम त भोले भंडारी के सरन में रहीला।कुल्ह भूत -परेत, डाइन -चुरइन, वैम्प-वैम्पायर से हमार दाँत काटल दोस्ती ह ।” भइया के आँख में सरारत क बिजुरी चमकत रहे। मनोज उनके ओरी देख के कुछ अंदाज़ लगावल चहलन बाकिर फेल हो गइलन।भइया अपने चेहरा मोहरा पर आवे वाला भाव के छुपावे में एक ले माहिर।समने वाला के पते ना लगे दें कि उनके मन में का चलत ह।
गली के आखिरी छोर के एगो पुरान ढहल मकान के सामने जवने पर लिखल नेमप्लेट धुँधला हो गइल रहे।अउर जवन कुछ अच्छर पढ़े में आवत रहे ओसे एतने पता चले कि कवनों ‘निवास’ ह पर केकर ह,ई ना पढ़त बने। ऊँहवा पहुँच के परताप मनोज के कहलन -” जा, जाके कुंडी बजावा। तीन बार बजा के छोड़ दिहा। तीन बार बजवले के बाद जदि कोई ना खोली त फिर तब तक बजइहा जब तक किवाड़ी ना खुले।” परताप के सुर में पहिला बार बेधक ब्यंग क आभास पाके कुंडी के ओर बढ़ल मनोज क हाथ कुछ देर बदे थथम गइल।संशय से सराबोर परताप के ओरी निहारत पुछलन – ” ई तीन बार क का राज ह भइया ? देखा ! कवनों फँसे वाला बात त ना ह ? जदि होखे त बता द । हम कवनों बवाल में फँसल ना चाहत हईं।जियत जिनगी रही त सिवसंकर गुरुजी से फिर भेंट -मुलाकात हो जाई।बाकिर आपन जान सांसत में डाले त नहिये आइल हईं।अबहीं उमिरिये का भइल ह हमार।” मनोज के पहिली बार डेरात देख परताप के हँसी छूट गइल –
” का बे कुल बहादुरी निकर गइल ? अबहीं त कुंडियों ना बजवले।चल कुछ ना हो होई।बाबा बिसनाथ क नाव लेके कुंडी बजाव।डेरइले से काम ना चली।चल..शाबाश।” परताप के अंदाज़ अउर आवाज़ में खोट खटकत रहे।मनोज दू कदम आगे बढ़के पीछे लवट आवें।थकहार के जब ना रह गइल त परताप से निहोरा कइलन – ” भइया ! तुहीं खटकावा।हमसे ना होई।”
” अच्छा गुरु ! भल कहला।तोहन गुरु -चेला लोग के मिलनी करावे में हम भेंट चढ़ जाईं न ? हमके का गरज।तोहके ना मिले के ह त लवट चला।हम कवनों रिस्क लेवे के मूड में ना हईं।” परताप लवटे लगलन कि उनकर बाँह खींच के अपने संगे ले आवत मनोज फिर से चिरौरी -बिनती करे लगलन।
” भइया ! देखा नराज मत होखा।हमही कुंडी बजाइब बाकिर तू इंहवे रहा। गुरु जी से हमके मिलवाई के जइहा।” मनोज क दीन दसा देख के परताप पसीज गइलन।
” ठीक ह । चल तीन बार कुंडी खटखटाव। जदि केहू ना खोली त भाग चलिहे।” मनोज के कान में फुसफुसा के परताप कहलन।डर के मारे मनोज क हाथ पैर में गनगनी लेस दिहलस।केहू तरे ऊ तीन बार कुंडी बजवलन बाकिर केहू क आहट ना आइल,किवाड़ ना खुलल।परताप मनोज क हाथ पकड़ के बिजुरी के गति से दउड़ गइलन अउर गली के अगिला मोड़ पर ही जाके साँस लिहलन।मनोज मारे डर अउर लगातार धउरले से छाती पकड़ के बइठ गइलन।हांफत-हांफत पूछे लगलन –
” अइसन का हो गइल रहल ह ? काहें सिर पर पैर रखके भगला ह भइया ।”
” सुस्ता ला ससुर अउर चला चाह -वाह पिआवा।बहुत बड़ फ़जीहत से जान बचल ह आज।समझ ला पहिली बेर में एकदम साफ -साफ बच निकलला ह।नाहीं त एतना बुरा फँसता कि बाबा बिसनाथो के बचवले ना बचता।” परताप लगातार छूटत हंफरी में बोलत रहलन।
” काहें भइया ? अइसन का मामिला ह ? ” मनोज क होस -हवास गुम रहे।
” कुल्ह आजुवे जनबा।काल्ह बताइब।काल्ह फिर चले के गुरुजी से मिले। ठीक न ?” मनोज क पीठ ठोंकत परताप चौरसिया चाय -पान के दोकान ओरी चल दिहलन।एहर मनोज बेचारु सोचते रह गइलन कि आखिर ई तीन बार कुंडी बजवले क रहस्य का ह ?”
~ क्रमशः
  • सुमन सिंह
वाराणसी

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